श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 3

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 40 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
न
नहीं
रूपम्
रूप
अस्य
इसका
इह
इस संसार में
तथा
उस प्रकार
उपलभ्यते
प्राप्त होता है (दिखता है)
न
नहीं
अन्तः
अंत
न
नहीं
च
और
आदिः
आदि
न
नहीं
च
और
सम्प्रतिष्ठा
स्थिर आधार
अश्वत्थम्
अश्वत्थ वृक्ष
एनम्
इस
सुविरूढमूलम्
दृढ़ जड़ों वाला
असङ्गशस्त्रेण
वैराग्य रूपी शस्त्र से
दृढेन
दृढ़
छित्त्वा
काटकर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस (वृक्ष) का वास्तविक रूप इस संसार में उस प्रकार नहीं दिखता, न इसका अंत, न आदि और न ही स्थिर आधार। इस दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय की प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्ता

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) का यह तृतीय श्लोक मानव जीवन, भौतिक संसार (संसार वृक्ष) और उसकी मायावी प्रकृति को समझने की कुंजी है। आचार्य भगवद्गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने इस संपूर्ण जगत की तुलना एक उलटे हुए अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष से की है। इस श्लोक में इस संसार रूपी वृक्ष की नश्वरता, इसकी जटिल संरचना और इससे मुक्ति पाने का एकमात्र अचूक मार्ग अर्थात 'वैराग्य रूपी शस्त्र' का अत्यंत सुंदर एवं वैज्ञानिक विवेचन किया गया है।

सांस्कृतिक दृष्टि से यह श्लोक केवल एक दार्शनिक उद्घोषणा नहीं है, बल्कि यह हर उस साधक के लिए एक मार्गदर्शिका है जो भवसागर के दुखों से पार पाना चाहता है। आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य भौतिकता की अंधी दौड़ में मानसिक अशांति और अवसाद का शिकार हो रहा है, इस श्लोक का अध्ययन और इसके मर्म को आत्मसात करना परम आवश्यक हो गया है। यह हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार इस संसार की आसक्तियों (असंग) को काटकर अपनी मूल आध्यात्मिक चेतना यानी सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा से जुड़ा जा सकता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पवित्र उच्चारण और सस्वर पाठ हेतु श्लोक का प्रामाणिक पाठ निम्नलिखित है:

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ पञ्चदशोऽध्यायः — पुरुषोत्तमयोगः

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते

नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्

असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३॥

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके शांत चित्त से इस श्लोक का कम से कम 108 बार मानसिक या वाचिक जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इससे मन की चंचलता समाप्त होती है और वैराग्य भाव स्वतः जाग्रत होने लगता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा है। आइए इसके एक-एक पद के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न रूपम् वैसा रूप नहीं इस संसार का वास्तविक और स्थायी स्वरूप वैसा नहीं जैसा यह भ्रमित आंखों से दिखाई देता है।
अस्य इस (संसार रूपी वृक्ष का) जिस संसाररूपी वृक्ष की चर्चा पहले श्लोकों में की गई है, यह उसी की बात हो रही है।
इह इस लोक में / संसार में मानव शरीर में रहते हुए इस भौतिक जगत में इस वास्तविकता को अनुभव करना कठिन है।
तथा उपलभ्यते वैसा उपलब्ध होता है / समझा जाता है अज्ञानी जन इसे ही सब कुछ मान लेते हैं, जबकि ज्ञानी इसके मायावी स्वभाव को जानते हैं।
न अन्तः न अंत इस भवरोग और कर्म चक्र का कोई निश्चित अंत सामान्य बुद्धि से नजर नहीं आता।
न च आदिः और न ही आदि (शुरुआत) यह संसार कब से आरंभ हुआ, इसका कोई सटीक कालक्रम भौतिक विज्ञान नहीं खोज पाया है।
न च संप्रतिष्ठा और न ही कोई स्थिर आधार यह प्रतिक्षण बदलने वाला (अनित्य) है, इसकी कोई ठोस और शाश्वत नींव नहीं है।
अश्वत्थम् एनम् इस पीपल रूपी (जो कल नहीं रहेगा) संसार को अश्वत्थ का अर्थ है - जो कल तक रहेगा या नहीं रहेगा। यह क्षणभंगुर जगत है।
सुविरूढमूलम् भली-भांति दृढ़ता से फैली हुई जड़ों वाले इसकी वासनाओं और कर्मों की जड़ें अत्यंत गहरी और मजबूत हैं, जो आसानी से उखड़ती नहीं।
असङ्गशस्त्रेण असंग (निर्लेप या वैराग्य) रूपी शस्त्र से सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह कट जाने और ईश्वर में मन लगाने की शक्ति ही वह शस्त्र है।
दृढेन छित्त्वा दृढ़तापूर्वक काटकर बिना किसी संकोच या कमजोरी के, संकल्प शक्ति के साथ इस बंधन को काटना आवश्यक है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुए उस संवाद से जुड़ी है, जब अर्जुन अपने परिजनों के प्रति मोह और शोक में डूब गए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के परम सत्य का बोध कराने के लिए इस 'संसार वृक्ष' (ऊर्ध्वमूलमधःशाखम) की परिकल्पना समझाई।

वैदिक साहित्य, विशेषकर कठोपनिषद् (6.1) में भी इस ब्रह्मांडीय वृक्ष का सुंदर वर्णन मिलता है — "ऊर्ध्वमूलमवाक्शाखमेषोऽश्वत्थः सनातनः।" इसका अर्थ है कि इस संसार रूपी वृक्ष का मूल ऊपर (ब्रह्मलोक या परमात्मा) है और इसकी शाखाएं नीचे (पृथ्वी और पाताल लोक तक) फैली हुई हैं। यह वृक्ष सनातन होते हुए भी परिवर्तनशील है।

महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत और विभिन्न पुराणों में इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया है कि मनुष्य जब तक अज्ञानता और काम-क्रोध रूपी बंधनों में जकड़ा रहता है, तब तक वह इस वृक्ष की जड़ों में उलझा रहता है। इस श्लोक में वर्णित 'असंग शस्त्र' वास्तव में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का वह त्रिवेणी संगम है, जिसे पाकर अर्जुन जैसे योद्धा ने भी अपने मोह का त्याग किया और धर्म के मार्ग पर अडिग रहे। यह इतिहास इस बात का गवाह है कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने भी इसी असंग शस्त्र के बल पर भौतिक संसार की सीमाओं को लांघकर परम ब्रह्म को प्राप्त किया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से साधक को अनेकों मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

संसार की अनित्यता का बोध होने से मन छोटी-छोटी चिंताओं और भौतिक दुखों से विचलित होना बंद कर देता है, जिससे गहरी मानसिक शांति मिलती है।

2. मोह और आसक्ति का नाश

यह श्लोक 'असंग शस्त्र' का मार्ग दिखाता है, जिसके अभ्यास से परिवार, धन और पद के प्रति अत्यधिक मोह स्वतः घटने लगता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पवित्र गीता के वचनों के उच्चारण से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मकता को दूर भगाती है।

4. कर्म बंधनों से शुद्धि (कर्म शुद्धि)

जब मनुष्य निष्काम भाव से कार्य करना सीख जाता है, तो उसके पुराने पाप और नए कर्मों के बुरे प्रभाव नष्ट होने लगते हैं, जिससे जीवन हल्का महसूस होता है।

5. वैराग्य भाव की जागृति

साधक के भीतर भोग-विलास के प्रति रुचि कम होती है और सच्चे आत्म-ज्ञान तथा परमात्मा की प्राप्ति के प्रति तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

भ्रम की स्थिति समाप्त होने से जीवन के कठिन मोर्चों पर सही और धर्मसम्मत निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

7. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग

यह श्लोक अंततः जीव को उसकी वास्तविक पहचान (अहं ब्रह्मास्मि / मैं शुद्ध आत्मा हूँ) से अवगत कराने में सहायक सिद्ध होता है।

8. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों पर निष्ठा रखने वाले साधक को भगवद्कृपा का अनुभव होता है और उसे अंत में परम धाम की प्राप्ति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य - शंकराचार्य एवं रामानुजचार्य परंपरा) तथा कठोपनिषद् के मूल संस्कृत श्लोकों के गहन अध्ययन और व्याकरणिक विश्लेषण के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक प्राचीन वैदिक ज्ञान पूरी शुद्धता, प्रामाणिकता और सुगम हिंदी भाषा में पहुंचे, ताकि आज की आधुनिक पीढ़ी भी अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़कर मानसिक शांति और जीवन का सच्चा उद्देश्य प्राप्त कर सके। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक आचार्यों और प्रामाणिक टीकाओं का अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस श्लोक में 'अश्वत्थ' वृक्ष भौतिक संसार (मायावी जगत) का प्रतीक है। 'अश्वत्थ' शब्द का शाब्दिक अर्थ है - 'जो कल तक रहेगा या नहीं रहेगा' (न श्वः तिष्ठति इति अश्वत्थः)। यह संसार क्षणभंगुर, परिवर्तनशील और अनित्य है, इसलिए इसकी तुलना पीपल या अश्वत्थ वृक्ष से की गई है।

उत्तर: 'असंग शस्त्र' का अर्थ है - सांसारिक विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अत्यधिक आसक्ति या मोह का त्याग करने की मानसिक शक्ति (निर्लेप रहना)। इसे सत्संग, निरंतर ध्यान, ईश्वर स्मरण, निष्काम कर्म और विवेक बुद्धि के माध्यम से मजबूत किया जा सकता है।

उत्तर: ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या संध्याकाल का समय इस प्रकार के आध्यात्मिक श्लोकों के पाठ और ध्यान के लिए सबसे उत्तम माना गया है। हालांकि, शांत मन से किसी भी समय भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए इसका पाठ किया जा सकता है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। वैराग्य का अर्थ परिवार छोड़ना नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए मन में यह भाव रखना कि सब कुछ ईश्वर का है और अंततः हमें उन्हीं की ओर लौटना है। इसे 'जल में कमल की तरह' रहना कहते हैं, जो गृहस्थों के लिए भी पूरी तरह संभव है।

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी वृक्ष का वर्णन करने के साथ-साथ क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशशसील) दोनों से परे 'उत्तम पुरुष' यानी परम परमात्मा का विस्तृत रहस्य उजागर किया है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि इस संसार-वृक्ष (अश्वत्थ) का वास्तविक रूप यहाँ नहीं दिखता। इसका न आदि है, न अंत, और न ही कोई स्थिर आधार। यह दृढ़ जड़ों वाला है, परंतु इसे दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काट डालना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह संसार माया से बना है, अतः इसका वास्तविक स्वरूप समझना कठिन है। इसके बंधन से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है प्रबल वैराग्य – विषयों में आसक्ति का त्याग। वैराग्य ही वह शस्त्र है जो अज्ञान रूपी वृक्ष को काट सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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