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सनातन दिव्य लिरिक्स

ॐ जय अम्बे गौरी आरती (Om Jai Ambe Gauri Aarti) – Lyrics in Hindi

ॐ जय अम्बे गौरी – यह प्रसिद्ध दुर्गा आरती माँ अम्बे गौरी की महिमा का गुणगान करती है। हिंदी लिरिक्स, अर्थ और विशेष जानकारी सहित।

देव: श्री अम्बे गौरी कुल पाठ: 144 बार

घंटी बजाकर आशीर्वाद लें

आरती दिव्य तरंग (Ambient Temple Chants)

मंदिर घंटियों और ॐ जप के पावन स्वर के साथ आरती का अनुभव करें।

जय श्री अम्बे गौरी आरति लिरिक्स

🙏 ॐ जय अम्बे गौरी

(Om Jai Ambe Gauri) – प्रसिद्ध दुर्गा आरती

माँ दुर्गा की आरती ॥

📝 आरती विवरण

🎤 परंपरा: सनातन
🏷️ श्रेणी: दुर्गा आरती / माँ अम्बे
📍 भाव: शक्ति, आशीर्वाद, रक्षा

📜 आरती लिरिक्स (हिन्दी में)

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमाद।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीराजत॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

चन्द्रहासोज्जवलकरा, शार्दूल वाहना।
कंटकों में बैठने वाली, माँ सब सुख दाता॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

माँ शेरोंवाली दुःखियों की रखवाली।
भक्तों पर कृपा करती, दुष्टों को दलती॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

अम्बे तू है जगदम्बे, काली जय दुर्गे।
खप्पर कटारी वाली, शोभित भुज चतुर्गे॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

जय अम्बे गौरी मैया, जय श्यामा गौरी।
तुम ही हो भवानी, तुम ही जगत जननी॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
सुख सम्पत्ति कर तुम्हारी, जय अम्बे गौरी॥

✍️ परंपरागत आरती (सनातन धर्म)

🙏 आरती का अर्थ और संदेश

यह प्रसिद्ध दुर्गा आरती माँ अम्बे गौरी की महिमा का गुणगान करती है। “ॐ जय अम्बे गौरी” – माँ अम्बे गौरी की जय हो। वे ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला रानी के रूप में सृष्टि की संचालिका हैं। उनके मस्तक पर सिंदूर और भाल पर मृगमद की टीका शोभायमान है।

माँ शेर पर सवार होकर भक्तों की रक्षा करती हैं और दुष्टों का संहार करती हैं। वे जगदम्बा, काली, दुर्गा – सभी रूपों में शक्ति की प्रतिमूर्ति हैं। इस आरती के माध्यम से भक्त माँ से सुख, सम्पत्ति और रक्षा की कामना करते हैं।

आरती के अंत में कहा गया है कि जो भी इसे श्रद्धा से गाता है, माँ उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं और उसे हर संकट से मुक्ति दिलाती हैं।

🔍 आरती का विशेष महत्त्व

नवरात्रि की आराधना: यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना में गाई जाती है।

शक्ति की उपासना: अम्बे गौरी आदि शक्ति का रूप हैं – यह आरती उनके सौम्य एवं उग्र दोनों स्वरूपों का वर्णन करती है।

रक्षा और समृद्धि: मान्यता है कि इस आरती का नियमित पाठ करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और सभी विघ्न दूर होते हैं।

💖 भक्ति रस का संगम

🎯 संदेश

माँ अम्बे गौरी जगत की पालनहारी हैं। वे भक्तों पर सदा कृपा बरसाती हैं। इस आरती को गाने से भक्त के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

✨ आस्था का प्रतीक

यह आरती उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणा है जो माँ दुर्गा की शक्ति और करुणा से अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं।

🙏 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। जय अम्बे गौरी मैया ।।

॥ इति श्रीदुर्गारती सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ जय अम्बे गौरी ।।

आरती का शास्त्रीय व आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में देव पूजा की पूर्णता आरती से होती है। आरती शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'आर्त्रिका' से हुई है, जिसका अर्थ होता है विपत्ति का हरण करना या संकट दूर करना। पूजा-पाठ के दौरान होने वाली त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए पूजा के अंत में आरती करने का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती की थाली में सजाया गया दीया ईश्वर की दिव्य ज्योति का प्रतीक होता है। थाली में जलने वाली कपूर या घी की बत्तियां हमारे भीतर छुपे अंधकार (अज्ञान) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर जाने का प्रतीक हैं। आरती के समय घंटियों और घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

आरती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक शोध के अनुसार, आरती के दौरान जलने वाले कपूर (Camphor) और घी की सुगंध से वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं। आरती के समय बजने वाले शंख और तांबे की घंटियों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करने और मानसिक तनाव दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं।

आरती करने की सही शास्त्रीय विधि (Aarati Vidhi)

हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार, आरती घुमाने का एक निश्चित चक्र होता है, जिसका पालन अत्यंत आवश्यक है:

प्रथम चरण: चरणों की चार बार आरती आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों की ओर सबसे पहले चार बार घुमाना चाहिए। यह समर्पण और नमन का सूचक है।
द्वितीय चरण: नाभि की दो बार आरती इसके बाद भगवान की नाभि की ओर दो बार थाली घुमाई जाती है, जो कि सृष्टि के केंद्र की वंदना मानी गई है।
तृतीय चरण: मुखमंडल की एक बार आरती भगवान के मुखारविंद के सामने एक बार आरती घुमाएं, जिससे उनके सौंदर्य और करुणामय स्वरूप का दर्शन होता है।
चतुर्थ चरण: सम्पूर्ण स्वरूप की सात बार आरती अंत में, भगवान के मस्तक से लेकर चरणों तक, सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर चक्राकार रूप में सात बार आरती घुमाई जाती है।

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लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

सनातन संप्रदायों के शास्त्रों, भजनों और आरतियों का शोध कर प्रामाणिक पाठ उपलब्ध कराने वाली संस्था।

धार्मिक तथ्य-समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व देव साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक संस्कृत साहित्य)।

संदर्भ-आधारित समीक्षा
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें