पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में वर्णन है कि अश्वत्थ वृक्ष की शाखाएँ गुणों से पोषित हैं और इंद्रिय-विषय पत्ते हैं, तथा मनुष्य लोक में कर्म-बन्धन रूपी जड़ें फैली हैं।
संस्कृत श्लोक
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २॥
adhaś cordhvaṃ prasṛtās tasya śākhā guṇa-pravṛddhā viṣaya-pravālāḥ | adhaś ca mūlāny anusantatāni karmānubandhīni manuṣya-loke ||2||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अधः: नीचे; च: और; ऊर्ध्वम्: ऊपर; प्रसृताः: फैली हुई; तस्य: उसकी; शाखा: शाखाएँ; गुणप्रवृद्धा: गुणों से बढ़ी हुई; विषयप्रवालाः: इंद्रिय-विषय रूपी कोंपलें (पत्ते); अधः: नीचे; च: भी; मूलानि: जड़ें; अनुसन्ततानि: फैली हुई; कर्मानुबन्धीनि: कर्मों से बँधी हुई; मनुष्यलोके: मनुष्य लोक में।
हिंदी अनुवाद
उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हैं, जो तीन गुणों से पोषित हैं और जिनके कोपलें (पत्ते) इंद्रियों के विषय हैं। तथा नीचे की ओर मनुष्य लोक में कर्मों से बँधी हुई जड़ें फैली हुई हैं।
English Translation
Below and above spread its branches, nourished by the three modes of material nature, with sense objects as their twigs. And below, in the world of humans, stretch the roots that bind one to action.
टीका / Commentary
इस श्लोक में अश्वत्थ वृक्ष की शाखाओं और जड़ों का विस्तार बताया गया है। शाखाएँ (उच्च और निम्न लोक) गुणों से पोषित हैं और इंद्रिय-विषय इनके पत्ते हैं। मनुष्य लोक में कर्मों के रूप में जड़ें और फैली हैं। यह संसार-चक्र का वर्णन है।