श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 28

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 36 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||२८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
तत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाला
तु
लेकिन
महाबाहो
हे महाबाहो (अर्जुन)
गुणकर्मविभागयो
गुणों और कर्मों के विभाग का
गुणा
गुण
गुणेषु
गुणों में
वर्तन्ते
व्यवहार करते हैं
इति
इस प्रकार
मत्वा
जानकर
न
नहीं
सज्जते
आसक्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु हे महाबाहो! गुणों और कर्मों के विभाग के तत्त्व को जानने वाला यह समझकर कि "गुण गुणों में बरत रहे हैं", आसक्त नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का २८वाँ श्लोक मानव चेतना को अज्ञान के अंधकार से निकालकर परम विवेक के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक जाज्वल्यमान नक्षत्र है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन की उलझनों, मानसिक तनावों और कर्मों के बंधनों से मुक्त होने की एक व्यावहारिक कुंजी है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को 'तत्त्ववित्' अर्थात् उस ज्ञानी पुरुष के लक्षणों के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के त्रिगुणों (सत्त्व, रज, और तम) और उनके द्वारा संचालित होने वाले कर्मों के वास्तविक स्वरूप को भली-भांति जानता है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें पलायनवाद का उपदेश नहीं देता, बल्कि कर्मक्षेत्र में डटे रहकर भी आंतरिक रूप से पूर्णतः मुक्त रहने का मार्ग प्रशस्त करता है। जब हम यह समझ जाते हैं कि हमारी इन्द्रियाँ और बाहरी विषय केवल गुणों का एक आपसी खेल हैं, तो हमारे भीतर 'साक्षी भाव' (Witness Consciousness) का उदय होता है। यह बोध हमें कर्तापन के अहंकार से मुक्त करता है और हमें उस परम आनंद की ओर ले जाता है जो केवल आत्मा के धरातल पर ही संभव है। इस पावन श्लोक का अनुशीलन करने से साधक के भीतर एक अभूतपूर्व मानसिक शांति और समता का भाव जाग्रत होता है, जो उसे संसार के थपेड़ों के बीच भी अडिग रखता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥

tattvavit-tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ |
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na saज्जate || 28 ||


पठन एवं जप की प्रामाणिक विधि:

इस श्लोक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को एक निश्चित और पवित्र विधि का पालन करना चाहिए। यह विधि न केवल मन को एकाग्र करती है बल्कि श्लोक के स्पंदनों को सीधे हमारे अंतःकरण तक पहुँचाती है:

