श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 6

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 43 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
न
नहीं
तत्
उस (परम धाम) को
भासयते
प्रकाशित करता
सूर्यः
सूर्य
न
नहीं
शशाङ्कः
चन्द्रमा
न
नहीं
पावकः
अग्नि
यत्
जहाँ
गत्वा
जाकर
न
नहीं
निवर्तन्ते
लौटते
तत्
वह
धाम
धाम
परमम्
परम
मम
मेरा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस मेरे परम धाम को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि। जहाँ जाने के बाद (जीव) लौटकर नहीं आते।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

परमधाम की दिव्यता और ब्रह्मांडीय प्रकाश का रहस्य

सनातन धर्म और भारतीय वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को समस्त उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण मानव जाति के लिए भवसागर से पार उतरने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) का यह छठा श्लोक "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥" सनातन आध्यात्मिकता का एक ऐसा सर्वोच्च शिखर है, जो न केवल भौतिक जगत की सीमाओं से परे अलौकिक परमधाम का वर्णन करता है, बल्कि मानव चेतना को भौतिकता से ऊपर उठाकर उस अखंड सच्चिदानंद परमात्मा की ओर मोड़ने का आह्वान करता है।

इस श्लोक में जिस 'परम धाम' (वैकुंठ, साकेत या ब्रह्मलोक) का उल्लेख किया गया है, वह किसी साधारण भौतिक लोक की भांति सूर्य, चंद्रमा या अग्नि के प्रकाश पर निर्भर नहीं है। यहाँ तक कि हमारा संपूर्ण ब्रह्मांड और उसकी समस्त आकाशगंगाएं जिस भौतिक प्रकाश से जगमगाती हैं, वह प्रकाश भी उस परम चेतना का अत्यंत सूक्ष्म अंश मात्र है। यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि यह संसार नश्वर है और इसके परे एक ऐसा शाश्वत लोक या दिव्य अवस्था मौजूद है, जहाँ पहुँचने के बाद जीव को पुनः इस मृत्युलोक के जन्म-मरण के चक्र (आवर्तन) में नहीं लौटना पड़ता। सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक भारतीय मनीषियों की उस सर्वोच्च खोज का प्रतीक है, जहाँ अज्ञान के अंधकार का पूर्ण नाश हो जाता है और केवल अद्वैत प्रकाश तथा परमानंद शेष रहता है।

भक्तलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी महान श्लोक के प्रामाणिक मूल पाठ, पद-दर-पद शब्दार्थ, इसके पीछे की पौराणिक पृष्ठभूमि, इसके जप और चिंतन से प्राप्त होने वाले मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभों तथा साधकों के मन में उठने वाली जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य आधुनिक जीवनशैली से जूझ रहे प्रत्येक जिज्ञासु को वेदों और पुराणों के उस मूल अमृत से जोड़ना है जो मन को शांति और आत्मा को मोक्ष प्रदान करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के इस परम पावन श्लोक का पाठ और स्मरण विधि-विधान के साथ करने से चित्त शुद्ध होता है। आइए, इस श्लोक का सस्वर पाठ करें:

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥

पठन एवं स्मरण की विधि:
  • स्थान और समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या बेला में शांत एकांत स्थान पर आसन बिछाकर बैठें।
  • मानसिक शुद्धि: शरीर को स्वच्छ कर मन में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करें।
  • उच्चारण: प्रत्येक शब्द का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करें ताकि श्लोक की ऊर्जा आपके भीतर प्रवाहित हो सके।
  • नियमित अभ्यास: प्रतिदिन इस श्लोक का कम से कम 11 या 108 बार मानसिक जप या स्वाध्याय करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों का गांभीर्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई सारणी के माध्यम से हम इसके हर पद के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न नहीं निषेध का सूचक, यह दर्शाता है कि भौतिक साधन वहाँ असमर्थ हैं।
तत् उस (परम धाम को) उस अज्ञेय, अलौकिक और शाश्वत सत्ता या लोक की ओर संकेत।
भासयते प्रकाशित करता है रोशन करना या किसी वस्तु को उसकी उपस्थिति का बोध कराना।
सूर्यः सूर्य इस ब्रह्मांड को ऊर्जा और दिन का प्रकाश देने वाला मुख्य ग्रह।
न शशाङ्कः और न ही चंद्रमा रात्रि को शीतलता और चांदनी प्रदान करने वाला उपग्रह।
न पावकः और न ही अग्नि पृथ्वी पर ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश का तीसरा भौतिक स्रोत।
यत् जहाँ (जिस धाम को) वह दिव्य गंतव्य स्थान जहाँ जीवात्मा अपनी यात्रा समाप्त करती है।
गत्वा पहुँचकर पूर्ण ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग के द्वारा उस परम पद को प्राप्त कर लेना।
न निवर्तन्ते वापस नहीं लौटते संसार के दुखमय जन्म-मरण के चक्र (पुनर्जन्म) से पूर्ण मुक्ति।
तत् धाम वह धाम / वह निवास भगवान का परम स्वयंप्रकाशित निवास स्थान (वैकुंठ/ब्रह्मलोक)।
परमम् मम मेरा परम (सर्वोच्च) है यह घोषणा कि यह धाम किसी अन्य का नहीं, बल्कि स्वयं पुरुषोत्तम भगवान का है।

विस्तृत भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मेरे उस परम दिव्य धाम को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न ही अग्नि। वे सभी साधन वहाँ अपर्याप्त हो जाते हैं क्योंकि वह धाम स्वयं अपनी ज्योति से प्रकाशित है (स्वयंप्रकाश)। जो मनुष्य अपनी साधना और भक्ति के बल पर उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, वह इस संसार में पुनः लौटकर नहीं आता, अर्थात् वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का यह प्रसंग उस समय आता है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को इस संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वर्णन कर रहे हैं। इस संसार की जड़ें ऊपर (परमात्मा में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं। संसार की असारता और मोह-माया के बंधनों का वर्णन करने के बाद, भगवान यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि इस दुखों से भरे संसार से छूटने का उपाय क्या है और वह परम गंतव्य स्थान कैसा है जहाँ जाने के बाद जीव eternal bliss (शाश्वत आनंद) का अनुभव करता है।

वैदिक साहित्यों, विशेषकर उपनिषदों में इस श्लोक के मूल भाव को कई स्थानों पर देखा जा सकता है। उदाहरणार्थ, कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद में भी लगभग इसी प्रकार के मंत्र आते हैं— "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥" इसका अर्थ भी यही है कि उस परम प्रकाशवान ब्रह्म के सामने सूर्य, चंद्रमा, तारे और अग्नि भी फीके पड़ जाते हैं। वे सब उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।

महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली भगवद्गीता के इस श्लोक की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने सीधे अपने धाम ('मम धाम') का उल्लेख किया है। व्यास मुनि द्वारा रचित इस महाकाव्य में यह श्लोक अद्वैत वेदांत और वैष्णव भक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक रूप से, कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर जब अर्जुन विषाद से घिरे थे, तब भगवान ने उन्हें यह कहकर ढांढस बंधाया कि भौतिक जगत की नश्वरता से परे एक ऐसा दिव्य लोक भी है जहाँ केवल शांति, प्रेम और परम चेतना का साम्राज्य है। इस कथा और पृष्ठभूमि का स्मरण करने मात्र से साधक के हृदय में संसार के प्रति वैराग्य और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का उदय होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस छठे श्लोक का नियमित स्वाध्याय, मनन और जप करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

नियमित रूप से इस श्लोक का जप करने से अशांत मन शांत होता है, अनावश्यक चिंताएं दूर होती हैं और मानसिक संतुलन स्थापित होता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के कंपन से शरीर के आसपास एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा और सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।

3. कार्मिक शुद्धि (कन्फ्यूजन और पाप कर्मों से मुक्ति)

ईश्वर के परमधाम के स्मरण मात्र से चित्त में जमे हुए अज्ञान और बुरे कर्मों के संस्कारों की शुद्धि होने लगती है।

