श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 15

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 45 मिनट का पठन 149 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् | तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||१५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
कर्म
कर्म
ब्रह्मोद्भवम्
वेद से उत्पन्न
विद्धि
जानो
ब्रह्म
वेद
अक्षरसमुद्भवम्
अक्षर (परब्रह्म) से उत्पन्न
तस्मात्
इसलिए
सर्वगतम्
सर्वव्यापी
ब्रह्म
परब्रह्म
नित्यम्
सदा
यज्ञे
यज्ञ में
प्रतिष्ठितम्
स्थित है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कर्म (यज्ञ) को वेद से उत्पन्न जानो और वेद को अक्षर (परब्रह्म) से उत्पन्न। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का पंद्रहवाँ श्लोक सनातन धर्म के सबसे गहन दार्शनिक और व्यावहारिक सिद्धांतों में से एक है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म की उत्पत्ति, वेदों के प्राकट्य और परब्रह्म की सर्वव्यापकता के बीच के उस अटूट संबंध को समझा रहे हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरोता है। भगवान स्पष्ट करते हैं कि वैदिक कर्मकांड केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे उस परम चेतना (ब्रह्म) की ही अभिव्यक्ति हैं जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। जब हम नि:स्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो हमारा प्रत्येक कार्य 'यज्ञ' बन जाता है, और उस यज्ञ में साक्षात् परब्रह्म की उपस्थिति स्वतः ही सुनिश्चित हो जाती है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि मानव जीवन एकाकी नहीं है। हम सभी इस विशाल ब्रह्मांडीय पारिस्थितिकी तंत्र (Cosmic Ecosystem) का एक अभिन्न हिस्सा हैं। हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म समष्टि (संपूर्ण ब्रह्मांड) को प्रभावित करता है। इसलिए, कर्मों को स्वार्थ से ऊपर उठाकर लोक-कल्याण और ईश्वरीय आराधना के रूप में करना ही वास्तविक यज्ञ है। यह श्लोक हमें संकीर्ण व्यक्तिगत सीमाओं से बाहर निकालकर उस विराट चेतना से जोड़ता है जहाँ कर्म बंधन नहीं बनता, बल्कि मोक्ष का द्वार बन जाता है। आइए, इस परम पावन श्लोक के गूढ़ रहस्यों, इसके दार्शनिक आयामों और व्यावहारिक जीवन में इसकी उपयोगिता का विस्तार से अध्ययन करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् |

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||१५||"

देवनागरी लिपि एवं सस्वर पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। पाठ करते समय प्रत्येक चरण के अंत में यति (विराम) का ध्यान रखना आवश्यक है। प्रथम चरण "कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि" पर अल्प विराम लें, फिर "ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्" पूर्ण करें। इसी प्रकार द्वितीय पंक्ति में भी विराम का पालन करें।

रोमन लिप्यंतरण (Transliteration):

karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣara-samudbhavam |
tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣṭhitam ||

सस्वर उच्चारण निर्देश:
  • कर्म (karma): 'क' और 'म' पर समान बल दें।
  • ब्रह्मोद्भवं (brahmodbhavaṁ): 'ह' और 'म' के संयुक्त स्वर का स्पष्ट उच्चारण करें।
  • ब्रह्माक्षर (brahmākṣara): 'क्ष' का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए।
  • प्रतिष्ठितम् (pratiṣṭhitam): अंत में अनुस्वार का मकार रूप में मंद उच्चारण करें।
साधना एवं जप विधि:

इस श्लोक के नियमित चिंतन और जप के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और शांत चित्त से इस श्लोक का कम से कम 11 या 21 बार मानसिक या वाचिक जप करें। यह जप बुद्धि को सात्विक बनाता है और कर्मों में कुशलता प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत का गहरा रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरणिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कर्म (Karma) कर्तव्य कर्म, नियत कार्य वेदों द्वारा निर्देशित वे शुभ कर्म जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इसमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों स्तर के कर्म सम्मिलित हैं।
ब्रह्मोद्भवं (Brahmodbhavama) ब्रह्म (वेदों) से उत्पन्न यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग वेदों के लिए हुआ है। इसका अर्थ है कि समस्त कर्तव्य कर्मों की उत्पत्ति और उनकी मर्यादा वेदों द्वारा ही निर्धारित होती है।
विद्धि (Viddhi) जानो, समझो भगवान अर्जुन को केवल सूचना नहीं दे रहे, बल्कि उसे इस सत्य का साक्षात् अनुभव करने और इसे अपनी बुद्धि में गहराई से स्थापित करने का निर्देश दे रहे हैं।
ब्रह्म (Brahma) वेद, ज्ञान का पुंज यह शब्द यहाँ शब्द-ब्रह्म (वेदों) को इंगित करता है, जो ईश्वर की श्वास के रूप में प्रकट हुए हैं और सृष्टि के संचालन का नियम-पुस्तिका हैं।
अक्षर-समुद्भवम् (Akshara-Samudbhavama) अविनाशी परमात्मा से प्रकट वेद स्वयं उस अविनाशी, निर्गुण-निराकार परब्रह्म (अक्षर पुरुष) से उत्पन्न हुए हैं। अतः वेदों का ज्ञान नित्य और शाश्वत है।
तस्मात् (Tasmat) इस कारण से, अतः चूँकि कर्म वेदों से और वेद अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए इस कार्य-कारण संबंध के आधार पर निष्कर्ष निकलता है।
सर्व-गतम् (Sarva-gatam) सर्वव्यापी, सब जगह रहने वाला वह परम सत्य या ब्रह्म किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है; वह चराचर जगत के प्रत्येक अणु, प्रत्येक जीव और प्रत्येक क्रिया में समान रूप से व्याप्त है।
ब्रह्म (Brahma) परमात्मा, परम सत्य यहाँ 'ब्रह्म' का अर्थ साक्षात् सच्चिदानंद घन परमात्मा है, जो संपूर्ण सृष्टि का अधिष्ठान है।
नित्यम् (Nityam) सदा, निरंतर यह उपस्थिति क्षणिक नहीं है। परमात्मा की यह सत्ता काल और परिस्थिति की सीमाओं से परे, सदैव एकरस और शाश्वत रूप से विद्यमान रहती है।
यज्ञे (Yajne) यज्ञ में, नि:स्वार्थ कर्म में यज्ञ केवल वेदी पर दी जाने वाली आहुति नहीं है, बल्कि लोक-कल्याण के लिए किया जाने वाला प्रत्येक समर्पित और नि:स्वार्थ कर्म ही यज्ञ है।
प्रतिष्ठितम् (Pratishthitam) स्थित है, प्रतिष्ठित है जब भी कोई कर्म यज्ञ की भावना से किया जाता है, तो वहाँ परमात्मा साक्षात् प्रकट हो जाते हैं। यज्ञ ही ईश्वर का साक्षात् निवास स्थान है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के उस निर्णायक मोड़ पर जाना होगा जहाँ अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने धनुष-बाण रख देते हैं। अर्जुन का भ्रम यह था कि कर्म (विशेषकर युद्ध जैसा घोर कर्म) केवल पाप और बंधन का कारण बनता है। वे सन्यास को श्रेष्ठ मानकर कर्मों से भागना चाहते थे। इस भ्रांति को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 'कर्म चक्र' (Cosmic Cycle of Action) का प्रतिपादन किया।

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि इस सृष्टि का निर्माण ही एक महान यज्ञ के माध्यम से हुआ है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'पुरुष सूक्त' में भी वर्णन आता है कि आदिपुरुष परमात्मा ने स्वयं को यज्ञ की आहुति बनाकर इस चराचर जगत की रचना की। इस प्रकार, सृष्टि की उत्पत्ति ही यज्ञ से हुई है। जब भगवान कहते हैं कि "कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि", तो वे अर्जुन को यह स्मरण करा रहे हैं कि जो कर्म वेदों में बताए गए हैं, वे कोई मानवनिर्मित नियम नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि के आदि-स्रोत 'ब्रह्म' से प्रकट हुए हैं।

पौराणिक ग्रंथों में एक सुंदर कथा आती है कि जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने जीवों के साथ-साथ 'यज्ञ' को भी उत्पन्न किया और कहा कि इस यज्ञ के द्वारा ही तुम लोग परस्पर उन्नति को प्राप्त होगे। मनुष्य यज्ञ के द्वारा देवताओं को पुष्ट करेंगे और देवता वर्षा तथा अन्न के माध्यम से मनुष्यों को पुष्ट करेंगे। यह जो परस्पर सहयोग का चक्र है, वही सृष्टि का आधार है। यदि कोई इस चक्र में अपना योगदान नहीं देता, अर्थात् अपने नियत कर्मों को नहीं करता, तो वह इस सृष्टि चक्र को बाधित करता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि वेद भगवान के श्वास हैं ("अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो...")। चूँकि वेद अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुए हैं, इसलिए वेदों द्वारा प्रतिपादित कर्म भी दिव्य हैं। जब कोई व्यक्ति इन कर्मों को निष्काम भाव से करता है, तो वह सीधे उस अविनाशी परमात्मा से जुड़ जाता है। यही कारण है कि भगवान कहते हैं कि सर्वव्यापी ब्रह्म सदैव यज्ञ में प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकार, कर्म से भागना नहीं, बल्कि कर्म को यज्ञ बनाकर जीना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित मनन, चिंतन और इसके सिद्धांतों को जीवन में उतारने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति: जब साधक यह समझ जाता है कि उसके कर्मों का फल अंततः परमात्मा के अधीन है और कर्म स्वयं ईश्वर से जुड़े हैं, तो वह व्यर्थ की चिंताओं और तनाव से मुक्त हो जाता है।
  • चित्त की शुद्धि (Purification of Mind): निष्काम भाव से कर्म करने की प्रेरणा मिलने के कारण मन में जमा स्वार्थ, लोभ और अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस श्लोक के सस्वर पाठ से उत्पन्न होने वाले कंपन मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करते हैं और शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक सकारात्मक आभामंडल (Aura) का निर्माण करते हैं।
  • कर्तव्य बोध की जागृति: यह श्लोक आलस्य और प्रमाद को दूर भगाता है। यह व्यक्ति को अपने पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति सजग और सक्रिय बनाता है।
  • ईश्वरीय सानिध्य का अनुभव: "नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्" के सिद्धांत के अनुसार, जब हम अपने कार्यों को सेवा भाव से करते हैं, तो हमें हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है।
  • प्रारब्ध कर्मों का क्षय: यज्ञ रूपी कर्मों के अनुष्ठान से संचित और क्रियमाण पाप कर्मों का प्रभाव धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है, जिससे जीवन का मार्ग सुगम हो जाता है।
  • एकाग्रता और फोकस में वृद्धि: विद्यार्थियों और कामकाजी लोगों के लिए इस श्लोक का चिंतन अत्यंत लाभकारी है, क्योंकि यह कर्म में ही ध्यान (Meditation in Action) लगाने की कला सिखाता है।
  • समष्टि के साथ तादात्म्य: यह श्लोक व्यक्ति को स्वार्थी सोच से ऊपर उठाकर संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण (वसुधैव कुटुम्बकम्) की भावना से ओत-प्रोत करता है।
  • भय और असुरक्षा की भावना का अंत: जब साधक को यह विश्वास हो जाता है कि वह उस सर्वव्यापी, अविनाशी 'अक्षर' पुरुष की व्यवस्था का हिस्सा है, तो उसका मृत्यु और हानि का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण Bhaktilok.in के विद्वत मंडल द्वारा तैयार की गई एक संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस व्याख्या का मुख्य उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को जनमानस के लिए सरल, सुबोध और व्यावहारिक बनाना है। इस सामग्री को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य जी के 'शांकरभाष्य', रामानुजाचार्य जी के 'श्रीभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों का गहन अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, सनातन धर्म के वैज्ञानिक और तार्किक पक्षों से परिचित कराना है। यह आलेख पूरी तरह से शास्त्रीय मर्यादाओं और आधुनिक शोध पद्धतियों के समन्वय पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक में 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग संदर्भों में हुआ है। पहली पंक्ति में "कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि" और "ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्" में 'ब्रह्म' का अर्थ 'वेद' (शब्द-ब्रह्म) से है, क्योंकि वेद ही कर्मों के विधान को प्रकट करते हैं। वहीं दूसरी पंक्ति में "तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म" में 'ब्रह्म' का अर्थ 'परमात्मा' (सच्चिदानंद घन ब्रह्म) से है, जो सर्वव्यापी हैं और सृष्टि के कण-कण में विद्यमान हैं।

'अक्षर' का शाब्दिक अर्थ है जिसका कभी क्षरण या विनाश न हो (न क्षरति इति अक्षरम्)। यह परब्रह्म परमात्मा का सूचक है। वेद किसी मनुष्य द्वारा रचित ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि वे अपौरुषेय हैं। वे सृष्टि के प्रारंभ में उस अविनाशी परमात्मा (अक्षर) के श्वास के रूप में स्वतः प्रकट हुए थे। इसलिए वेदों को 'अक्षरसमुद्भवम्' कहा गया है, अर्थात् वे अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि यद्यपि परमात्मा सर्वव्यापी हैं और हर जगह मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रत्यक्ष अनुभव केवल वहीं किया जा सकता है जहाँ 'यज्ञ' की भावना हो। जब हम नि:स्वार्थ भाव से, दूसरों की सेवा और भलाई के लिए कर्म करते हैं, तो उस कर्मस्थल पर परमात्मा की दिव्य उपस्थिति स्वतः ही सघन हो जाती है। जैसे दूध में घी हर जगह होता है पर मथने से ही प्रकट होता है, वैसे ही सर्वव्यापी ईश्वर यज्ञ रूपी कर्मों से प्रकट होते हैं।

हाँ, बिल्कुल। गीता के अनुसार यज्ञ केवल भौतिक अग्नि में आहुति देना नहीं है। अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, समाज के वंचित वर्ग की सहायता करना, पर्यावरण की रक्षा करना, ज्ञान का प्रसार करना और अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना - ये सभी 'ज्ञान यज्ञ', 'द्रव्य यज्ञ' और 'तपो यज्ञ' के अंतर्गत आते हैं। कोई भी कार्य जो स्वार्थ से रहित होकर लोक-संग्रह के लिए किया जाए, वह यज्ञ ही है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें अपने दैनिक कार्यों को बोझ या मजबूरी नहीं समझना चाहिए। प्रत्येक कार्य को ईश्वर की पूजा मानकर पूरी निष्ठा और कुशलता से करना चाहिए। जब हम इस दृष्टिकोण के साथ काम करते हैं, तो हमारा कार्यस्थल ही हमारा मंदिर बन जाता है और हमारा जीवन तनावमुक्त, आनंदमय और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो जाता है।

"यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||"

अर्थात्: जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा अर्चना करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning

यज्ञ वेद से, वेद ब्रह्म से – इसलिए ब्रह्म यज्ञ में स्थित है। Sacrifice comes from the Vedas, the Vedas from Brahman – thus Brahman is present in sacrifice.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/43 35% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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