  • आसन एवं दिशा: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्याकाल में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • प्राणायाम और ध्यान: जप प्रारंभ करने से पूर्व तीन बार गहरे प्राणायाम (अनुलोम-विलोम) करें ताकि मन की चंचलता शांत हो सके। हृदय कमल पर भगवान श्रीकृष्ण के सारथी रूप का ध्यान करें।
  • उच्चारण की शुद्धता: श्लोक का उच्चारण करते समय 'महाबाहो' और 'गुणकर्मविभागयोः' के संधि-विच्छेदों पर विशेष ध्यान दें। प्रत्येक शब्द को स्पष्ट और मधुर स्वर में बोलें।
  • संकल्प और संख्या: इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 11, 21 या 108 बार मानसिक या वाचिक जप करें। जप के उपरांत कुछ क्षण मौन रहकर इसके अर्थ का चिंतन करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत का अगाध ज्ञान छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम प्रत्येक पद के शाब्दिक और उसके पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक रहस्यों को समझेंगे:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत्त्ववित् (tattvavit) परम सत्य या तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी पुरुष। वह व्यक्ति जो शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के पृथक-पृथक अस्तित्व को साक्षात् अनुभव कर चुका है। जो केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मानुभूति से संपन्न है।
तु (tu) परन्तु / लेकिन (अंतर स्पष्ट करने के लिए)। यह शब्द अज्ञानी (जो कर्मों में आसक्त रहते हैं) और ज्ञानी पुरुष के बीच के विशाल अंतर को रेखांकित करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।
महाबाहो (mahā-bāho) हे विशाल भुजाओं वाले (अर्जुन)! श्रीकृष्ण अर्जुन को उनकी शारीरिक और मानसिक शक्ति का स्मरण करा रहे हैं कि वे इस महान ज्ञान को समझने और धारण करने में पूर्णतः सक्षम हैं।
गुणकर्मविभागयोः (guṇa-karma-vibhāgayoḥ) गुणों और कर्मों के विभागों के वर्गीकरण को। प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) और उनके अनुसार होने वाले विभिन्न शारीरिक व मानसिक कर्मों के विभाजन का वास्तविक वैज्ञानिक ज्ञान।
गुणाः (guṇāḥ) प्रकृति के गुण (इन्द्रियाँ और अंतःकरण)। यहाँ 'गुणाः' का अर्थ उन इन्द्रियों, मन और बुद्धि से है जो प्रकृति के तीन गुणों से निर्मित हैं और उन्हीं के अधीन कार्य करती हैं।
गुणेषु (guṇeṣu) गुणों में ही (इन्द्रियों के विषयों में)। बाहरी जगत के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) भी प्रकृति के गुणों से ही बने हैं। अतः इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में ही विचरती हैं।
वर्तन्ते (vartante) कार्य कर रहे हैं / प्रवृत्त हो रहे हैं। यह निरंतर चलने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इन्द्रियों का अपने विषयों की ओर आकर्षित होना एक स्वाभाविक भौतिक नियम है।
इति (iti) इस प्रकार / ऐसा। इस सत्य को भली-भांति हृदयंगम करके, इस दृष्टिकोण को अपने जीवन का आधार बनाकर।
मत्वा (matvā) मानकर / भली-भांति जानकर। यह केवल बौद्धिक सहमति नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षण में इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव और दृढ़ निश्चय है।
न सज्जते (na sajjate) आसक्त नहीं होता / लिप्त नहीं होता। वह कर्म करते हुए भी उसके फलों या कर्तापन के अभिमान से नहीं बंधता। वह कीचड़ में कमल की भांति निर्लिप्त रहता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के उस भीषण युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र से जुड़ी है, जहाँ अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और युद्ध करने से मना कर देते हैं। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में हर उस मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन के संघर्षों से घबराकर अपने कर्तव्यों से भागना चाहता है। अर्जुन को लगता था कि वे ही कर्ता हैं और यदि वे युद्ध करेंगे तो कुल का नाश करने वाले पापी कहलाएंगे। उनके भीतर का यह 'कर्तापन का भाव' ही उनके दुःख और मोह का मूल कारण था।

इस मानसिक संकट के समाधान हेतु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सांख्य योग और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। इस २८वें श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व (ज्ञान और प्रकाश), रज (क्रिया और वासना), और तम (अज्ञान और आलस्य)—का ही खेल है। हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी इन्हीं गुणों से बनी हैं और वे जिन विषयों की ओर आकर्षित होती हैं, वे विषय भी इन्हीं गुणों के विकार हैं।

पौराणिक संदर्भों में, इस ज्ञान को समझाने के लिए उपनिषदों में 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' का सुंदर रूपक आता है, जहाँ एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी वृक्ष के फलों को स्वाद ले-लेकर खा रहा है (जो कि संसारी जीव है), जबकि दूसरा पक्षी केवल शांत भाव से उसे देख रहा है (जो कि साक्षी परमात्मा या ज्ञानी पुरुष है)। श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी दूसरे पक्षी की भांति 'साक्षी' बनने का उपदेश दे रहे हैं। जब मनुष्य स्वयं को कर्ता न मानकर केवल एक माध्यम या साक्षी मानने लगता है, तो वह पाप और पुण्य दोनों के बंधनों से ऊपर उठ जाता है। यही इस श्लोक की शाश्वत पृष्ठभूमि और संदेश है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का निरंतर चिंतन, मनन और जप करने से साधक के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन आते हैं। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि सब कुछ प्रकृति के नियमों के अधीन हो रहा है, तो व्यर्थ की चिंताएं और मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

2. साक्षी भाव (Witness Consciousness) का जागरण

यह श्लोक साधक को अपने ही विचारों और भावनाओं को एक तटस्थ दर्शक की तरह देखने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है।

3. कर्तापन के अहंकार का नाश

"मैं कर रहा हूँ" का यह मिथ्या अहंकार ही दुखों का कारण है। इस श्लोक के प्रभाव से साधक में नम्रता और समर्पण का भाव आता है।

4. कर्मों के बंधन से मुक्ति

अनासक्त भाव से किए गए कर्म कभी भी नए प्रारब्ध या कर्म बंधनों का निर्माण नहीं करते, जिससे साधक मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है।

5. एकाग्रता और निर्णय क्षमता में वृद्धि

मोह और आसक्ति के हटने से बुद्धि अत्यंत तीव्र, स्पष्ट और संतुलित हो जाती है, जिससे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेना आसान हो जाता है।

6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

इस श्लोक के दिव्य स्पंदन साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक आभामंडल (Aura) का निर्माण करते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसे सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे कि श्रीमद्भगवद्गीता (शांकरभाष्य), उपनिषदों और पूज्य आचार्यों की व्याख्याओं के गहन अध्ययन के पश्चात संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शुद्ध और दार्शनिक रूप से सटीक ज्ञान पहुँचाना है। इस श्लोक की व्याख्या में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचते हुए, केवल वही तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं जो हमारे प्राचीन ऋषियों और आधुनिक वेदांतियों द्वारा परीक्षित और स्वीकृत हैं। यह सामग्री साधकों के बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए एक विश्वसनीय मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'तत्त्ववित्' का अर्थ है वह व्यक्ति जो परम सत्य या मूल तत्वों को जानता है। सांख्य दर्शन के अनुसार, जो पुरुष (चेतना) और प्रकृति (जड़ जगत) के अंतर को प्रत्यक्ष रूप से समझ लेता है, वही तत्त्ववित् है। ऐसा व्यक्ति जानता है कि शरीर और मन केवल प्रकृति के औजार हैं, जबकि वह स्वयं अविनाशी आत्मा है।

इसका अर्थ है कि हमारी इन्द्रियाँ (जो प्रकृति के गुणों से बनी हैं) अपने-अपने विषयों (जो स्वयं भी गुणों के ही रूप हैं) में स्वाभाविक रूप से विचरती हैं। जैसे, आँखों का काम देखना है और जीभ का काम स्वाद लेना है। जब हम इस सत्य को समझ लेते हैं, तो हम इन्द्रियों की दौड़ से खुद को अलग कर लेते हैं और उनके गुलाम नहीं बनते।

'महाबाहो' का अर्थ है 'विशाल और शक्तिशाली भुजाओं वाले'। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह याद दिला रहे हैं कि वे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत शक्तिशाली हैं। वे इस गहन और सूक्ष्म ज्ञान को समझने तथा अपने जीवन में उतारने की पूरी सामर्थ्य रखते हैं।

बिल्कुल नहीं। यह श्लोक आलस्य का नहीं, बल्कि 'अनासक्त कर्म' का उपदेश देता है। जब आप कर्तापन के बोझ और फल की चिंता से मुक्त हो जाते हैं, तो आप अपने कार्य को और अधिक कुशलता, एकाग्रता और आनंद के साथ कर पाते हैं। यह कर्म से भागना नहीं, बल्कि कर्म की कला सिखाता है।

जब हम किसी असफलता या विपरीत परिस्थिति से दुखी होते हैं, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम खुद को उस परिस्थिति का कर्ता और भोक्ता मान लेते हैं। इस श्लोक का ध्यान हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां और हमारे विचार केवल प्रकृति के गुणों का प्रवाह हैं। इस बोध से मन में तुरंत शांति और समता का उदय होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन संदेश को अपने जीवन में उतारें और आनंदमयी जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning

तत्त्वज्ञ यह जानता है कि गुण ही गुणों में क्रिया कर रहे हैं, इसलिए वह आसक्त नहीं होता। The knower of truth understands that the guṇas are acting among themselves; therefore he does not become attached.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/43 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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🚩 दैनिक अमृतवाणी

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पंचांग
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