कर्म योग (Karma Yoga) – श्लोक 27
श्लोक २७ में बताया गया है कि अहंकार से जीव स्वयं को कर्ता मानता है। Verse 27: Deluded by ego, the soul thinks itself the doer.
संस्कृत श्लोक
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः | अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||२७||
prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ | ahaṅkāravimūḍhātmā kartāham iti manyate ||27||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रकृते: प्रकृति के; क्रियमाणानि: किए जाते हुए; गुणै: गुणों द्वारा; कर्माणि: समस्त कर्म; सर्वश: सभी प्रकार से; अहङ्कारविमूढात्मा: अहंकार से मोहित हुआ जीव; कर्ता: कर्ता; अहम्: मैं; इति: इस प्रकार; मन्यते: मानता है।
हिंदी अनुवाद
सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। फिर भी अहंकार से मोहित जीव "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है।
English Translation
All actions are performed by the modes of material nature (guṇas). But deluded by ego, the soul thinks, "I am the doer."
टीका / Commentary
यह गीता का एक प्रमुख सिद्धान्त है – वास्तव में कर्म तो प्रकृति के गुण करते हैं, पर अहंकार के कारण जीव अपने को कर्ता समझ लेता है। इसी भ्रम से बन्धन होता है। This is a key teaching of the Gita – actions are actually performed by the guṇas of nature, but due to ego, the soul considers itself the doer. This delusion causes bondage.