पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 5

श्लोक ५ में उन साधकों के गुण बताए गए हैं जो अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं – वे मान, मोह, संग, कामना और द्वंद्वों से मुक्त होते हैं।

संस्कृत श्लोक

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५॥

nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣā adhyātma-nityā vinivṛtta-kāmāḥ | dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sañjñair gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṃ tat ||5||

पदच्छेद / शब्दार्थ

निर्मानमोहा: मान और मोह से रहित; जितसङ्गदोषा: संग के दोषों को जीतने वाले; अध्यात्मनित्या: अध्यात्म में नित्य लगे रहने वाले; विनिवृत्तकामाः: कामनाओं से सर्वथा रहित; द्वन्द्वैः: द्वंद्वों से; विमुक्ताः: मुक्त; सुखदुःखसंज्ञैः: सुख-दुःख नामक; गच्छन्ति: जाते हैं; अमूढाः: मूढ़ता रहित (ज्ञानी जन); पदम्: पद को; अव्ययम्: अविनाशी; तत्: उस।

हिंदी अनुवाद

जो मान और मोह से रहित हैं, संग के दोषों को जीत चुके हैं, अध्यात्म में नित्य लगे रहते हैं, कामनाओं से सर्वथा विमुख हो गए हैं, और सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से मुक्त हैं, वे अमूढ़ (ज्ञानी) जन उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

English Translation

Those who are free from pride and delusion, who have conquered the evil of attachment, who are constantly engaged in spiritual practice, who have completely turned away from desires, who are liberated from the pairs of opposites known as pleasure and pain – such undeluded persons attain that eternal goal.

टीका / Commentary

इस श्लोक में उन साधकों के गुण बताए गए हैं जो परम पद को प्राप्त करते हैं: वे अहंकार और मोह से मुक्त, आसक्ति के दोषों से रहित, निरंतर आत्म-चिंतन में लीन, कामनाओं से रहित, सुख-दुःख से परे और ज्ञानी होते हैं।