पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 3

श्लोक ३ में बताया गया है कि इस संसार-वृक्ष का वास्तविक रूप नहीं दिखता, और इसे दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काटना चाहिए।

संस्कृत श्लोक

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३॥

na rūpam asyeha tathopalabhyate nānto na cādir na ca sampratiṣṭhā | aśvattham enaṃ suvirūḍha-mūlam asaṅga-śastreṇa dṛḍhena chittvā ||3||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; रूपम्: रूप; अस्य: इसका; इह: इस संसार में; तथा: उस प्रकार; उपलभ्यते: प्राप्त होता है (दिखता है); न: नहीं; अन्तः: अंत; न: नहीं; च: और; आदिः: आदि; न: नहीं; च: और; सम्प्रतिष्ठा: स्थिर आधार; अश्वत्थम्: अश्वत्थ वृक्ष; एनम्: इस; सुविरूढमूलम्: दृढ़ जड़ों वाला; असङ्गशस्त्रेण: वैराग्य रूपी शस्त्र से; दृढेन: दृढ़; छित्त्वा: काटकर।

हिंदी अनुवाद

इस (वृक्ष) का वास्तविक रूप इस संसार में उस प्रकार नहीं दिखता, न इसका अंत, न आदि और न ही स्थिर आधार। इस दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर...

English Translation

Its true form is not perceived here in the world, neither its end nor its beginning, nor its support. Having cut this firmly rooted Ashvattha tree with the strong axe of detachment (non-attachment)...

टीका / Commentary

इस वृक्ष का वास्तविक स्वरूप (कि यह माया है) समझना कठिन है। इसका न आदि है, न अंत, और न ही कोई स्थिर आधार। यह दृढ़ जड़ों वाला है, परंतु इसे वैराग्य रूपी शस्त्र से काटा जा सकता है।