श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 4

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 42 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
ततः
उसके बाद
पदम्
स्थान (परम पद)
तत्
उस
परिमार्गितव्यम्
खोजना चाहिए
यस्मिन्
जहाँ
गता
जाकर
न
नहीं
निवर्तन्ति
लौटते
भूयः
फिर
तम्
उस
एव
ही
च
और
आद्यम्
आदि (मूल) पुरुष
प्रपद्ये
मैं समर्पित होता हूँ (शरण लेता हूँ)
यतः
जिससे
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति (सृष्टि)
प्रसृता
फैली
पुराणी
सनातन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तत्पश्चात उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद फिर लौटना नहीं पड़ता। मैं उस आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह सनातन प्रवृत्ति (सृष्टि) फैली है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) का विशेष आध्यात्मिक, दार्शनिक और शास्त्रीय विवेचन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

भारतीय सनातन संस्कृति, वेद, उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता वे प्रकाशपुंज हैं जो मनुष्य को भवसागर के असीम अंधकार से निकालकर मोक्ष के शाश्वत प्रकाश की ओर ले जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) का यह अत्यंत महत्वपूर्ण चौथा श्लोक—"ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः"—मानव जीवन के परम लक्ष्य, वैराग्य की पराकाष्ठा और आत्यंतिक मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। यह श्लोक केवल एक संस्कृत का श्लोक मात्र नहीं है, बल्कि यह भौतिक संसार की असारता को समझने और उस आदिपुरुष परमात्मा की शरण में जाने का एक अचूक आध्यात्मिक निर्देश है।

इस भौतिक जगत को गीता में 'अश्वत्थ वृक्ष' (उलटे संसार वृक्ष) के रूप में चित्रित किया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर ब्रह्म में हैं और शाखाएं नीचे संसार में फैली हुई हैं। इस प्रपंच रूपी वृक्ष के मोह-पाश में फंसकर जीव चौरासी लाख योनियों के चक्रव्यूह में भटकता रहता है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को और सम्पूर्ण मानवजाति को यह उपदेश देते हैं कि इस संसार-वृक्ष के भेदन (काटने) के उपरांत साधक का वास्तविक कर्तव्य क्या होना चाहिए। उसे उस 'अव्यय पद' या 'परम पद' की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचने के बाद इस मृत्युलोग में पुनरावृत्ति (वापसी) नहीं होती। यह स्थिति आवागमन के चक्र से पूर्ण मुक्ति और सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति की अवस्था है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक वेदों के उस महावाक्य की याद दिलाता है जहाँ 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय' की कामना की जाती है। यह साधक के भीतर छिपी उस जिज्ञासा को जागृत करता है जो अनश्वर और शाश्वत की तलाश करती है। जब मनुष्य अपने जीवन के विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—का त्याग कर उस आदिपुरुष की अनन्य भक्ति में लीन होता है, तब उसके लिए संसार के समस्त दुःख स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। भक्तिलोक.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक संदर्भ और आधुनिक जीवन में इसके प्रासंगिक आध्यात्मिक लाभों का गहन अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के इस पवित्र श्लोक का उच्चारण पूर्ण शुद्धता, भक्ति भाव और सस्वर पाठ के साथ किया जाना चाहिए। यहाँ श्लोक का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत है:

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥

श्लोक पाठ की विधि और अनुष्ठानिक नियम:
  • शुद्धता एवं पवित्रता: इस श्लोक का पाठ प्रातः काल ब्रह्म बेला में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात करना चाहिए।
  • आसन एवं मुद्रा: कुश या ऊनी आसन पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए मानसिक एकाग्रता बनानी चाहिए।
  • दीप प्रज्वलन: पूजा स्थल या अध्ययन कक्ष में घी का दीपक और धूप प्रज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण का मानसिक ध्यान करना चाहिए।
  • सस्वर उच्चारण: प्रत्येक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए कम से कम 108 बार (एक माला) इस श्लोक या इसके अर्थ का मनन करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक की दिव्यता को पूरी तरह समझने के लिए इसके प्रत्येक पद और शब्द के शाब्दिक तथा आंतरिक अर्थ को जानना अनिवार्य है। नीचे दी गई सारणी में इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ततः (Tataḥ) उसके बाद, उस संसार-वृक्ष को काटने के पश्चात जब साधक वैराग्य की शस्त्र से आसक्ति रूपी वृक्ष को काट देता है, उसके तुरंत बाद की स्थिति।
पदं तत् (Padam Tat) उस परम पद को, उस दिव्य स्थिति को यह वह स्थान या चेतना है जो देश और काल की सीमाओं से परे पूर्णतः नित्य और सत्य है।
परिमार्गितव्यम् (Parimārgitavyam) अच्छी प्रकार से खोज करनी चाहिए, ढूंढना चाहिए यह सत्यों की खोज (Enquiry) की पराकाष्ठा है; इसे केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मिक साधना से पाना होता है।
यस्मिन् गताः (Yasmin Gatāḥ) जहाँ जाकर, जिस परम धाम को प्राप्त होकर जिस सर्वोच्च चेतना या ब्रह्मांडीय स्रोत में जीव पूरी तरह तल्लीन हो जाता है।
न निवर्तन्ति (Na Nivartanti) नहीं लौटते हैं, पुनरावृत्ति नहीं होती संसार के दुखमय चक्र, जन्म और मरण के बंधन से पूर्ण और शाश्वत मुक्ति।
भूयः (Bhūyaḥ) पुनः, दोबारा इस संसार में मृत्युलोग के दुखों, कर्मबंधनों और भौतिक प्रलोभनों में दोबारा कभी नहीं गिरना पड़ता।
तम् एव च (Tam Eva Cha) उसी ही, केवल उसी एकमात्र को अन्य किसी देवी-देवता या भौतिक वस्तु की अपेक्षा केवल परम ब्रह्म को ही अपना ध्येय बनाना।
आद्यं पुरुषम् (Ādyam Purusham) आदि पुरुष को, मूल सृष्टिकर्ता परमात्मा को वह अनादि, अनंत और समस्त सृष्टियों के मूल आधार भगवान नारायण या वासुदेव श्रीकृष्ण।
प्रपद्ये (Prapadye) मैं शरण लेता हूँ, पूर्ण समर्पण करता हूँ अहंकार का त्याग कर अपनी पूरी सत्ता को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना (शरणागति)।
यतः प्रवृत्तिः (Yataḥ Pravṛttiḥ) जिससे यह प्रवृत्ति हुई है, जिससे यह सृष्टि प्रवाहित हुई है यह संपूर्ण ब्रह्मांड, चेतना, प्रकृति और जीव जगत जिस मूल स्रोत से उत्पन्न हुए हैं।
प्रसृता पुराणी (Prasṛtā Purāṇī) यह अत्यंत प्राचीन विस्तार या सृष्टि प्रवाह चला आ रहा है यह अनादि काल से चली आ रही सृष्टि की रचना और विकास का चक्र है जो ईश्वर से ही संचालित है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जब अर्जुन घोर विषाद और कर्तव्य-विमूढ़ता की स्थिति में थे...

सनातन धर्मग्रंथों में गीता के इस पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' की संज्ञा दी गई है। इस अध्याय के आरंभ में ही भगवान श्रीकृष्ण संसार की तुलना अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष से करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्मलोक में) और शाखाएं नीचे (पृथ्वी और पाताल लोक में) फैली हुई हैं। इस संसार-वृक्ष की विशेषता यह है कि इसके न तो आदि का पता है, न अंत का और न ही इसके स्वरूप का पूर्ण ज्ञान साधारण मनुष्य को हो पाता है। लोग इसके मोह-माया रूपी जाल में इस प्रकार उलझे रहते हैं कि वे अपने मूल स्रोत को ही भूल जाते हैं।

कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध के मुहाने पर खड़े अर्जुन के मन में जब अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर मोह उत्पन्न हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ज्ञान, कर्म और भक्ति का वह त्रिवेणी संगम प्रदान किया जो मनुष्य को जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सके। इस चौथे श्लोक में भगवान ने उस महान दार्शनिक निष्कर्ष को रखा है जो उपनिषदों की ऋचाओं का सार है। मुण्डकोपनिषद और कठोपनिषद में भी बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि जब तक मनुष्य अज्ञान रूपी अश्वत्थ वृक्ष को 'वैराग्य शस्त्र' से नहीं काटता, तब तक वह उस परम धाम को प्राप्त नहीं कर सकता।

पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ में इस संवाद को अमर किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह स्पष्ट किया कि सांसारिक सुख-सुविधाएं और उपलब्धियां क्षणिक हैं। यदि वास्तविक शांति और अमरत्व की प्राप्ति करनी है, तो मनुष्य को अपनी चेतना को बहिर्विमुख (बाहर की ओर देखने वाली) से अंतर्मुख (भीतर की ओर देखने वाली) बनाना होगा। 'आद्यं पुरुषम् प्रपद्ये' का यह उद्घोष वास्तव में प्रह्लाद, ध्रुव, और अर्जुन जैसे महान भक्तों के उस समर्पण का प्रतीक है जहाँ वे अपनी सम्पूर्ण व्यक्तिगत इच्छाओं को ब्रह्मांडीय इच्छा में विलीन कर देते हैं। यही इस श्लोक की मूल शास्त्रीय और ऐतिहासिक गरिमा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का प्रतिदिन अध्ययन, मनन और जप करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख 8 आध्यात्मिक और मानसिक लाभ दिए गए हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Peace)

संसार की भागदौड़ और तनाव के बीच इस श्लोक का स्मरण मन को शांत करता है और विचारों में स्पष्टता लाता है। यह अति-चिंतन (Overthinking) को कम करके मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।

2. वैराग्य और उच्च मूल्यों की प्राप्ति (Spiritual Detachment)

यह श्लोक भौतिक वस्तुओं के प्रति अंधी दौड़ और अनावश्यक मोह को कम करता है, जिससे साधक के भीतर सात्विक वैराग्य और उच्च मानवीय मूल्यों का विकास होता है।

3. कार्मिक शुद्धि और पापों का नाश (Karmic Purification)

आदिपुरुष की शरण में जाने (प्रपद्ये) से साधक के संचित कर्मों और पिछले जन्मों के विकारों की शुद्धि होती है। ईश्वर की कृपा से उसके कर्म बंधनों की श्रृंखला कमजोर पड़ने लगती है।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार (Positive Aura)

संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के नियमित सस्वर उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन (Vibration) और सकारात्मक ऊर्जा का औरा निर्मित होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

5. मृत्यु के भय से मुक्ति (Fearlessness of Death)

चूँकि यह श्लोक उस पद की बात करता है जहाँ जाने के बाद पुनरावृत्ति नहीं होती, इसका नियमित चिंतन करने से मनुष्य के भीतर से मृत्यु का अस्वाभाविक भय समाप्त हो जाता है और वह अमर आत्मा के सत्य को समझता है।

6. ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति (Devotion & Surrender)

यह साधक के अहंकार को नष्ट कर उसे भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) सिखाता है, जो कि भक्ति योग का सबसे उच्चतम और प्राथमिक सोपान है।

7. एकाग्रता और बौद्धिक तीक्ष्णता (Enhanced Concentration)

गीता के श्लोकों को याद करने और उनके गूढ़ार्थ पर मनन करने से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Focus) और बौद्धिक तीक्ष्णता में वृद्धि होती है।

8. मोक्ष मार्ग की प्रशस्ति (Path to Liberation)

यह श्लोक साधक को जीवन के वास्तविक गंतव्य की याद दिलाता है, जिससे उसकी जीवन यात्रा भटकती नहीं है और वह सीधे मोक्ष और परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और प्राचीन संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस आलेख को अत्यंत प्रामाणिकता, शोध और शास्त्रीय मर्यादा के साथ तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के इस श्लोक की व्याख्या करते समय वेदों, उपनिषदों और आचार्य शंकर तथा रामानुजाचार्य के टीका-ग्रंथों के मूल सिद्धांतों का ध्यान रखा गया है।

हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और धार्मिक सामग्री पहुँचे, वह न केवल भाषा की दृष्टि से शुद्ध हो, बल्कि आधुनिक जीवन शैली में प्रासंगिक भी हो। किसी भी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए मूल संस्कृत पदों का सटीक हिंदी रूपांतरण और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर बिना किसी संदेह के आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय से लिया गया है, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन करते हुए उसे काटने और परम पुरुष की शरण में जाने का उपदेश दिया है।

© Bhaktilok.in — सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान का विश्वसनीय डिजिटल स्रोत।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि वैराग्य से इस वृक्ष को काटने के बाद, उस परम पद (धाम) की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद जीव फिर से संसार में नहीं लौटता। वह परम पद उस आदि पुरुष (परमात्मा) का है, जिससे यह सनातन सृष्टि फैली है। उसी की शरण लेनी चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मोक्ष का मार्ग है – पहले संसार से वैराग्य, फिर परमात्मा की शरण में जाना। परमात्मा ही सृष्टि का मूल स्रोत हैं, उनकी शरण लेने से जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 4 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 4/20 20% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!