पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 9

श्लोक ९ में वर्णन है कि जीव कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन के द्वारा इंद्रिय-विषयों का भोग करता है।

संस्कृत श्लोक

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९॥

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇam eva ca | adhiṣṭhāya manaś cāyaṃ viṣayān upasevate ||9||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्रोत्रम्: कान; चक्षुः: आँख; स्पर्शनम्: त्वचा; च: और; रसनम्: जीभ; घ्राणम्: नाक; एव: ही; च: भी; अधिष्ठाय: अधिष्ठान करके (आश्रय लेकर); मनः: मन; च: और; अयम्: यह (जीव); विषयान्: विषयों को; उपसेवते: भोगता है।

हिंदी अनुवाद

कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर यह (जीव) विषयों को भोगता है।

English Translation

Presiding over the ear, the eye, the skin, the tongue, and the nose, as well as the mind, this (soul) enjoys the objects of the senses.

टीका / Commentary

यह श्लोक बताता है कि जीव शरीर में रहते हुए किस प्रकार इंद्रियों और मन के द्वारा विषयों का भोग करता है। वह इनका स्वामी नहीं, बल्कि इनके अधीन होकर भोग करता है।