पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 8
श्लोक ८ में बताया गया है कि जीव मन और इंद्रियों सहित एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है, जैसे वायु गंध को ले जाती है।
संस्कृत श्लोक
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८॥
śarīraṃ yad avāpnoti yac cāpy utkrāmatīśvaraḥ | gṛhītvaitāni saṃyāti vāyur gandhān ivāśayāt ||8||
पदच्छेद / शब्दार्थ
शरीरम्: शरीर; यत्: जब; अवाप्नोति: प्राप्त करता है; यत्: जब; च: भी; अपि: भी; उत्क्रामति: त्यागता है (शरीर से बाहर निकलता है); ईश्वरः: जीव (शरीर का स्वामी); गृहीत्वा: ग्रहण करके; एतानि: इन (मन और इंद्रियों) को; संयाति: चला जाता है; वायुः: वायु; गन्धान्: गंधों को; इव: जैसे; आशयात्: अपने स्थान से (सुगंध के स्रोत से)।
हिंदी अनुवाद
जैसे वायु अपने स्थान (पुष्प आदि) से गंधों को लेकर चलती है, उसी प्रकार शरीर का स्वामी (जीव) जब शरीर ग्रहण करता है और जब उसे त्यागता है, तब इन (मन और इंद्रियों) को लेकर जाता है।
English Translation
When the Lord (the individual soul) acquires a body and when He departs from it, He takes these (senses and mind) with Him, just as the wind carries away scents from their seats (the flowers).
टीका / Commentary
यह श्लोक जीव के पुनर्जन्म के सिद्धांत को समझाता है। जैसे वायु गंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, वैसे ही जीव अपने सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि, इंद्रियाँ) के साथ एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है।