श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 1

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 41 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ऊर्ध्वमूलम्
ऊपर मूल (जड़) वाला
अधःशाखम्
नीचे शाखाओं वाला
अश्वत्थम्
पीपल का वृक्ष
प्राहुः
कहते हैं
अव्ययम्
अविनाशी
छन्दांसि
वेद (छन्द)
यस्य
जिसके
पर्णानि
पत्ते
यः
जो
तम्
उस (वृक्ष) को
वेद
जानता है
सः
वह
वेदवित्
वेदों का ज्ञाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ऊपर मूल (जड़) और नीचे शाखाओं वाले अविनाशी पीपल के वृक्ष की बात कहते हैं, जिसके पत्ते वेद हैं; जो उसे जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्यात्म और ब्रह्मांडीय चेतना का परिचय

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त उपनिषदों का सार और मोक्ष का मार्गदर्शक माना गया है। भगवान श्रीकृष्णा ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को जिस ज्ञान का अमृत पान कराया है, उसमें पंद्रहवें अध्याय का यह प्रथम श्लोक (ऊर्ध्वमूलमधःशाखम...) अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। इस श्लोक में संसार को एक अलौकिक 'अश्वत्थ वृक्ष' (पीपल के वृक्ष) के रूप में चित्रित किया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर ब्रह्मलोक में हैं और शाखाएँ नीचे की ओर संसार में फैली हुई हैं। यह रूपक इस भौतिक जगत की नश्वरता, जटिलता और उसके मूल स्रोत को समझने की एक अद्वितीय कुंजी प्रदान करता है।

सांसारिक मोह-माया के चक्रव्यूह में उलझे हुए मनुष्य के लिए यह श्लोक एक जागृति संदेश का कार्य करता है। जब साधक यह समझ जाता है कि इस अनंतिम संसार रूपी वृक्ष का मूल आधार स्वयं परम ब्रह्म परमात्मा हैं, तब वह बाहरी प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपनी चेतना को आंतरिक मूल की ओर मोड़ने में सक्षम हो जाता है। इस दिव्य रचना का पठन, मनन और इसके गूढ़ार्थ का चिंतन मनुष्य को भवसागर से तरने का संबल प्रदान करता है। Bhaktilok.in के इस विशेष पावन आलेख में हम इसी महामंत्र के एक-एक शब्द, उसके दार्शनिक निहितार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में उसके लाभों का अत्यंत सूक्ष्मता और विद्वत्ता के साथ विश्लेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक

॥ श्रीमद्भगवद्गीता पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) - श्लोक १ ॥

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १॥

सरल संस्कृत उच्चारण (पदच्छेद):

ऊर्ध्व-मूलम् अधः-शाखम् अश्वत्थम् प्राहूः अव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यः तम् वेद सः वेद-वित् ॥

