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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 16

अध्याय 3 · श्लोक 16

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः | अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ||१६||

evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ | aghāyur indriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एवम्: इस प्रकार; प्रवर्तितम्: प्रवर्तित (चलाया गया); चक्रम्: चक्र; न: नहीं; अनुवर्तयति: अनुसरण करता; इह: इस संसार में; य: जो; अघायु: पापमय जीवन वाला; इन्द्रियाराम: इन्द्रियों में रमण करने वाला; मोघम्: व्यर्थ; पार्थ: हे पार्थ; स: वह; जीवति: जीता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो इस प्रकार प्रवर्तित (चलाए गए) यज्ञ चक्र का अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला, इन्द्रियों में रमण करने वाला व्यर्थ जीता है।

English Translation

O Partha, one who does not follow the wheel of sacrifice thus set in motion lives a life of sin, delighting in the senses – such a person lives in vain.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान अब कहते हैं कि जो इस वैश्विक चक्र (यज्ञ-वर्षा-अन्न-प्राणी) में सहयोग नहीं करता, वह केवल अपने इन्द्रिय सुख में लगा रहता है – उसका जीवन व्यर्थ है। यह सामाजिक और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का बोध कराता है। The Lord now says that one who does not participate in this cosmic cycle of sacrifice lives only for sense pleasure – such a life is futile. This highlights social and spiritual responsibility.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।