श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 9

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 37 मिनट का पठन 143 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
श्रोत्रम्
कान
चक्षुः
आँख
स्पर्शनम्
त्वचा
च
और
रसनम्
जीभ
घ्राणम्
नाक
एव
ही
च
भी
अधिष्ठाय
अधिष्ठान करके (आश्रय लेकर)
मनः
मन
च
और
अयम्
यह (जीव)
विषयान्
विषयों को
उपसेवते
भोगता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर यह (जीव) विषयों को भोगता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय महत्व (Spiritual Introduction)

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के १५वें अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्रीकृष्‍ण ने संसार और जीवात्मा के अत्यंत गूढ़ रहस्यों का पर्दाफाश किया है। प्रस्तुत श्लोक संख्या ९ — "श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥" — इस बात का अत्यंत स्पष्ट और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है कि किस प्रकार एक साधारण जीव (आत्मा) इस नाशवान भौतिक शरीर में प्रवेश करके, प्रकृति द्वारा प्रदत्त इंद्रियों और मन के माध्यम से संसार के विषयों का भोग करता है।

वैदिक दर्शन में मनुष्य जीवन को मात्र संयोग नहीं बल्कि एक अत्यंत सुनियोजित कर्म-क्षेत्र माना गया है। जीवात्मा, जो कि मूल रूप से सच्चिदानंद स्वरूप है, जब अज्ञानता या माया के वशीभूत होकर स्वयं को शरीर मान बैठती है, तब वह अपनी ही शक्तियों — अर्थात् ज्ञानेंद्रियों और मन — के अधीन हो जाती है। यह श्लोक हमें आत्म-निरीक्षण (Introspection) की प्रेरणा देता है। यह हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि हम इन इंद्रियों के स्वामी (मालिक) हैं, न कि इनके गुलाम। जब तक मनुष्य इस भेद को नहीं समझता, तब तक वह सांसारिक विषयों के चक्रव्यूह में उलझा रहता है और जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता। इस प्रकार, यह श्लोक न केवल दार्शनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में मानसिक अनुशासन और संयम स्थापित करने के लिए भी एक अचूक औषधि की तरह कार्य करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।

अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९॥

श्लोकाचार्य एवं उच्चारण विधि: श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का उच्चारण करते समय दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'श्रोत्रं' (Srotram) का उच्चारण करते समय अनुस्वार की शुद्धता बनाए रखें। गीता के इन श्लोकों का पाठ करने से न केवल वाणी शुद्ध होती है, बल्कि मन में एकाग्रता और सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र मन से इस श्लोक का कम से कम ग्यारह बार पाठ करे। इससे इंद्रियों पर नियंत्रण पाने की अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में अगाध ज्ञान छिपा है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहन आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रोत्रम् कान (Hearing sense) शब्द रूपी तन्मात्रा को ग्रहण करने वाली ज्ञानेंद्रिय, जिसके माध्यम से जीव बाहरी आवाज़ों को सुनता है।
चक्षुः नेत्र या आँखें (Vision) रूप और रंगों का दर्शन कराने वाली इंद्रिय, जो संसार के सौंदर्य को देखकर मन को आकर्षित करती है।
स्पर्शनम् त्वचा या स्पर्श इंद्रिय (Touch) कोमलता, कठोरता, उष्णता और शीतलता का अनुभव कराने वाली संपूर्ण शरीर की त्वचा।
च और (And) इन सभी इंद्रियों के समुच्चय को आपस में और मन के साथ जोड़ने वाला योजक पद।
रसनम् जीभ या रसना (Taste) षड्रस (मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा, कसैला) का स्वाद चखने वाली और वाणी का उच्चारण करने वाली इंद्रिय।
घ्राणम् एव च तथा नाक या गंध इंद्रिय ही सुगंध और दुर्गंध का अनुभव कराने वाली घ्राणेन्द्रिय।
अधिष्ठाय आश्रय लेकर या बैठकर शरीर रूपी रथ में विराजमान होकर इन समस्त यंत्रों (इंद्रियों) का नियंत्रण अपने हाथ में लेना।
मनः च और मन को भी संकल्प-विकल्प करने वाले अंतःकरण (मन) को अपना साधन बनाकर।
अयम् यह (जीवात्मा) परमात्मा का अंश वह अज्ञानी जीव जो स्वयं को शरीर मान बैठा है।
विषयान् शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि विषयों को संसार के भोग्य पदार्थों और भौतिक सुखों को।
उपसेवते भोग करता है / सेवन करता है आसक्ति के साथ उन विषयों में रम जाता है और उनके अधीन होकर कर्म करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन घोर विषाद में डूब गए थे और अपने ही सगे-सम्बन्धियों के प्रति मोह के कारण शस्त्र त्यागने लगे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन और जगत का परम सत्य समझाने के लिए गीता का उपदेश दिया था। यह पंद्रहवां अध्याय विशेष रूप से 'पुरुषोत्तम योग' कहलाता है, जिसमें संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष के रूप में वर्णित किया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं।