इस श्लोक का उच्चारण करने मात्र से जिह्वा और मन पवित्र हो जाते हैं। इसका प्रत्येक वर्ण वेदों की ऋचाओं के समान ऊर्जावान है। जब साधक एकाग्रचित होकर इस श्लोक का सस्वर पाठ करता है, तो उसके भीतर की आध्यात्मिक जिज्ञासा जागृत होने लगती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारा यह संसार एक वृक्ष की भाँति है, जो निरंतर परिवर्तनशील है, किंतु इसका उद्गम स्थान अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्लोक के गहन अर्थ को समझने के लिए इसके प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के सरल अर्थ के साथ उनके उच्च आध्यात्मिक आयामों को समझाया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ऊर्ध्वमूलम् (ऊर्ध्व-मूलम्) ऊपर की ओर जिसकी जड़ें हैं इसका अर्थ है कि इस संसार रूपी वृक्ष का उद्गम या स्रोत सबसे ऊपर यानी परम ब्रह्म परमात्मा में स्थित है। भौतिक संसार का आधार कोई जड़ पदार्थ नहीं, बल्कि चेतना है।
अधःशाखम् (अधः-शाखम्) नीचे की ओर जिसकी शाखाएँ हैं इस वृक्ष की शाखाएँ (भोग, वासनाएँ, योनिजातियाँ आदि) नीचे यानी पाताल और पृथ्वी लोक की ओर फैली हुई हैं, जो निरंतर वृद्धि को प्राप्त होती हैं।
अश्वत्थम् (अश्वत्थम्) पीपल का वृक्ष (जो कल तक भी स्थिर न रहे) 'अश्वत्थ' शब्द का शाब्दिक अर्थ है - जो कल तक भी नहीं रहेगा ('न श्वः तिष्ठति इति अश्वत्थः')। यह संसार हर पल बदल रहा है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।
प्राहुरव्ययम् (प्राहूः + अव्ययम्) जिसे अविनाशी या अव्यय कहा गया है यद्यपि संसार नाशवान है, किंतु इसका जो मूल स्रोत (ब्रह्म) है, वह सनातन, शाश्वत और कभी नष्ट न होने वाला है।
छन्दांसि (छन्दांसि) वैदिक छंद या वेद वेदों को इस वृक्ष के पन्नों या पत्तों के समान बताया गया है, जो इस संसार रूपी वृक्ष को जीवित रखते हैं और जीवन का पोषण करते हैं।
यस्य (यस्य) जिस (वृक्ष) के यह संबंध कारक इस संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष की विशालता और उसकी संपूर्ण व्यवस्था को इंगित करता है।
पर्णानि (पर्णानि) पत्ते या पर्ण जैसे पेड़ के पत्ते उसकी शोभा बढ़ाते हैं और सूर्य की ऊर्जा से वृक्ष को पोषित करते हैं, वैसे ही वैदिक कर्मकांड और ज्ञान इस संसार की गतिविधियों को संचालित करते हैं।
यः (यः) जो मनुष्य वह जिप्सु या साधक जो इस रहस्य को भली-भांति जान लेता है, उसकी यात्रा साधारण मनुष्य से ऊपर उठ जाती है।
तम् वेद (तम् वेद) उस (तत्त्व) को जानता है केवल ऊपरी ज्ञान नहीं, बल्कि इस मायारूपी संसार के मूल और परमात्मा के अभेद संबंध का प्रत्यक्ष अनुभव करता है।
सः वेदवित् (सः वेद-वित्) वही वास्तव में वेदों को जानने वाला है सच्चा विद्वान वही है जो केवल किताबों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सृष्टि के इस मूल रहस्य को अपने भीतर अनुभव कर लेता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब अर्जुन ने विषाद और मोह के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों से विमुख होने की इच्छा जताई, तब योगेश्वर कृष्ण ने उन्हें आत्मा, परमात्मा और इस संसार के वास्तविक स्वरूप का बोध कराया। इसी श्रृंखला में उन्होंने संसार को एक 'उलटे वृक्ष' (ऊर्ध्वमूल) के रूप में चित्रित किया।

वैदिक साहित्य, विशेषकर कठोपनिषद् (कठोपनिषद् ६.१) में भी इसी प्रकार के रूपक का वर्णन मिलता है— 'ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तद्देव तच्छुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्॥' इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने वेदों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को ही गीता के इस श्लोक में संकलित किया है। प्राचीन ऋषियों ने इस संसार को 'अश्वत्थ' इसलिए कहा क्योंकि यह पीपल के वृक्ष की तरह निरंतर क्षीण और पुनर्उत्पादित होता रहता है। इसकी जड़ें ब्रह्मलोक में होने का तात्पर्य यह है कि बिना ईश्वरीय चेतना के इस ब्रह्मांड में एक तिनका भी हिल नहीं सकता।

इस शास्त्रीय पृष्ठभूमि को समझने से हमें यह स्पष्ट होता है कि सनातन धर्म में भौतिक जगत को नकारने के बजाय उसे एक दिव्य वृक्ष के रूप में देखने की दृष्टि दी गई है। जो मनुष्य इस वृक्ष की असारता को समझकर वैराग्य की कुल्हाड़ी से इसके मोह रूपी बंधनों को काट डालता है, वही परम पद को प्राप्त करता है, जैसा कि इसी अध्याय के अगले श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने विस्तार से समझाया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस परम पवित्र श्लोक का नियमित पठन, श्रवण और मनन करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों का विवरण दिया गया है:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

संसार की नश्वरता का बोध होने से मन में उत्पन्न होने वाली अनियंत्रित चिंताएँ, भय और तनाव स्वतः समाप्त होने लगते हैं। साधक का मन बाहरी उथल-पुथल के बीच भी शांत रहता है।

2. वैराग्य और आत्म-अनुशासन

यह श्लोक भोग-विलास के प्रति आसक्ति को कम करता है। मनुष्य को यह ज्ञान होता है कि यह संसार एक क्षणभंगुर वृक्ष की भाँति है, जिससे मोह रखना व्यर्थ है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

वैदिक मंत्रों और श्लोकों के नियमित उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

4. कार्मिक शुद्धि और पाप नाश

भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले इन वचनों का स्मरण करने से चित्त की वृत्तियाँ शुद्ध होती हैं और संचित कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

5. वेदों और शास्त्रों के सार की प्राप्ति

श्लोक के अंत में स्वयं भगवान ने कहा है कि जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेदों का ज्ञाता है। अतः इसके मनन से गूढ़ वेदान्त ज्ञान की प्राप्ति सहज हो जाती है।

