पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 4

श्लोक ४ में बताया गया है कि संसार-वृक्ष को काटकर उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद लौटना नहीं होता, और उस आदि पुरुष की शरण लेनी चाहिए।

संस्कृत श्लोक

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४॥

tataḥ padaṃ tat parimārgitavyaṃ yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ | tam eva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||4||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ततः: उसके बाद; पदम्: स्थान (परम पद); तत्: उस; परिमार्गितव्यम्: खोजना चाहिए; यस्मिन्: जहाँ; गता: जाकर; न: नहीं; निवर्तन्ति: लौटते; भूयः: फिर; तम्: उस; एव: ही; च: और; आद्यम्: आदि (मूल) पुरुष; प्रपद्ये: मैं समर्पित होता हूँ (शरण लेता हूँ); यतः: जिससे; प्रवृत्तिः: प्रवृत्ति (सृष्टि); प्रसृता: फैली; पुराणी: सनातन।

हिंदी अनुवाद

तत्पश्चात उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद फिर लौटना नहीं पड़ता। मैं उस आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह सनातन प्रवृत्ति (सृष्टि) फैली है।

English Translation

Then that goal is to be sought after, going where they never return again. I take refuge in that primal Purusha from whom this ancient stream of creation has flowed.

टीका / Commentary

संसार-वृक्ष को काटने के बाद, साधक को उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता। वह आदि पुरुष ही परमात्मा है, जिससे यह सृष्टि प्रवाहित हुई है। उसी की शरण लेनी चाहिए।