श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 16

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 39 मिनट का पठन 148 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः | अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ||१६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
एवम्
इस प्रकार
प्रवर्तितम्
प्रवर्तित (चलाया गया)
चक्रम्
चक्र
न
नहीं
अनुवर्तयति
अनुसरण करता
इह
इस संसार में
य
जो
अघायु
पापमय जीवन वाला
इन्द्रियाराम
इन्द्रियों में रमण करने वाला
मोघम्
व्यर्थ
पार्थ
हे पार्थ
स
वह
जीवति
जीता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! जो इस प्रकार प्रवर्तित (चलाए गए) यज्ञ चक्र का अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला, इन्द्रियों में रमण करने वाला व्यर्थ जीता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का सोलहवां श्लोक संपूर्ण ब्रह्मांड की अंतर्संबंधता, पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन के परम कर्तव्य का एक अनुपम और वैज्ञानिक निरूपण है। इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को उस विराट 'सृष्टि चक्र' (Cosmic Cycle) के विषय में सचेत कर रहे हैं, जो यज्ञ, वर्षा, अन्न और प्राणियों के पारस्परिक सहयोग से निरंतर गतिमान रहता है। भगवान स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं कि जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार चलाए हुए चक्र के अनुकूल आचरण नहीं करता, वह केवल अपनी इंद्रियों की तृप्ति में लिप्त रहकर एक अत्यंत पापी और व्यर्थ जीवन जीता है।

यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक घोषणापत्र है। यह हमें सिखाता है कि हम इस सृष्टि से पृथक नहीं हैं; हमारा अस्तित्व इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था के ऋणी होने पर टिका हुआ है। यदि हम केवल उपभोग करेंगे और बदले में समाज, प्रकृति तथा ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन (यज्ञ) नहीं करेंगे, तो हम इस सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ेंगे। आज के आधुनिक युग में, जहाँ पर्यावरण संकट, अत्यधिक उपभोक्तावाद और मानसिक अशांति चरम पर है, श्रीकृष्ण का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह श्लोक हमें स्वार्थ से परमार्थ की ओर ले जाने वाला एक दिव्य मार्गदर्शक है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।"

"अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥"

संस्कृत पद-विच्छेद (Sandhi Vigraha):

एवम् — प्रवर्तितम् — चक्रम् — न — अनुवर्तयति — इह — यः ।
अघ-आयुः — इन्द्रिय-आरामः — मोघम् — पार्थ — सः — जीवति ॥

अन्वय (Prose Order in Sanskrit):

पार्थ! यः इह एवम् प्रवर्तितं चक्रं न अनुवर्तयति, सः अघायुः इन्द्रियारामः मोघं जीवति।