6. दिव्य कृपा और शरणागति

इस ज्ञान से युक्त होकर साधक पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, जिससे उसे भगवद्कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

7. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

नियमित रूप से गीता के इन श्लोकों का पाठ करने से बौद्धिक तीक्ष्णता बढ़ती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है और ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।

8. मोक्ष और परम गति का मार्ग

संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष के मोह रूपी बंधनों को काटकर साधक उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करता है जहाँ जाने के बाद इस संसार में पुनः नहीं लौटना पड़ता।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप एवं विभिन्न आचार्यों के भाष्यों), कठोपनिषद् तथा प्रामाणिक वैदिक साहित्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री का उद्देश्य पाठकों को त्रुटिहीन, उच्च कोटि का और आदरणीय आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। हमारे विद्वान linguists और शोधकर्ताओं द्वारा प्रत्येक शब्द के व्याकरण, उसके दार्शनिक आयाम और सांस्कृतिक महत्व को अत्यंत सावधानी से परखा गया है, ताकि सनातन संस्कृति के सच्चे स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाया जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: संसार को उल्टा वृक्ष इसलिए कहा गया है क्योंकि सामान्य वृक्षों की जड़ें जमीन में नीचे होती हैं और शाखाएँ ऊपर आकाश में जाती हैं, किंतु इस संसार रूपी वृक्ष का मूल स्रोत (जड़) सर्वोपरि परम ब्रह्म परमात्मा में ऊपर स्थित है। इसकी शाखाएँ (भोग, वासनाएँ और विभिन्न योनियाँ) नीचे पृथ्वी और पाताल लोक की ओर फैली हुई हैं। इसका अर्थ यह है कि इस जगत का संचालन ऊपर से यानी ईश्वरीय चेतना से हो रहा है, नीचे से नहीं।

उत्तर: 'अश्वत्थ' का शाब्दिक अर्थ पीपल का वृक्ष होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है— 'न श्वः तिष्ठति इति अश्वत्थः' अर्थात् जो कल तक भी स्थिर या विद्यमान नहीं रहेगा। यह संपूर्ण भौतिक जगत क्षणभंगुर और निरंतर परिवर्तनशील है, इसलिए इसे अश्वत्थ कहा गया है। यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं है, केवल परमात्मा ही शाश्वत हैं।

उत्तर: जैसे किसी वृक्ष के पत्ते उसकी शोभा बढ़ाते हैं और सूर्य की रोशनी से ऊर्जा लेकर पूरे वृक्ष को जीवित रखते हैं, उसी प्रकार वेद इस संसार रूपी वृक्ष के कर्मकांड, स्तुति और ज्ञान के माध्यम से इस जगत की व्यवस्था को सुंदर और पोषित रखते हैं। वेदों के ज्ञान से ही मनुष्य संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन की सार्थकता को समझते हैं।

उत्तर: इसका अर्थ है— "जो मनुष्य इस संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष के इस गूढ़ रहस्य को भली-भांति जान लेता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता (वेदवित्) है।" इसका तात्पर्य यह है कि केवल बाहरी तौर पर वेदों के ग्रंथों को रट लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सृष्टि के इस मूल तत्त्व और ब्रह्म के साथ उसके संबंध को अनुभव करना ही असली ज्ञान है।

उत्तर: इस श्लोक के स्मरण से मनुष्य के भीतर वैराग्य की भावना जाग्रत होती है। जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि यह संसार नश्वर है और इसका असली आधार परमात्मा है, तो वह सांसारिक प्रलोभनों, दुखों और मोह-माया में अत्यधिक लिप्त नहीं होता। वह अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए अपनी मानसिक शांति को बनाए रखता है और ईश्वर भक्ति में अपना चित्त लगाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस श्लोक में भगवान कृष्ण संसार की तुलना एक अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष से करते हैं, जो अविनाशी है, लेकिन उल्टा दिखता है – जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे। इसकी पत्तियाँ वेद हैं। जो इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, वही वेदों का तत्त्व जानने वाला है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह वृक्ष माया का प्रतीक है। इसकी जड़ें परब्रह्म में हैं, परंतु यह उल्टा दिखता है, जैसे वृक्ष का प्रतिबिंब जल में उल्टा दिखता है। वेद इसके पत्ते हैं, अर्थात वेद इसी संसार के विस्तार का वर्णन करते हैं। इस वृक्ष को काटने के लिए वैराग्य रूपी शस्त्र की आवश्यकता होती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 1 का अध्ययन कर रहे हैं।
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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