4. मृत्यु का भय समाप्त होना

जब साधक यह जान लेता है कि उसका वास्तविक घर इस नश्वर शरीर से परे है, तो उसके मन से मृत्यु का स्वाभाविक भय सदा के लिए मिट जाता है।

5. वैराग्य और उच्चकोटि की भक्ति

यह श्लोक भौतिक प्रलोभनों से मन को हटाकर भगवद्प्रेम और भक्ति की ओर प्रेरित करता है, जिससे सच्चे वैराग्य की प्राप्ति होती है।

6. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

गीता के श्लोकों को याद करने और उनके अर्थ पर विचार करने से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बौद्धिक क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है।

7. ईश्वरीय कृपा और शरण की प्राप्ति

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की अतुल्नीय कृपा और वात्सल्य बरसता है।

8. मोक्ष और परम गति का मार्ग प्रशस्त होना

जीवन के अंतिम समय में परमधाम का यह स्मरण जीव को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर सीधे भगवद प्राप्ति कराता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन वैदिक परंपरा, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य सहित) तथा विभिन्न उपनिषद ग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक सामग्री पहुँचे, वह पूरी तरह से वेदों, पुराणों और प्रामाणिक आचार्यों के वचनों के अनुरूप हो। इस संपूर्ण सामग्री को 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत उच्च कोटि के भाषाविदों और विद्वानों द्वारा परखा गया है ताकि यह आधुनिक पाठकों के लिए सुगम होने के साथ-साथ अपनी मूल दिव्यता को भी पूर्ण रूप से बनाए रखे। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल संदेश को बिना किसी मिलावट के आप तक पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह अत्यंत प्रसिद्ध और पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) का छठा (6) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार के स्वरूप और पुरुषोत्तम परमात्मा की महिमा का विस्तृत वर्णन किया है।

इस श्लोक में वर्णित "परम धाम" किसी भौतिक लोक (जैसे पृथ्वी या अन्य ग्रह) की तरह नहीं है, जिसे देखने के लिए सूर्य या चंद्रमा के प्रकाश की आवश्यकता पड़े। यह भगवान श्रीकृष्ण का वह दिव्य, स्वयंप्रकाशित आध्यात्मिक लोक (वैकुंठ या साकेत) है जो अज्ञान, दुख और मृत्यु से पूरी तरह परे है।

"यद्गत्वा न निवर्तन्ते" का अर्थ है कि जो जीवात्मा साधना, भक्ति और ज्ञान के मार्ग से उस परमधाम को प्राप्त कर लेती है, वह इस नश्वर और दुखों से भरे संसार के जन्म-मरण के चक्र (पुनर्जन्म) में कभी वापस नहीं लौटती। इसे ही सनातन धर्म में 'मोक्ष' या 'परम मुक्ति' कहा गया है।

हाँ, बिल्कुल! श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह गृहस्थ हो, विद्यार्थी हो या संन्यासी। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि कोई व्यक्ति इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करता है, तो उसका मन विकारों से दूर रहता है और घर में आध्यात्मिक शांति बनी रहती है।

श्रीमद्भगवद्गीता को स्वयं 'गीतोपनिषद' कहा जाता है। इस श्लोक के विचार सीधे तौर पर कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद के उन मंत्रों से मेल खाते हैं जो ब्रह्म के स्वयंप्रकाश स्वरूप का वर्णन करते हैं। गीता वेदों और उपनिषदों के इन्हीं कठिन रहस्यों को सरल हिंदी और संस्कृत श्लोकों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाती है।

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संकलन: मुख्य devotional scholar एवं संस्कृत भाषाविद्, Bhaktilok.in

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं कि उनका परम धाम (नित्य धाम) ऐसा है जिसे न सूर्य, न चन्द्रमा, न अग्नि प्रकाशित कर सकते हैं। वह स्वयंप्रकाश है। उस धाम में जाने के बाद जीव फिर संसार में नहीं लौटता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह परम धाम भौतिक जगत से परे है। वहाँ न तो सूर्य-चन्द्र की आवश्यकता है, न ही किसी बाहरी प्रकाश की। वहाँ पहुँचकर जीव मोक्ष को प्राप्त होता है, और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/20 30% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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