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सनातन दिव्य लिरिक्स

जगदम्बा आरती (Jagadamba Aarti) – Lyrics in Hindi

जगदम्बा आरती – माँ दुर्गा की प्रसिद्ध आरती। हिंदी लिरिक्स, अर्थ और महत्व के साथ पढ़ें जगदम्बा माता की स्तुति।

देव: श्री दुर्गा कुल पाठ: 217 बार

घंटी बजाकर आशीर्वाद लें

आरती दिव्य तरंग (Ambient Temple Chants)

मंदिर घंटियों और ॐ जप के पावन स्वर के साथ आरती का अनुभव करें।

जय श्री दुर्गा आरति लिरिक्स

🙏 जगदम्बा आरती

(Jagadamba Aarti) – प्रसिद्ध दुर्गा आरती

जय अम्बे जगदम्बे ॥

📝 आरती विवरण

🎤 परंपरा: सनातन
🏷️ श्रेणी: दुर्गा आरती / माँ जगदम्बा
📍 भाव: शक्ति, रक्षा, आस्था

📜 आरती लिरिक्स (हिन्दी में)

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

सिंहासन विराजित, शुभ घंटा धारी।
भक्तों पर कृपा करें, दुःखहारी भारी॥

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

शुम्भ-निशुम्भ दलनिया, महिषासुर मर्दिनी।
रक्तबीज संहारिणी, जग जननी अविनाशिनी॥

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

नव दुर्गा स्वरूपा, शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी।
चन्द्रघंटा कूष्माण्डा, स्कन्दमाता कात्यायनी॥
कालरात्रि महागौरी, सिद्धिदात्री पूजनी।

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

अष्टभुजा दशभुजा, शस्त्रों से सुशोभित।
सिंह वाहिनी अम्बे, मनवांछित फल देत॥

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

जगदम्बा जगदम्बा जय जय जगदम्बा।
सुर नर मुनि सेवित, सब सुखदायक अम्बा॥

✍️ परंपरागत आरती (सनातन धर्म)

🙏 आरती का अर्थ और संदेश

यह प्रसिद्ध जगदम्बा आरती माँ दुर्गा के जगतजननी स्वरूप की स्तुति करती है। "जगदम्बा" का अर्थ है – सम्पूर्ण जगत की माता। आरती में माँ के विभिन्न रूपों – शुम्भ-निशुम्भ का वध करने वाली, महिषासुर मर्दिनी, रक्तबीज संहारिणी, और नवदुर्गा के नौ स्वरूपों – का गुणगान किया गया है।

माँ सिंहासन पर विराजमान हैं, घंटा धारण करती हैं और भक्तों के सभी दुःख हरती हैं। अष्टभुजा एवं दशभुजा स्वरूप में वे विविध शस्त्र धारण कर भक्तों की रक्षा करती हैं। इस आरती के नियमित पाठ से माँ जगदम्बा की कृपा प्राप्त होती है और सभी संकट दूर होते हैं।

🔍 आरती का विशेष महत्त्व

शक्ति की आराधना: जगदम्बा आरती नवरात्रि, दुर्गा पूजा और शुक्रवार के दिन विशेष रूप से गाई जाती है। यह माँ की शक्ति, करुणा और रक्षा का गुणगान करती है।

नवदुर्गा का समावेश: आरती में नवदुर्गा के नौ रूपों – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री – का उल्लेख है, जो माँ की विभिन्न शक्तियों को दर्शाता है।

रक्षा एवं सुख-शांति: भक्तों का विश्वास है कि इस आरती को श्रद्धा से गाने से माँ जगदम्बा घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करती हैं।

💖 भक्ति रस का संगम

🎯 संदेश

जगदम्बा अर्थात सृष्टि की जननी। यह आरती हमें याद दिलाती है कि माँ दुर्गा हर संकट में अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें अभय का वरदान देती हैं।

✨ आस्था का प्रतीक

जो भी श्रद्धा भाव से इस आरती का पाठ करता है, माँ उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं और उसे नवदुर्गा के समान शक्ति प्रदान करती हैं।

🙏 जय अम्बे जय जगदम्बे ।। दुर्गे दुर्गतिहारिणि ।।

॥ इति श्रीजगदम्बारती सम्पूर्णम् ॥
॥ जय अम्बे गौरी, जय जगदम्बा ॥

आरती का शास्त्रीय व आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में देव पूजा की पूर्णता आरती से होती है। आरती शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'आर्त्रिका' से हुई है, जिसका अर्थ होता है विपत्ति का हरण करना या संकट दूर करना। पूजा-पाठ के दौरान होने वाली त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए पूजा के अंत में आरती करने का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती की थाली में सजाया गया दीया ईश्वर की दिव्य ज्योति का प्रतीक होता है। थाली में जलने वाली कपूर या घी की बत्तियां हमारे भीतर छुपे अंधकार (अज्ञान) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर जाने का प्रतीक हैं। आरती के समय घंटियों और घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

आरती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक शोध के अनुसार, आरती के दौरान जलने वाले कपूर (Camphor) और घी की सुगंध से वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं। आरती के समय बजने वाले शंख और तांबे की घंटियों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करने और मानसिक तनाव दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं।

आरती करने की सही शास्त्रीय विधि (Aarati Vidhi)

हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार, आरती घुमाने का एक निश्चित चक्र होता है, जिसका पालन अत्यंत आवश्यक है:

प्रथम चरण: चरणों की चार बार आरती आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों की ओर सबसे पहले चार बार घुमाना चाहिए। यह समर्पण और नमन का सूचक है।
द्वितीय चरण: नाभि की दो बार आरती इसके बाद भगवान की नाभि की ओर दो बार थाली घुमाई जाती है, जो कि सृष्टि के केंद्र की वंदना मानी गई है।
तृतीय चरण: मुखमंडल की एक बार आरती भगवान के मुखारविंद के सामने एक बार आरती घुमाएं, जिससे उनके सौंदर्य और करुणामय स्वरूप का दर्शन होता है।
चतुर्थ चरण: सम्पूर्ण स्वरूप की सात बार आरती अंत में, भगवान के मस्तक से लेकर चरणों तक, सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर चक्राकार रूप में सात बार आरती घुमाई जाती है।

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लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

सनातन संप्रदायों के शास्त्रों, भजनों और आरतियों का शोध कर प्रामाणिक पाठ उपलब्ध कराने वाली संस्था।

धार्मिक तथ्य-समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व देव साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक संस्कृत साहित्य)।

संदर्भ-आधारित समीक्षा
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें