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सनातन दिव्य लिरिक्स

आदि शक्ति आरती (Adi Shakti Aarti) – ॐ जय अम्बे गौरी | Lyrics in Hindi

आदि शक्ति आरती (Adi Shakti Aarti) – ॐ जय अम्बे गौरी के हिंदी लिरिक्स, अर्थ, महत्व और भक्ति भाव सहित। माँ भवानी की यह प्रसिद्ध आरती पढ़ें।

देव: श्री आदि शक्ति कुल पाठ: 125 बार

घंटी बजाकर आशीर्वाद लें

आरती दिव्य तरंग (Ambient Temple Chants)

मंदिर घंटियों और ॐ जप के पावन स्वर के साथ आरती का अनुभव करें।

जय श्री आदि शक्ति आरति लिरिक्स

🙏 ॐ जय अम्बे गौरी

(Om Jai Ambe Gauri) – आदि शक्ति आरती

जगत जननी की आरती ॥

📝 आरती विवरण

🎤 परंपरा: सनातन
🏷️ श्रेणी: दुर्गा / आदि शक्ति
📍 भाव: शक्ति, भक्ति, मातृत्व

📜 आरती लिरिक्स (हिन्दी में)

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

माता सब जग की तू ही, भवानी अम्बे।
सबकी रक्षा करती हो, जगदम्बे॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

शिव योगी तुम्हारे ध्यानी, ब्रह्मा विधाता।
विष्णु सेवक तुम्हारे, सदा सहायता॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

सिंह वाहिनी माता, शुभ फल दाता।
भक्तों की पीड़ा हरती, विघ्न विनाशक॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

चन्द्र सी शोभा तुम्हारी, मुकुट विराजे।
हाथों में त्रिशूल, असि, चक्र सजाये॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

रक्ताम्बर धारिणी, मुण्डमाला सोहे।
भक्तों के मन में, सदा विराजे॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

नव दुर्गा नाम तुम्हारा, शक्ति अपार।
हरो दुख दारिद्र, पूर्ण करो आस॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

काशी में विराजे, विश्वनाथ संगा।
माता गौरी भवानी, सबके मन भंगा॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

जो कोई आरती गावे, माता के द्वारे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

ॐ जय अम्बे गौरी, स्वामी जय अम्बे गौरी।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥

✍️ परंपरागत आरती (सनातन धर्म)

🙏 आरती का अर्थ और संदेश

यह आरती आदि शक्ति माँ अम्बे गौरी की महिमा का वर्णन करती है। "ॐ जय अम्बे गौरी" – माँ भवानी की जय हो। वे ही सृष्टि की आदि शक्ति हैं, जिनसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी प्रेरणा लेते हैं।

माता सिंह वाहिनी हैं, उनके हाथों में त्रिशूल, चक्र और असि शोभित हैं। वे भक्तों की पीड़ा हरती हैं और सभी विघ्नों का नाश करती हैं।

आरती के अंत में कहा गया है कि जो भक्त इस आरती को नियमित रूप से गाता है, उसे सुख, संपत्ति और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

🔍 आरती का विशेष महत्त्व

आदि शक्ति स्वरूप: माँ अम्बे सभी देवी शक्तियों की मूल स्रोत हैं। उनकी उपासना से साधक को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों में बल मिलता है।

नवरात्रि में विशेष महत्त्व: यह आरती नवरात्रि के दिनों में, दुर्गा पूजा में और प्रतिदिन संध्या आरती में गाई जाती है।

रक्षा एवं मार्गदर्शन: माता को “जगदम्बा” कहा गया है – वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रक्षक हैं और भक्तों को सदा सही मार्ग दिखाती हैं।

💖 भक्ति रस का संगम

🎯 संदेश

माँ आदि शक्ति अनंत शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। उनकी आरती से भक्त को निर्भयता, समृद्धि और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

✨ आस्था का प्रतीक

यह आरती हर उस भक्त के लिए प्रेरणा है जो माँ की कृपा से अपने जीवन में सुख, शांति और उन्नति चाहता है।

🙏 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। जय अम्बे गौरी ।।

॥ इति श्रीआदिशक्त्यारती सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ जय अम्बे गौरी ।।

आरती का शास्त्रीय व आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में देव पूजा की पूर्णता आरती से होती है। आरती शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'आर्त्रिका' से हुई है, जिसका अर्थ होता है विपत्ति का हरण करना या संकट दूर करना। पूजा-पाठ के दौरान होने वाली त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए पूजा के अंत में आरती करने का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती की थाली में सजाया गया दीया ईश्वर की दिव्य ज्योति का प्रतीक होता है। थाली में जलने वाली कपूर या घी की बत्तियां हमारे भीतर छुपे अंधकार (अज्ञान) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर जाने का प्रतीक हैं। आरती के समय घंटियों और घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

आरती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक शोध के अनुसार, आरती के दौरान जलने वाले कपूर (Camphor) और घी की सुगंध से वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं। आरती के समय बजने वाले शंख और तांबे की घंटियों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करने और मानसिक तनाव दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं।

आरती करने की सही शास्त्रीय विधि (Aarati Vidhi)

हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार, आरती घुमाने का एक निश्चित चक्र होता है, जिसका पालन अत्यंत आवश्यक है:

प्रथम चरण: चरणों की चार बार आरती आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों की ओर सबसे पहले चार बार घुमाना चाहिए। यह समर्पण और नमन का सूचक है।
द्वितीय चरण: नाभि की दो बार आरती इसके बाद भगवान की नाभि की ओर दो बार थाली घुमाई जाती है, जो कि सृष्टि के केंद्र की वंदना मानी गई है।
तृतीय चरण: मुखमंडल की एक बार आरती भगवान के मुखारविंद के सामने एक बार आरती घुमाएं, जिससे उनके सौंदर्य और करुणामय स्वरूप का दर्शन होता है।
चतुर्थ चरण: सम्पूर्ण स्वरूप की सात बार आरती अंत में, भगवान के मस्तक से लेकर चरणों तक, सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर चक्राकार रूप में सात बार आरती घुमाई जाती है।

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लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

सनातन संप्रदायों के शास्त्रों, भजनों और आरतियों का शोध कर प्रामाणिक पाठ उपलब्ध कराने वाली संस्था।

धार्मिक तथ्य-समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व देव साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक संस्कृत साहित्य)।

संदर्भ-आधारित समीक्षा
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें