श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 5

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 34 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
निर्मानमोहा
मान और मोह से रहित
जितसङ्गदोषा
संग के दोषों को जीतने वाले
अध्यात्मनित्या
अध्यात्म में नित्य लगे रहने वाले
विनिवृत्तकामाः
कामनाओं से सर्वथा रहित
द्वन्द्वैः
द्वंद्वों से
विमुक्ताः
मुक्त
सुखदुःखसंज्ञैः
सुख-दुःख नामक
गच्छन्ति
जाते हैं
अमूढाः
मूढ़ता रहित (ज्ञानी जन)
पदम्
पद को
अव्ययम्
अविनाशी
तत्
उस।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मान और मोह से रहित हैं, संग के दोषों को जीत चुके हैं, अध्यात्म में नित्य लगे रहते हैं, कामनाओं से सर्वथा विमुख हो गए हैं, और सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से मुक्त हैं, वे अमूढ़ (ज्ञानी) जन उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म, वेद, उपनिषद और श्रीमद्भागवत गीता के पावन प्रांगण में यदि हम प्रवेश करें, तो हमें जीवन के प्रत्येक आयाम का एक वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक समाधान मिलता है। श्रीमद्भागवत गीता का यह पाँचवाँ श्लोक (अध्याय 15, श्लोक 5) उस परम आध्यात्मिक अवस्था का सजीव और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य संसार के दुखों और भ्रमों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक विशेषांक में हम वेदों, उपनिषदों और गीता के मर्मज्ञ आचार्यों की दृष्टि से इस अत्यंत गूढ़ श्लोक का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

आधुनिक युग में जहाँ मानव जाति भौतिक चकाचौंध, मानसिक अवसाद (depression), अहंकार, और अंधी दौड़ के बीच अपने आंतरिक शांति को खो चुकी है, वहाँ यह श्लोक एक दिव्य औषधि के समान कार्य करता है। यह हमें यह सिखाता है कि कैसे अपने अंतस को मलीन करने वाले विकारों—मान, मोह, आसक्ति, और काम-वासना—से मुक्त होकर उस 'अव्यय पद' (सनातन परम धाम) की प्राप्ति की जा सकती है, जहाँ पहुँचकर पुनः इस संसार रूपी चक्र में लौटने की आवश्यकता नहीं रहती। यह सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व का वह बिंदु है जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद मिट जाता है और साधक अपनी मूल सच्चिदानंद स्वरूप स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५॥


श्लोकानुकूल उच्चारण एवं पाठ विधि: इस श्लोक का उच्चारण प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानोपरांत शांत चित्त होकर करना चाहिए। इसका पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि वाक् शुद्धि के साथ-साथ मानसिक ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाह चक्र जाग्रत हो सके। श्लोक के प्रत्येक चरण (पद) को रुक-रुक कर और उसके अर्थ का आंतरिक मनन करते हुए पढ़ने से चित्त की वृत्तियां शांत होने लगती हैं और साधक का मन एकाग्रता के उच्च सोपान को स्पर्श करने लगता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Philosophical Depth)
निर्मानमोहा मान (अहंकार) और मोह (अज्ञान) से रहित जो व्यक्ति अपनी झूठी प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और संसार की मोह-माया से पूरी तरह ऊपर उठ चुका है।
जितसङ्गदोषा आसक्ति रूपी दोषों को जीतने वाले जिन्होंने विषयों और व्यक्तियों के प्रति होने वाली अत्यधिक आसक्ति (Attachment) के दोषों को अपने वश में कर लिया है।
अध्यात्मनित्या निरंतर अध्यात्म में स्थिर रहने वाले जिनकी बुद्धि और चेतना हर पल अपने आंतरिक स्वरूप यानी आत्मा और परमात्मा के चिंतन में ही लीन रहती है।
विनिवृत्तकामाः समस्त कामनाओं से सर्वथा निवृत्त जिनके हृदय से भोग-विलास और संसार की भौतिक वासनाएं सदा के लिए समाप्त हो चुकी हैं।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः समस्त द्वंद्वों से मुक्त मान-अपमान, लाभ-हानि, शीत-उष्ण आदि विरोधी परिस्थितियों से जो प्रभावित नहीं होते।
सुखदुःखसंज्ञैः सुख और दुःख नामक विकारों से परे जो सुख में हर्षित और दुःख में विषादग्रस्त न होकर साक्षी भाव में स्थित रहते हैं।
गच्छन्ति प्राप्त करते हैं / पहुँचते हैं उस परम शाश्वत और अविनाशी गति या धाम को प्राप्त होते हैं।
अमूढाः ज्ञानी / अज्ञानरहित / विवेकवान वे महापुरुष जो मूढ़ता (अज्ञान) से रहित होकर यथार्थ ज्ञान को प्राप्त कर चुके हैं।
पदमव्ययं तत् उस अविनाशी, शाश्वत परम पद को भगवान श्रीकृष्ण के उस परम धाम को जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, और न ही कोई परिवर्तन।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवत गीता का पंद्रहवां अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण संसार रूपी अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का रूपक प्रस्तुत करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म लोक में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं। इस संसार रूपी वृक्ष का छेदन यानी इसे मोह के जाल से काटने का उपाय केवल 'वैराग्य शस्त्र' ही है। अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि उस अनादि परम पुरुष को प्राप्त करने का मार्ग क्या है और उस मार्ग के पथिक (साधक) के क्या लक्षण होते हैं।

महाभारत के युद्ध के रणक्षेत्र में कुरुक्षेत्र की उस पवित्र भूमि पर जब अर्जुन ने मोहवश अपने कर्तव्यों से विमुख होने का प्रयास किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन के इस परम सत्य से अवगत कराया। यह श्लोक उसी श्रृंखला की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। प्राचीन वेदों और उपनिषदों—विशेषकर कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद—में भी इसी प्रकार के लक्षणों वाले ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का वर्णन मिलता है। वे ऋषि-मुनि जो जंगलों, कंदराओं या गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी पूरी तरह अनासक्त भाव से जीवन जीते थे, वे इसी 'अव्यय पद' के यात्री होते थे।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस महाकाव्य ग्रंथ में यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए बाहरी वेशभूषा या जंगल जाने की अनिवार्यता नहीं है, अपितु आंतरिक चेतना का रूपांतरण सबसे महत्वपूर्ण है। जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार ('मान'), अज्ञान ('मोह'), और सांसारिक आसक्ति ('सङ्गदोष') जीवित हैं, तब तक वह चाहे जितने भी अनुष्ठान कर ले, उस परम पद को प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार, यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें यह स्मरण कराती है कि सनातन संस्कृति में ज्ञान और कर्म का अद्भुत समन्वय ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace)

इस श्लोक का नियमित मनन करने से चंचल मन शांत होता है और जीवन की उथल-पुथल के बीच भी आंतरिक स्थिरता बनी रहती है।

2. अहंकार और मोह का शमन

'निर्मानमोहा' पद का भाव आत्मसात करने से व्यक्ति के भीतर छिपा हुआ अहंकार और अज्ञान स्वतः गलने लगता है, जिससे विनम्रता का विकास होता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का निर्माण

वैदिक मंत्रों और गीता के श्लोकों के कंपन से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का विकास होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

4. कार्मिक शुद्धि और कर्म बंधनों से मुक्ति

जब साधक सुख-दुःख के द्वंद्वों से परे होकर कर्म करता है, तो उसके संचित और प्रारब्ध कर्मों का क्षय होने लगता है, जिससे उसे कार्मिक मुक्ति मिलती है।

5. आत्म-अनुशासन और संयम

कामनाओं पर विजय ('विनिवृत्तकामाः') प्राप्त करने से व्यक्ति में अद्भुत आत्म-अनुशासन जागृत होता है, जिससे वह अपने जीवन के लक्ष्यों को साध सकता है।

6. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति का मार्ग

अध्यात्म में निरंतरता ('अध्यात्मनित्या') बनाए रखने से साधक पर भगवान की अहेतुषी कृपा बरसती है और उसका भगवद् साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।

7. अवसाद और चिंता से मुक्ति

आधुनिक जीवनशैली के कारण उत्पन्न होने वाली एंग्जाइटी, डिप्रेशन और मानसिक तनाव से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए यह श्लोक एक रामबाण मनोवैज्ञानिक चिकित्सा है।

8. मोक्ष और परम पद की प्राप्ति

जीवन के अंत समय में इस उच्च आध्यात्मिक चेतना में स्थित रहने वाला जीव पुनर्जन्म के चक्र से छूटकर सीधे परम अव्यय पद को प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषाविदों, वेदान्त आचार्यों और Google Helpful Content दिशानिर्देशों के विशेषज्ञों की देखरेख में अत्यंत सावधानी और शोध के साथ तैयार किया गया है। हमने श्रीमद्भागवत गीता के मूल श्लोकों के प्रामाणिक अर्थों को सुरक्षित रखते हुए, उन्हें आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सरल, बोधगम्य और व्यावहारिक हिंदी भाषा में ढाला है।

हमारे सभी लेख पारंपरिक शास्त्रों (जैसे वेद, उपनिषद, श्रीमद्भागवत गीता, पुराण) और प्रख्यात आचार्यों की टीकाओं पर आधारित होते हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति के गूढ़ रहस्यों को बिना किसी अतिशयोक्ति के, पूरी प्रमाणिकता और पवित्रता के साथ पाठकों तक पहुँचाना है, ताकि हर साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर सुगमता से आगे बढ़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'निर्मानमोहा' दो शब्दों से मिलकर बना है—'निर्' (रहित) + 'मान' (अहंकार/प्रतिष्ठा) और 'मोह' (अज्ञान/भ्रम)। इसका अर्थ है वह साधक जो अपने पद, प्रतिष्ठा, धन या शरीर के अहंकार से पूरी तरह मुक्त हो चुका है और संसार की नश्वरता को पहचानकर किसी भी प्रकार के भ्रम में नहीं जीता है।

अध्यात्म का अर्थ जंगल में जाकर बैठना नहीं है, बल्कि अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित करते हुए साक्षी भाव से जीना है। गृहस्थ जीवन में अपने कर्तव्यों (धर्म) का पालन करते हुए यदि मन हर पल ईश्वर के स्मरण और आत्म-चिंतन में लीन रहे, तो इसे ही 'अध्यात्मनित्या' कहा जाता है।

'पदमव्ययं तत्' का अर्थ है वह परम धाम, वह शाश्वत स्थिति जो कभी नष्ट नहीं होती (अव्यय)। यह भौतिक जगत परिवर्तनशील और नश्वर है, किंतु भगवान का परम धाम सच्चिदानंद स्वरूप है, जहाँ पहुँचने के बाद जीव को पुनः इस संसार के दुःख-दर्द और जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं लौटना पड़ता।

सुख और दुःख संसार के दो पहलू हैं जो प्रकृति के नियमों के अनुसार आते-जाते रहते हैं। इनसे मुक्त होने के लिए साधक को अपनी बुद्धि को स्थिर करना होता है और हर परिस्थिति को भगवान का प्रसाद मानकर 'समत्व भाव' (समानता का भाव) अपनाना पड़ता है।

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या बेला में शांत चित्त से करना सबसे उत्तम माना गया है। इसके अलावा, जब भी मन विचलित हो या जीवन में किसी प्रकार की मानसिक उलझन महसूस हो, तब इस श्लोक का पाठ और मनन करने से तुरंत शांति और स्पष्टता प्राप्त होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो साधक अहंकार और मोह से रहित हैं, आसक्ति के दोष को जीत चुके हैं, अध्यात्म (आत्म-ज्ञान) में नित्य तत्पर रहते हैं, कामनाओं से पूर्णतः विरत हैं, तथा सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से मुक्त हैं – वे ऐसे ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि साधक इन दोषों से मुक्त हो। ये गुण आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में सहायक होते हैं। सुख-दुःख के द्वंद्व से परे होना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/20 25% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!