पवित्र पाठ एवं जप की शास्त्रीय विधि:
  • समय: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्याकाल में करना सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन एवं दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • ध्यान: हृदय कमल में रथ पर सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें, जो अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं।
  • संकल्प: अपने भीतर से स्वार्थ की भावना को समाप्त करने और निष्काम कर्मयोग की भावना को जाग्रत करने का संकल्प लें।
  • उच्चारण: श्लोक के प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट, धीमा और लयबद्ध होना चाहिए ताकि उसकी ध्वनि तरंगें आपके चक्रों को प्रभावित कर सकें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत और व्यावहारिक जीवन का गहरा रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरण सम्मत अर्थ और उसका आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
एवम् (Evam) इस प्रकार से / इस रीति से यह पूर्ववर्ती श्लोकों (१४ और १५) में वर्णित यज्ञ चक्र की ओर संकेत करता है, जहाँ कर्म से यज्ञ, यज्ञ से पर्जन्य (वर्षा), वर्षा से अन्न और अन्न से जीवन की उत्पत्ति होती है।
प्रवर्तितम् (Pravartitam) चलाए हुए / स्थापित किए गए परमेश्वर द्वारा सृष्टि के प्रारंभ में स्थापित की गई प्राकृतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था, जो स्वतः और अनवरत रूप से क्रियाशील रहती है।
चक्रम् (Cakram) चक्र को (Cosmic Cycle) पारस्परिक निर्भरता का चक्र। जैसे रथ का पहिया घूमने से रथ आगे बढ़ता है, वैसे ही सृष्टि के सभी तत्वों के परस्पर सहयोग से ही जीवन का चक्र चलता है।
न अनुवर्तयति (Na Anuvartayati) अनुसरण नहीं करता है जो मनुष्य इस चक्र में अपना योगदान नहीं देता, जो केवल समाज और प्रकृति से लेता है परंतु बदले में कुछ भी समर्पित नहीं करता (कर्तव्य विमुखता)।
इह (Iha) इस संसार में / इस मानव जीवन में यह विशेष रूप से मानव योनि के लिए है, क्योंकि केवल मनुष्य के पास ही विवेक और कर्म करने की स्वतंत्रता है। पशु-पक्षी तो स्वतः ही प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं।
यः (Yaḥ) जो कोई भी मनुष्य यह नियम सार्वभौमिक है; यह किसी जाति, धर्म या संप्रदाय विशेष के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए समान रूप से लागू होता है।
अघ-आयुः (Agha-āyuḥ) पापमय जीवन जीने वाला 'अघ' का अर्थ है पाप और 'आयु' का अर्थ है जीवन। जो व्यक्ति सृष्टि चक्र में सहयोग नहीं करता, उसका प्रत्येक क्षण और उसकी पूरी आयु पाप की श्रेणी में आती है।
इन्द्रिय-आरामः (Indriya-ārāmaḥ) इंद्रियों के भोगों में रमण करने वाला ऐसा व्यक्ति जिसका एकमात्र उद्देश्य अपनी जीभ, आँख, कान और त्वचा आदि इंद्रियों को तृप्त करना है। वह केवल अपने शारीरिक और मानसिक सुखों तक ही सीमित रहता है।
मोघम् (Mogham) व्यर्थ ही / निष्फल उसका इस पृथ्वी पर जन्म लेना, श्वास लेना और जीवित रहना पूरी तरह से निरर्थक है। वह समाज और प्रकृति पर केवल एक बोझ मात्र है।
पार्थ (Pārtha) हे पृथापुत्र (अर्जुन)! श्रीकृष्ण अर्जुन को उनकी माता पृथा (कुंती) के माध्यम से उनके क्षत्रिय और वीर वंश की याद दिलाते हैं, ताकि वे अपने महान कर्तव्यों के प्रति सजग हो सकें।
सः जीवति (Saḥ Jīvati) वह जीता है वह केवल भौतिक रूप से जीवित दिखाई देता है, परंतु आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से वह मृतप्राय ही है। उसका जीवन पशुवत है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें वैदिक काल की यज्ञीय संस्कृति और श्रीमद्भगवद्गीता के कुरुक्षेत्र युद्ध के संदर्भ को समझना होगा। महाभारत युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और कर्म से पलायन करने की चेष्टा करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म से भागना कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि संपूर्ण ब्रह्मांड कर्म के सिद्धांत पर ही आधारित है।

वैदिक दर्शन के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्यों और यज्ञों की एक साथ रचना की थी। ब्रह्मा जी ने कहा था कि "तुम इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को पुष्ट करो और देवता तुम्हें पुष्ट करेंगे। इस प्रकार परस्पर सहयोग से तुम दोनों परम कल्याण को प्राप्त होगे।" (गीता ३.११)। यह यज्ञ केवल वेदियों में दी जाने वाली आहुति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। जब सूर्य अपनी गर्मी से समुद्र के जल को वाष्पित करता है, तो वह एक यज्ञ है। जब बादल बरसकर पृथ्वी को सींचते हैं, तो वह यज्ञ है। जब पृथ्वी अन्न उपजाती है, तो वह यज्ञ है। और जब मनुष्य उस अन्न को ग्रहण करके समाज की सेवा में अपने शरीर को लगाता है, तो वह भी यज्ञ है।

पौराणिक आख्यानों में राजा जनक और महर्षि याज्ञवल्क्य के संवादों में भी इस चक्र का विस्तृत वर्णन मिलता है। राजा जनक ने अपने जीवन को इसी यज्ञ चक्र के अनुरूप ढाला था। वे राजा होते हुए भी स्वयं को केवल एक न्यासी (Trustee) मानते थे और प्रजा के कल्याण के लिए निरंतर कर्म करते थे। इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति इस चक्र को तोड़ता है—जैसे कि रावण या हिरण्यकशिपु जैसे असुरों ने किया, जिन्होंने केवल अपनी इंद्रियों की तृप्ति और अहंकार की संतुष्टि के लिए प्रकृति और समाज का शोषण किया—तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यही चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तुम अपने कर्तव्य (युद्ध) से विमुख होते हो, तो तुम भी इस दिव्य चक्र को तोड़ने के दोषी बनोगे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और इसके अर्थ का जीवन में समावेश करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

१. स्वार्थ की भावना का समूल नाश

यह श्लोक हमें निरंतर याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं जी रहे हैं। इसके प्रभाव से साधक के भीतर संकीर्ण स्वार्थ की भावना समाप्त होती है और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना जाग्रत होती है।

२. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारा जीवन एक बड़े ब्रह्मांडीय चक्र का हिस्सा है, तो भविष्य की चिंताएं और मानसिक तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं और मन में असीम शांति का संचार होता है।

३. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) की शुद्धि

इस श्लोक के स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का क्षेत्र निर्मित होता है, जो नकारात्मक विचारों और बुरी शक्तियों से रक्षा करता है।

४. संचित कर्मों का शोधन

निष्काम भाव से कर्तव्य कर्म करने की प्रेरणा मिलने के कारण, साधक के नए कर्म बंधन नहीं बनते और पुराने संचित पाप कर्मों का धीरे-धीरे क्षय होने लगता है।

५. इंद्रिय संयम और आत्म-नियंत्रण

श्लोक में 'इन्द्रियारामः' (इंद्रियों में रमण करने वाले) की भर्त्सना की गई है। इसके नियमित पाठ से साधक को अपनी ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण पाने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।

६. प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता

यह श्लोक हमें पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देता है। साधक जल, वायु, वृक्षों और पशु-पक्षियों के प्रति दयालु बनता है, जिससे वह प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर पाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शांकरभाष्य', श्री रामानुजाचार्य कृत 'गीताभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों के गहन अध्ययन पर आधारित है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, गीता के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। हमारा उद्देश्य सनातन ज्ञान की इस अमूल्य धरोहर को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना है ताकि युवा पीढ़ी भी इसके महत्व को समझ सके और अपने जीवन को अधिक सार्थक, संतुलित और तनावमुक्त बना सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यहाँ 'चक्र' से तात्पर्य 'सृष्टि चक्र' या 'यज्ञ चक्र' से है। यह प्रकृति और जीवों के बीच की अंतर्संबंधता को दर्शाता है। वेद कहते हैं कि परमेश्वर से कर्म उत्पन्न होते हैं, कर्मों से यज्ञ (कर्तव्य कर्म) संपन्न होते हैं, यज्ञ से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न पैदा होता है, और अन्न से सभी प्राणियों का जीवन चलता है। यह एक निरंतर चलने वाला चक्र है। यदि कोई भी इस चक्र में अपना योगदान देना बंद कर दे, तो पूरी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

'अघायुः' का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जिसका जीवन केवल पाप संचय करने में बीतता है। आज के संदर्भ में, जो लोग प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करते हैं, प्रदूषण फैलाते हैं, और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर केवल अपने बैंक बैलेंस और भौतिक सुखों को बढ़ाने में लगे रहते हैं, वे 'अघायुः' हैं। उनका जीवन दूसरों के अधिकारों को छीनकर जिया जा रहा है, इसलिए वह पापमय है।

'इन्द्रियारामः' वह व्यक्ति है जो केवल अपनी इंद्रियों के भोगों (जैसे स्वाद, वासना, आलस्य, और मनोरंजन) में ही आनंद ढूंढता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा जीवन 'मोघम्' यानी पूरी तरह से व्यर्थ है। इसका कारण यह है कि मनुष्य योनि केवल भोग भोगने के लिए नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और लोक-कल्याण के लिए मिली है। यदि हम केवल इंद्रिय सुख में लगे रहेंगे, तो हममें और पशुओं में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

यह संदेश विशेष रूप से गृहस्थों और कर्मक्षेत्र में सक्रिय लोगों के लिए है। संन्यासी तो पहले ही भौतिक प्रपंचों से दूर हो चुके हैं, परंतु गृहस्थों को समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना होता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए दान देना, परोपकार करना, पर्यावरण की रक्षा करना और ईमानदारी से अपने कार्य करना ही इस 'यज्ञ चक्र' का अनुसरण करना है।

हम बहुत ही सरल तरीकों से इस चक्र में सहयोग कर सकते हैं: १. जल और ऊर्जा की बचत करके, २. पेड़-पौधे लगाकर और पर्यावरण को स्वच्छ रखकर, ३. भूखे और जरूरतमंद लोगों की सहायता करके, ४. अपने कार्यक्षेत्र में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से काम करके, और ५. प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में बिताकर। यही आधुनिक युग का वास्तविक यज्ञ है।

© Bhaktilok.in - श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश का प्रसार। सर्वे भवन्तु सुखिनः।

श्लोक का अर्थ / Meaning

जो इस यज्ञ चक्र का अनुसरण नहीं करता, वह केवल इन्द्रिय सुख में लिप्त रहता है और उसका जीवन व्यर्थ है। One who does not follow this cycle lives for sense pleasure and lives in vain.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/43 37% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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