पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में बताया गया है कि जीवात्मा परमात्मा का सनातन अंश है, जो संसार में मन और इंद्रियों से आसक्त होता है।

संस्कृत श्लोक

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७॥

mamaivāṃśo jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ | manaḥ-ṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛti-sthāni karṣati ||7||

पदच्छेद / शब्दार्थ

मम: मेरा; एव: ही; अंशः: अंश; जीवलोके: जीव लोक (संसार) में; जीवभूतः: जीव रूप में स्थित; सनातनः: सनातन; मनःषष्ठानि: मन सहित छठे (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन); इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; प्रकृतिस्थानि: प्रकृति में स्थित; कर्षति: खींचता है (आकर्षित करता है)।

हिंदी अनुवाद

मेरा ही सनातन अंश जीव लोक में जीव रूप में स्थित है, जो प्रकृति में स्थित मन सहित छठी (पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को खींचता है (अर्थात उनसे आसक्त होता है)।

English Translation

An eternal fragment of My very Self, having become a living being in the world of life, draws (to itself) the senses, of which the mind is the sixth, abiding in Nature.

टीका / Commentary

यह श्लोक जीवात्मा की स्थिति बताता है – वह परमात्मा का ही अंश है, परंतु संसार में आकर वह मन और इंद्रियों से आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति ही बंधन का कारण है।