श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 7

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 54 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
मम
मेरा
एव
ही
अंशः
अंश
जीवलोके
जीव लोक (संसार) में
जीवभूतः
जीव रूप में स्थित
सनातनः
सनातन
मनःषष्ठानि
मन सहित छठे (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन)
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
प्रकृतिस्थानि
प्रकृति में स्थित
कर्षति
खींचता है (आकर्षित करता है)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मेरा ही सनातन अंश जीव लोक में जीव रूप में स्थित है, जो प्रकृति में स्थित मन सहित छठी (पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को खींचता है (अर्थात उनसे आसक्त होता है)।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व (Spiritual & Cosmic Significance)

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त उपनिषदों का सार और मोक्ष का प्रत्यक्ष मार्ग माना गया है। गीता के पन्द्रहवें अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है, का यह सातवां श्लोक (ममैवांशो जीवलोके...) संपूर्ण जीवसृष्टि के मूल स्वरूप और उसकी वर्तमान भौतिक स्थिति का सबसे स्पष्ट, दार्शनिक और अकाट्य विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस एक ही श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने जीव (आत्मा), परमात्मा (ब्रह्म), प्रकृति, और इन सबके पारस्परिक संबंधों की गुत्थी को अत्यंत सरल एवं सारगर्भित रूप में सुलझा दिया है।

सांसारिक जीवन में मनुष्य अक्सर खुद को एक लाचार प्राणी, दुखों का पुतला या केवल मांस-मज्जा से बने शरीर के रूप में देखता है। परंतु, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित और भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन को दिए गए इस उपदेश के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि प्रत्येक जीव का वास्तविक आंतरिक स्वरूप परम पवित्र, दिव्य, और उस असीम अनंत परमात्मा (ब्रह्म) का ही अंश है। जिस प्रकार एक विशाल अग्नि से निकलने वाली छोटी सी चिंगारी स्वभावतः अग्नि ही होती है, ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा भी सच्चिदानंद परमात्मा का ही सनातन अंश है।

परंतु, विडंबना यह है कि यह दिव्य अंश इस मर्त्यलोक (संसार) में आकर अपनी मूल पहचान को भूल जाता है। माया के प्रभाव से यह स्वयं को प्रकृति के अधीन कर लेता है और मन तथा पांच ज्ञानेन्द्रियों—कुल मिलाकर छह तत्वों—के साथ संघर्ष करता हुआ कर्मों के चक्रव्यूह में फंस जाता है। इस व्यापक लेख में, हम इसी अगाध और गूढ़ श्लोक का शब्दशः विश्लेषण, इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि, और इसके नियमित चिंतन से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों का गहन अध्ययन करेंगे ताकि हर साधक अपनी वास्तविक ऊर्जा और दिव्यता को पहचान सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

वैदिक परंपरा के अनुसार किसी भी श्लोक का उच्चारण उसकी मूल संस्कृत लिपि (देवनागरी) में शुद्ध स्वर और लय के साथ करना चाहिए। यह न केवल मन को एकाग्र करता है, बल्कि भीतर की ऊर्जा चक्रों (Chakras) को भी जाग्रत करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय के इस महत्वपूर्ण श्लोक का प्रामाणिक पाठ इस प्रकार है:

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।

मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७॥

पदच्छेद (Words Separation):

मम एव अंशः जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः-षष्ठानि इन्द्रियाणि प्रकृति-स्थानि कर्षति ॥

उच्चारण एवं पाठ विधि (Recitation Guidelines):
  • स्थान शुद्धि: प्रातः काल ब्रह्म बेला में या संध्यावहन के समय शांत एवं स्वच्छ आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • मानसिक तैयारी: श्लोक का पाठ करने से पूर्व तीन बार दीर्घ श्वास लें (प्राणायाम करें) और मन में भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें।
  • लयबद्ध उच्चारण: 'ममैवांशो' का उच्चारण स्पष्ट अनुस्वार के साथ करें। 'जीवलोके' बोलते समय स्वर में आरोह रखें और 'कर्षति' का उच्चारण करते समय श्वास को नियंत्रित रखें।
  • संकल्प: पाठ का उद्देश्य केवल रटना न हो, बल्कि श्लोक के प्रत्येक शब्द के मर्म को अपने दैनिक आचरण में उतारना होना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

इस श्लोक के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए इसके प्रत्येक पद (शब्द) का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अति आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में इसे विस्तार से समझाया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Implication)
मम (Mam) मेरा यह इंगित करता है कि जीव किसी स्वतंत्र या परित्यक्त सत्ता से नहीं, बल्कि सीधे परम पुरुषोत्तम भगवान विष्णु/कृष्ण की चेतना से निकला है।
एव (Eva) ही (निश्चित रूप से) यहाँ 'ही' शब्द इस बात की पुष्टि करता है कि जीवात्मा और परमात्मा में तात्विक रूप से कोई भिन्नता नहीं है, जैसे अग्नि और उसकी चिंगारी।
अंशः (Anshah) अंश (हिस्सा या विभागरहित प्रकाश) परमात्मा का अखंड अंश होने के कारण जीव स्वभाव से ही आनंदमय, चैतन्य और पवित्र है। अंश होने का अर्थ भाग होना नहीं, बल्कि प्रतिबिंब होना है।
जीवलोके (Jeevaloke) इस जीवलोक में (संसार में) मृत्युलोक या भौतिक संसार, जहाँ कर्मों का फल भोगने और अपनी चेतना को उन्नत करने के लिए जीवों का आवागमन होता है।
जीवभूतः (Jeevbhootah) जीव रूप में स्थित वह मूल चेतना जब प्रकृति के आवरण में ढंक जाती है, तब वह स्वयं को सीमित 'जीव' या अहंग्रस्त व्यक्ति के रूप में अनुभव करने लगती है।
सनातनः (Sanatanah) सनातन (नित्य, शाश्वत) आत्मा का कभी नाश नहीं होता। यह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे, काल की सीमाओं से मुक्त एक शाश्वत ऊर्जा है।
मनःषष्ठानि (Manah-shashtani) मन सहित छः पांच ज्ञानेंद्रियां (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण) और छठा मन—जो इन सबका संचालक और राजा माना गया है।
इन्द्रियाणि (Indriyani) इंद्रियां वे द्वार जिनके माध्यम से जीव बाहरी संसार के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) का अनुभव करता है और उनके प्रति आकर्षित होता है।
प्रकृतिस्थानि (Prakritisthani) प्रकृति में स्थित ये सभी इंद्रियां और मन भौतिक प्रकृति (त्रिगुणात्मक माया) के ही उत्पाद हैं, जिनसे आत्मा का वास्तविक कोई भौतिक संबंध नहीं होता।
कर्षति (Karshati) आकर्षित करता है / संघर्ष करता है आत्मा इन इंद्रियों और मन के बंधनों के कारण इस संसार में भारी संघर्ष करती है, खींचतान झेलती है और खुद को थका लेती है।

सार रूप में, यह तालिका दर्शाती है कि कैसे एक अनंत और पवित्र आत्मा जब मन और इंद्रियों के जाल में उलझ जाती है, तब वह अपनी असीम शांति खो बैठती है और संसार में संघर्ष करने लगती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Context)

श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें महाभारत के उस ऐतिहासिक मोड़ पर जाना होगा जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने ही स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से मना कर चुके थे। विषाद से घिरे अर्जुन को भगवान कृष्ण ने ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के विभिन्न आयाम समझाए। पन्द्रहवें अध्याय में, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है, भगवान कृष्ण संसार रूपी उलटे लटके हुए अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का रूपक प्रस्तुत करते हैं।

अश्वत्थ वृक्ष का रूपक और जीव की स्थिति:

भगवान कृष्ण समझाते हैं कि यह संसार एक ऐसे उल्टे वृक्ष की भांति है जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्मलोक या परमात्मा में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं। इस वृक्ष के पत्ते वैदिक छंद हैं और इसके तना-शाखाएं तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से पोषित हैं। इस संसार रूपी वृक्ष में फंसे रहने के कारण ही जीव अपनी वास्तविक दिव्यता को भूल जाता है। जब तक जीव अज्ञानता के अंधकार में रहता है, वह यह मानता है कि शरीर ही सब कुछ है और इंद्रियों के भोग ही उसका परम लक्ष्य हैं।

