श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 25

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 37 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत | कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||२५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
सक्ता
आसक्त
कर्मणि
कर्म में
अविद्वांस
अज्ञानी लोग
यथा
जैसे
कुर्वन्ति
करते हैं
भारत
हे भारत (अर्जुन)
कुर्यात्
करे
विद्वान
ज्ञानी
तथा
वैसे ही
असक्त
आसक्ति रहित
चिकीर्षु
इच्छा रखने वाला
लोकसंग्रहम्
लोकसंग्रह की।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय का २५वाँ श्लोक मानव जीवन के परम कर्तव्य, कर्म की प्रकृति और समाज के प्रति एक प्रबुद्ध नागरिक या ज्ञानी पुरुष के दायित्वों का अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानवता को यह संदेश दे रहे हैं कि कर्म से पलायन करना धर्म नहीं है, अपितु अनासक्त भाव से लोक-कल्याण के लिए निरंतर कर्म करते रहना ही वास्तविक योग है। इस श्लोक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रासंगिकता सार्वभौमिक है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि कैसे हम अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठकर समष्टि (संपूर्ण समाज) के उत्थान के लिए कार्य कर सकते हैं।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें तो यह श्लोक 'लोकसंग्रह' की अवधारणा को प्रतिपादित करता है। लोकसंग्रह का अर्थ केवल सामाजिक कार्य करना नहीं है, बल्कि समाज की नैतिक, आध्यात्मिक और भौतिक व्यवस्था को बनाए रखना है। जब एक ज्ञानी पुरुष बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के, केवल समाज को सही दिशा देने के लिए कर्म करता है, तो वह कर्म 'यज्ञ' बन जाता है। यह श्लोक अज्ञानी और ज्ञानी के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करता है—दोनों ही कर्म करते हैं, परंतु उनकी चेतना, प्रेरणा और उद्देश्य में आकाश-पाताल का अंतर होता है। आइए, इस पावन श्लोक के गहरे आध्यात्मिक रहस्यों, इसके शब्दार्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में इसके अनुप्रयोग को विस्तार से समझें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् || २५ ||

saktāḥ karmaṇy avidvāṁso yathā kurvanti bhārata |
kuryād vidvāṁs tathāsaktaś cikīrṣur loka-saṅgraham || 25 ||


पाठ एवं जप की विधि:

इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। शांत चित्त से भगवान श्रीकृष्ण के पार्थसारथी रूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम ११, २१ या १०८ बार उच्चारण करना चाहिए। यह जप विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है जो अपने कार्यक्षेत्र में अत्यधिक तनाव, भटकाव या फल की चिंता से ग्रसित रहते हैं। इस श्लोक का नियमित मनन बुद्धि को कुशाग्र करता है और निष्काम कर्म की भावना को जागृत करता है।

सरल हिंदी अनुवाद:

"हे भरतवंशी अर्जुन! जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष फल की आसक्ति से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह अनासक्त होकर, लोक-कल्याण (समाज को सही मार्ग पर लाने) की इच्छा से कर्म करे।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सक्ताः (saktāḥ) आसक्त, फल की इच्छा रखने वाले वे लोग जो अपने कर्मों के परिणामों से अत्यधिक बंधे होते हैं और केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्य करते हैं।
कर्मणि (karmaṇi) कर्मों में, नियत कर्तव्यों में संसार में रहते हुए किए जाने वाले शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्तव्य।
अविद्वांसः (avidvāṁsaḥ) अज्ञानी लोग, जो आत्मज्ञान से रहित हैं वे व्यक्ति जो स्वयं को केवल शरीर मानते हैं और आत्मा के शाश्वत स्वरूप से अनभिज्ञ हैं।
यथा (yathā) जिस प्रकार, जैसे एक उदाहरण या तुलनात्मक स्थिति को दर्शाने के लिए प्रयुक्त शब्द।
कुर्वन्ति (kurvanti) करते हैं, संपादन करते हैं पूर्ण तन्मयता और ऊर्जा के साथ किसी कार्य को क्रियान्वित करना।
भारत (bhārata) हे भरतवंशी अर्जुन! अर्जुन को उनके महान पूर्वज राजा भरत की याद दिलाकर उनके भीतर के तेज और कर्तव्यबोध को जगाने के लिए संबोधन।
कुर्यात् (kuryāt) करना चाहिए, आचरण करना चाहिए यह एक विधि-लिङ् लकार का रूप है, जो कर्तव्य की अनिवार्यता और नैतिक आदेश को दर्शाता है।
विद्वान् (vidvān) ज्ञानी पुरुष, आत्मज्ञानी वह व्यक्ति जिसे सत्य का साक्षात्कार हो चुका है और जो जानता है कि आत्मा अकर्ता है।
तथा (tathā) वैसे ही, उसी प्रकार से ज्ञानी के कर्म करने की शैली को अज्ञानी की शैली के समान उत्साहपूर्ण दिखाने के लिए तुलना।
असक्तः (asaktaḥ) अनासक्त होकर, फल की इच्छा के बिना कर्म करते हुए भी उसके फल (लाभ-हानि, जय-पराजय) के प्रति मानसिक रूप से तटस्थ रहना।
चिकीर्षुः (cikīrṣuḥ) इच्छा रखने वाला, कामना करने वाला यहाँ यह इच्छा स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि केवल लोक-कल्याण के पावन उद्देश्य के लिए है।
लोकसंग्रहम् (loka-saṅgraham) लोक-कल्याण, सामाजिक व्यवस्था संसार को मर्यादा में रखना, लोगों को सन्मार्ग पर चलाना और समाज का नैतिक संरक्षण करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व से लिया गया है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और कर्म (युद्ध) से विमुख होने का प्रयास करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्मयोग का यह महान उपदेश देते हैं। अर्जुन का तर्क था कि युद्ध करने से कुल का नाश होगा और पाप लगेगा, इसलिए वे सन्यास लेकर वन में जाना चाहते थे। श्रीकृष्ण अर्जुन के इस पलायनवादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए समझाते हैं कि सन्यास का अर्थ कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्मों में आसक्ति का त्याग है।

इस श्लोक की पृष्ठभूमि में राजा जनक का ऐतिहासिक उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा जनक एक परम ज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता और जीवन्मुक्त पुरुष थे। वे चाहते तो राजपाठ छोड़कर वन में जाकर ध्यान लगा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने आजीवन मिथिला के राजा के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी केवल 'लोकसंग्रह' के लिए ही कर्म किए थे। यदि राजा जनक कर्म करना छोड़ देते, तो प्रजा भी आलसी हो जाती और अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाती, जिससे समाज में अराजकता फैल जाती।

वैदिक वास्तुकला और उपनिषदों में भी 'लोकसंग्रह' को सृष्टि का आधार माना गया है। ईशावास्योपनिषद में कहा गया है—"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" अर्थात् इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण इसी वैदिक सत्य को पुनः स्थापित कर रहे हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि हे भारत! अज्ञानी मनुष्य जिस प्रकार अपने परिवार, धन और यश की प्राप्ति के लिए पूरी शक्ति लगाकर कर्म करता है, एक ज्ञानी पुरुष को भी समाज के कल्याण के लिए उसी ऊर्जा, निष्ठा और तत्परता के साथ कर्म करना चाहिए। अंतर केवल इतना होगा कि ज्ञानी के मन में कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या अहंकार नहीं होगा। वह समाज के लिए एक आदर्श स्थापित करने के लिए कर्म करेगा।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति की प्राप्ति: फल की चिंता से मुक्ति मिलने के कारण मन में असीम शांति और स्थिरता का अनुभव होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: यह श्लोक व्यक्ति के भीतर निराशा को दूर कर कर्म करने के प्रति एक नया उत्साह भरता है।
  • अहंकार का शमन: जब व्यक्ति 'लोकसंग्रह' के लिए कार्य करता है, तो उसका व्यक्तिगत अहंकार (मैं और मेरा) धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
  • कर्मों की शुद्धि (कर्म-शुद्धि): अनासक्त भाव से किए गए कर्म संचित पापों का नाश करते हैं और नए कर्मबंधन नहीं बनाते।
  • नेतृत्व क्षमता का विकास: यह श्लोक व्यक्ति को एक आदर्श मार्गदर्शक और समाज सुधारक बनने की प्रेरणा देता है।
  • तनाव और अवसाद से मुक्ति: आधुनिक जीवन में कार्यस्थल पर होने वाले तनाव (Workplace Stress) को दूर करने का यह सबसे अचूक आध्यात्मिक उपाय है।
  • भगवद्-कृपा की अनुभूति: निष्काम भाव से समाज की सेवा करने वाले साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा सदैव बनी रहती है।
  • निर्णय लेने की क्षमता में सुधार: जब बुद्धि फल की आसक्ति से मुक्त होती है, तो निर्णय अधिक विवेकपूर्ण और सटीक होते हैं।
  • सहानुभूति और करुणा का उदय: दूसरों के कल्याण की चिंता करने से हृदय में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और करुणा का भाव जागृत होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह लेख Bhaktilok.in के विद्वान संपादकीय मंडल द्वारा सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, जैसे आदि शंकराचार्य कृत गीता भाष्य, रामानुजाचार्य के गीता भाष्य और आधुनिक युग के महान संतों के प्रवचनों के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, गीता के व्यावहारिक और वैज्ञानिक पक्ष से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं है, बल्कि यह आधुनिक प्रबंधन (Modern Management) और सामाजिक नेतृत्व (Social Leadership) का एक उत्कृष्ट सूत्र है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध ज्ञान पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'लोकसंग्रह' का अर्थ है समाज को बिखरने से बचाना, उसे मर्यादा में रखना और नैतिक व आध्यात्मिक रूप से उसका मार्गदर्शन करना। इसका तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जो बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के, संपूर्ण मानवता के कल्याण, सुख और शांति के लिए किए जाते हैं। ज्ञानी पुरुष अपने आचरण से समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं ताकि सामान्य लोग भी उसी सन्मार्ग का अनुसरण कर सकें।

दोनों के कर्मों में मुख्य अंतर 'आसक्ति' (Attachment) और 'उद्देश्य' का होता है। अज्ञानी पुरुष अपने कर्मों के फल से बंधा होता है; वह केवल अपने व्यक्तिगत लाभ, नाम, यश या धन के लिए कर्म करता है। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष पूरी तरह से अनासक्त होता है। वह कर्म तो उतनी ही ऊर्जा और कुशलता से करता है, परंतु उसका उद्देश्य केवल लोक-कल्याण और ईश्वर की प्रसन्नता होता है।

यद्यपि ज्ञानी पुरुष को अपने लिए किसी वस्तु या फल की आवश्यकता नहीं होती और वह आत्मतृप्त होता है, फिर भी उसके लिए कर्म करना आवश्यक माना गया है। यदि ज्ञानी पुरुष कर्म करना छोड़ देगा, तो सामान्य मनुष्य भी उसका अनुकरण करके आलसी और अकर्मण्य हो जाएंगे। समाज की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और लोगों को सही दिशा दिखाने के लिए ज्ञानी पुरुष का कर्म करना अत्यंत अनिवार्य है।

आधुनिक जीवन में यह श्लोक 'सर्वोत्तम नेतृत्व' (Servant Leadership) का पाठ पढ़ाता है। एक मैनेजर या लीडर को अपनी टीम के सामने एक उदाहरण पेश करना चाहिए। उसे केवल अपनी पदोन्नति या बोनस के लिए काम नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी संस्था और समाज के विकास के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए। जब आप फल की चिंता छोड़कर कार्य की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपकी उत्पादकता और मानसिक शांति दोनों कई गुना बढ़ जाती हैं।

बिल्कुल नहीं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष को "तथा" अर्थात् उसी प्रकार कर्म करना चाहिए जैसे अज्ञानी करता है—यानी पूरी तन्मयता, उत्साह, कौशल और समर्पण के साथ। अनासक्ति का अर्थ काम में ढिलाई बरतना नहीं है, बल्कि काम के परिणाम (जीत या हार) से विचलित न होना है। यह आपको अधिक निडर और केंद्रित होकर काम करने की स्वतंत्रता देता है।

गीता के इस दिव्य संदेश को अपने जीवन में उतारें

"सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो..." केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण कला है। आइए, हम सब अपने-अपने क्षेत्रों में अनासक्त भाव से, समाज के कल्याण के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का संकल्प लें। यही भगवान श्रीकृष्ण की सच्ची आराधना है।

|| हरि ॐ तत्सत् ||

श्लोक का अर्थ / Meaning

जैसे अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए। As the ignorant act with attachment, the wise should act without attachment for the welfare of the world.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/43 58% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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