कर्म योग (Karma Yoga) – श्लोक 25
श्लोक २५ में बताया गया है कि ज्ञानी को लोकसंग्रह के लिए आसक्ति रहित कर्म करना चाहिए। Verse 25: The wise should act without attachment for public welfare.
संस्कृत श्लोक
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत | कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||२५||
saktāḥ karmaṇy avidvāṃso yathā kurvanti bhārata | kuryād vidvāṃs tathāsaktaś cikīrṣur lokasaṅgraham ||25||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सक्ता: आसक्त; कर्मणि: कर्म में; अविद्वांस: अज्ञानी लोग; यथा: जैसे; कुर्वन्ति: करते हैं; भारत: हे भारत (अर्जुन); कुर्यात्: करे; विद्वान: ज्ञानी; तथा: वैसे ही; असक्त: आसक्ति रहित; चिकीर्षु: इच्छा रखने वाला; लोकसंग्रहम्: लोकसंग्रह की।
हिंदी अनुवाद
हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।
English Translation
O Bharata, as the ignorant act with attachment to work, so should the wise act without attachment, for the sake of leading the people on the right path.
टीका / Commentary
भगवान अब ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में अंतर बताते हैं – दोनों कर्म करते हैं, लेकिन एक आसक्ति से, दूसरा आसक्ति रहित। ज्ञानी का उद्देश्य लोकसंग्रह होता है। The Lord now distinguishes the actions of the wise and the ignorant – both act, but one is attached, the other unattached. The wise act for public welfare.