पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय का २५वाँ श्लोक मानव जीवन के परम कर्तव्य, कर्म की प्रकृति और समाज के प्रति एक प्रबुद्ध नागरिक या ज्ञानी पुरुष के दायित्वों का अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानवता को यह संदेश दे रहे हैं कि कर्म से पलायन करना धर्म नहीं है, अपितु अनासक्त भाव से लोक-कल्याण के लिए निरंतर कर्म करते रहना ही वास्तविक योग है। इस श्लोक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रासंगिकता सार्वभौमिक है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि कैसे हम अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठकर समष्टि (संपूर्ण समाज) के उत्थान के लिए कार्य कर सकते हैं।
ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें तो यह श्लोक 'लोकसंग्रह' की अवधारणा को प्रतिपादित करता है। लोकसंग्रह का अर्थ केवल सामाजिक कार्य करना नहीं है, बल्कि समाज की नैतिक, आध्यात्मिक और भौतिक व्यवस्था को बनाए रखना है। जब एक ज्ञानी पुरुष बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के, केवल समाज को सही दिशा देने के लिए कर्म करता है, तो वह कर्म 'यज्ञ' बन जाता है। यह श्लोक अज्ञानी और ज्ञानी के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करता है—दोनों ही कर्म करते हैं, परंतु उनकी चेतना, प्रेरणा और उद्देश्य में आकाश-पाताल का अंतर होता है। आइए, इस पावन श्लोक के गहरे आध्यात्मिक रहस्यों, इसके शब्दार्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में इसके अनुप्रयोग को विस्तार से समझें।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् || २५ ||
saktāḥ karmaṇy avidvāṁso yathā kurvanti bhārata |
kuryād vidvāṁs tathāsaktaś cikīrṣur loka-saṅgraham || 25 ||
पाठ एवं जप की विधि:
इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। शांत चित्त से भगवान श्रीकृष्ण के पार्थसारथी रूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम ११, २१ या १०८ बार उच्चारण करना चाहिए। यह जप विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है जो अपने कार्यक्षेत्र में अत्यधिक तनाव, भटकाव या फल की चिंता से ग्रसित रहते हैं। इस श्लोक का नियमित मनन बुद्धि को कुशाग्र करता है और निष्काम कर्म की भावना को जागृत करता है।
सरल हिंदी अनुवाद:
"हे भरतवंशी अर्जुन! जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष फल की आसक्ति से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह अनासक्त होकर, लोक-कल्याण (समाज को सही मार्ग पर लाने) की इच्छा से कर्म करे।"
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व से लिया गया है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और कर्म (युद्ध) से विमुख होने का प्रयास करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्मयोग का यह महान उपदेश देते हैं। अर्जुन का तर्क था कि युद्ध करने से कुल का नाश होगा और पाप लगेगा, इसलिए वे सन्यास लेकर वन में जाना चाहते थे। श्रीकृष्ण अर्जुन के इस पलायनवादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए समझाते हैं कि सन्यास का अर्थ कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्मों में आसक्ति का त्याग है।
इस श्लोक की पृष्ठभूमि में राजा जनक का ऐतिहासिक उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा जनक एक परम ज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता और जीवन्मुक्त पुरुष थे। वे चाहते तो राजपाठ छोड़कर वन में जाकर ध्यान लगा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने आजीवन मिथिला के राजा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी केवल 'लोकसंग्रह' के लिए ही कर्म किए थे। यदि राजा जनक कर्म करना छोड़ देते, तो प्रजा भी आलसी हो जाती और अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाती, जिससे समाज में अराजकता फैल जाती।
वैदिक वास्तुकला और उपनिषदों में भी 'लोकसंग्रह' को सृष्टि का आधार माना गया है। ईशावास्योपनिषद में कहा गया है—"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" अर्थात् इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण इसी वैदिक सत्य को पुनः स्थापित कर रहे हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि हे भारत! अज्ञानी मनुष्य जिस प्रकार अपने परिवार, धन और यश की प्राप्ति के लिए पूरी शक्ति लगाकर कर्म करता है, एक ज्ञानी पुरुष को भी समाज के कल्याण के लिए उसी ऊर्जा, निष्ठा और तत्परता के साथ कर्म करना चाहिए। अंतर केवल इतना होगा कि ज्ञानी के मन में कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या अहंकार नहीं होगा। वह समाज के लिए एक आदर्श स्थापित करने के लिए कर्म करेगा।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
यह लेख Bhaktilok.in के विद्वान संपादकीय मंडल द्वारा सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, जैसे आदि शंकराचार्य कृत गीता भाष्य, रामानुजाचार्य के गीता भाष्य और आधुनिक युग के महान संतों के प्रवचनों के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, गीता के व्यावहारिक और वैज्ञानिक पक्ष से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं है, बल्कि यह आधुनिक प्रबंधन (Modern Management) और सामाजिक नेतृत्व (Social Leadership) का एक उत्कृष्ट सूत्र है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध ज्ञान पहुँचाना है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
गीता के इस दिव्य संदेश को अपने जीवन में उतारें
"सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो..." केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण कला है। आइए, हम सब अपने-अपने क्षेत्रों में अनासक्त भाव से, समाज के कल्याण के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का संकल्प लें। यही भगवान श्रीकृष्ण की सच्ची आराधना है।
|| हरि ॐ तत्सत् ||
श्लोक का अर्थ / Meaning
जैसे अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए। As the ignorant act with attachment, the wise should act without attachment for the welfare of the world.