वेदों और उपनिषदों में जीव और परमात्मा का संबंध:

यह श्लोक केवल गीता का ही नहीं, बल्कि उपनिषदों के महावाक्यों का ही पद्यात्मक विस्तार है। मुण्डकोपनिषद् और श्वेताश्वतर उपनिषद में इसका सुंदर दृष्टांत मिलता है जहाँ दो पक्षियों की कथा आती है—एक पक्षी (जीव) वृक्ष का मीठा-कड़वा फल खा रहा है, और दूसरा पक्षी (परमात्मा) बिना कुछ खाए शांत भाव से केवल साक्षी बनकर बैठा हुआ है। जब जीव उस शांत और दिव्य साक्षी रूपी परमात्मा की ओर देखता है, तब उसका सारा शोक और मोह समाप्त हो जाता है।

महाभारत के अनुशासन पर्व और शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को यही ज्ञान देते हुए स्पष्ट किया था कि जब तक मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में नहीं करता, तब तक वह चाहे जितने भी बड़े अनुष्ठान या यज्ञ कर ले, उसे आंतरिक शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान कृष्ण का यह सातवां श्लोक इसी महान वैदिक परंपरा का जीवंत दस्तावेज है, जो हमें यह सिखाता है कि बंधन और मोक्ष दोनों का द्वार हमारा अपना मन ही है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय के इस सातवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से मानव जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन योग विज्ञान दोनों इस बात की पुष्टि करते हैं कि उच्च कोटि के दार्शनिक व आध्यात्मिक विचारों का स्मरण करने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सुधरती है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति एवं एकाग्रता (Mental Peace & Focus)

मन और छह इंद्रियों के संघर्ष को समझने से मनुष्य अपनी उत्तेजना और आवेगों पर नियंत्रण पाना सीख जाता है, जिससे अत्यधिक मानसिक शांति मिलती है।

2. आत्म-बोध और अहंकार का शमन (Self-Realization)

यह अहसास कि हम केवल नश्वर शरीर नहीं बल्कि परमात्मा के सनातन अंश हैं, हमारे भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या और तुच्छ स्वार्थों को समाप्त कर देता है।

3. सकारात्मक और ऊर्जावान आभा (Positive Aura)

दिव्य श्लोकों का नित्य उच्चारण शरीर के इर्द-गिर्द एक सकारात्मक सुरक्षात्मक ऊर्जा का घेरा (Aura) निर्मित करता है, जो नकारात्मक शक्तियों को रोकता है।

4. कर्मों की शुद्धि (Karmic Purification)

जब साधक यह जान लेता है कि इंद्रियां प्रकृति के अधीन हैं, तो वह अनासक्त भाव (निष्काम कर्म) से कार्य करना शुरू कर देता है, जिससे नए कर्मबंध नहीं बनते।

5. भय और चिंता से मुक्ति (Freedom from Anxiety)

मृत्यु और भविष्य के अज्ञात भय से ग्रसित मनुष्यों के लिए यह श्लोक एक अचूक औषधि है, क्योंकि यह आत्मा की अमरता (सनातनता) की गारंटी देता है।

6. भगवान के प्रति गाढ़ भक्ति (Deep Devotion)

अपने और परमात्मा के बीच के सीधे रिश्ते को जानकर साधक के हृदय में परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और कृतज्ञता का भाव जागृत होता है।

7. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Decision Making)

मन की चंचलता शांत होने से व्यक्ति विकट परिस्थितियों में भी विवेकपूर्ण और सत्य के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है।

8. मोक्ष और परम शांति का मार्ग (Path to Liberation)

सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठने की यह साधना धीरे-धीरे जीव को भवसागर से पार उतारकर मोक्ष के द्वार तक ले जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in का यह लेख प्रामाणिक वैदिक साहित्यों, श्रीमद्भगवद्गीता के आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामानुजचार्य और स्वामी गीतानंद जी के भाष्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन धर्म शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि इस लेख में प्रस्तुत प्रत्येक श्लोक का अर्थ, शब्दार्थ और उसकी दार्शनिक व्याख्या वेदों एवं उपनिषदों की मूल भावना के सर्वथा अनुकूल हो। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी भ्रम के, शुद्ध, तार्किक और उच्च कोटि की आध्यात्मिक सामग्री प्रदान करना है। यदि आप इस विषय पर अधिक शोध करना चाहते हैं, तो आप 'श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर' अथवा 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (स्वामी विवेकानंद/शंकराचार्य)' के ग्रंथों का अध्ययन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

वैदिक दर्शन में मन को छठा इंद्रिय माना गया है। पांच ज्ञानेंद्रियां (कान, त्वचा, आंख, जीभ, नाक) केवल बाहरी विषयों को ग्रहण करती हैं, परंतु उन विषयों को अच्छा या बुरा मानना, उनके प्रति इच्छा या द्वेष उत्पन्न करना मन का कार्य है। इसलिए मन को इन पांचों इंद्रियों का राजा या संचालक कहा गया है। जब जीव संसार में आता है, तो वह इन छह तत्वों (पांच इंद्रियां + मन) के साथ जुड़कर आसक्त हो जाता है।

सनातन धर्म में परमात्मा को 'अखंड' (जिसके टुकड़े न हो सकें) माना गया है। अतः 'अंश' का भौतिक अर्थ टुकड़ा नहीं है। इसका सही दार्शनिक अर्थ 'प्रतिबिंब' (Reflection) या 'अंशभूत ऊर्जा' है। जिस प्रकार एक सूर्य के प्रकाश की किरण उसकी ही ऊर्जा का अंश होती है, किंतु सूर्य अखंड रहता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी परमात्मा की चैतन्य शक्ति का ही एक सनातन अंश है।

यह श्लोक मनुष्य को आत्म-निरीक्षण (Self-introspection) की प्रेरणा देता है। जब भी व्यक्ति को क्रोध, वासना, लोभ या अत्यधिक मोह घेरता है, तब इस श्लोक का स्मरण उसे याद दिलाता है कि "मैं शरीर या इन विकारों का गुलाम नहीं हूँ, बल्कि मेरा मूल स्वरूप पवित्र और परमात्मा का अंश है।" यह विचार व्यक्ति को तुरंत गलत कार्यों से रोकने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।

'प्रकृतिस्थानि' का अर्थ है प्रकृति में स्थित (मन और इंद्रियों के साथ)। 'कर्षति' का अर्थ है खींचतान करना या संघर्ष करना। चूंकि आत्मा का स्वभाव आनंद और स्वतंत्रता है, लेकिन वह जब प्रकृति के बंधनों (सुख-दुःख, राग-द्वेष) में खुद को बांध लेती है, तब उसे इस संसार में भारी संघर्ष और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। इसी आंतरिक खिंचाव को कर्षति कहा गया है।

पन्द्रहवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने क्षर पुरुष (नश्वर संसार और शरीर), अक्षर पुरुष (कूटस्थ चैतन्य) और इन दोनों से परे सर्वोच्च 'पुरुषोत्तम' यानी स्वयं अपनी परम दिव्य सत्ता का विस्तार से वर्णन किया है। चूंकि इस अध्याय का समापन सर्वोत्तम पुरुष (परमात्मा) के ज्ञान पर होता है, इसलिए इसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है।

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं कि यह जीवात्मा (जीव) मेरा ही सनातन अंश है। संसार में आकर यह प्रकृति से उत्पन्न पाँच ज्ञानेन्द्रियों और मन (छठी) को अपने साथ खींचता है, अर्थात उनसे आसक्त हो जाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जीव का वास्तविक स्वरूप परमात्मा का अंश होना है, लेकिन माया के कारण वह अपने को शरीर और इंद्रियों से तादात्म्य कर लेता है। यही भ्रम है। इस भ्रम से मुक्त होना ही मोक्ष है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/20 35% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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