इस प्रसंग में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता की रचना की है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यह जीव जब एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाता है, तब मन और पांचों इंद्रियों को अपने साथ लेकर जाता है—ठीक वैसे ही जैसे वायु गंध को उसके उद्गम स्थल से उड़ाकर ले जाती है। मूर्ख लोग यह नहीं देख पाते कि शरीर को छोड़ने वाला, शरीर में रहने वाला या विषयों का भोग करने वाला यह जीव वास्तव में प्रकृति के गुणों से बंधा हुआ है।

पौराणिक कथाओं और उपनिषदों (विशेषकर कठोपनिषद) में भी इस शरीर की तुलना एक रथ से की गई है। इस रथ में बैठने वाला स्वामी 'आत्मा' है, इस रथ को खींचने वाले घोड़े 'पाँच इंद्रियां' हैं, घोड़े की लगाम 'मन' है, और इस रथ का सारथी 'बुद्धि' है। यदि सारथी (बुद्धि) सतर्क न हो और लगाम (मन) कमजोर पड़ जाए, तो घोड़े (इंद्रियां) रथ को खड्ड में गिरा देते हैं। यही बात हमारे प्रस्तुत श्लोक में बहुत ही वैज्ञानिक और दार्शनिक रूप से समझाई गई है कि कैसे यह जीवात्मा मन और इंद्रियों के अधीन होकर विषयों के पीछे भागती है और दुखों को प्राप्त करती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय के इस नौवें श्लोक का नियमित पाठ और मनन करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण (Sense Control)

इस श्लोक के निरंतर स्मरण से साधक को यह बोध होता है कि वह इंद्रियों का गुलाम नहीं, बल्कि उनका नियंत्रक है, जिससे वासनाओं पर विजय पाने में मदद मिलती है।

2. मानसिक शांति और एकाग्रता

बहिष्कृत और बाहरी विषयों की ओर भागने वाले मन को अंतर्मुखी बनाने में यह श्लोक एक शक्तिशाली मानसिक टॉनिक का काम करता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Purification of Karma)

जब मनुष्य यह समझ जाता है कि भोगों का असली हकदार आत्मा नहीं बल्कि जड़ प्रकृति है, तो उसकी कर्मों के प्रति आसक्ति कम हो जाती है, जिससे कर्म बंधन कटते हैं.

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार

गीता के श्लोकों के कंपन (Vibrations) से शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक सात्विक आवरण (Positive Aura) का निर्माण होता है।

5. मोह और अज्ञानता का नाश

संसार के नश्वर पदार्थों के प्रति जो अस्वाभाविक आकर्षण या मोह होता है, वह इस ज्ञान के प्रकाश में धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

6. आत्म-साक्षात्कार की दिशा में कदम

यह श्लोक साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' और शरीर-आत्मा के भेद को समझने की दिव्य दृष्टि प्रदान करता है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

7. तनाव और अवसाद से मुक्ति

सांसारिक असफलताओं और इच्छाओं की पूर्ति न होने पर होने वाले मानसिक तनाव और डिप्रेशन से लड़ने की आंतरिक शक्ति मिलती है।

8. ईश्वर के प्रति शरणागति

जीव की अपनी लाचारी और भगवान की महानता का बोध होने से हृदय में अनन्य भक्ति और शरणागति का भाव जागृत होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस धार्मिक और आध्यात्मिक आलेख को वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य एवं स्वामी रामसुखदास जी के वचनों के आधार पर) तथा सनातन परंपरा के पारंपरिक आचार्यों के मार्गदर्शन में अत्यंत सावधानी के साथ तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल शुद्ध, मिलावट-रहित और तार्किक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है।

इस सामग्री को तैयार करते समय संदर्भ ग्रंथों की प्रामाणिकता का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार की भ्रामक या अवैदिक जानकारी से बचा जा सके। आधुनिक जीवनशैली से जूझ रहे पाठकों के लिए गीता के इन उपदेशों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करना ही हमारा मुख्य ध्येय है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'विषयानुपसेवते' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'विषयान्' (शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि भोग्य पदार्थ) और 'उपसेवते' (भक्तिपूर्वक सेवन करना या भोग करना)। इसका अर्थ है कि जीवात्मा जब मन और इंद्रियों का सहारा लेती है, तब वह संसार के भौतिक विषयों में आसक्त होकर उनका उपभोग करती है और उनके सुख-दुखों को अनुभव करती है।

मूल रूप से आत्मा असंग, पवित्र और भोक्ता नहीं है, वह तो केवल द्रष्टा (देखने वाली) है। परंतु अज्ञानतावश (अविद्या के कारण) जब वह स्वयं को इस नश्वर शरीर से जोड़ लेती है, तब वह मन और इंद्रियों के माध्यम से ऐसा मान बैठती है कि वह स्वयं विषयों का भोग कर रही है। यही जीव का बंधन है।

व्यावहारिक जीवन में यह श हमें सिखाता है कि जब भी हमारी आंखें किसी बुरी वस्तु को देखना चाहें, कान कोई बुरी बात सुनना चाहें, या जीभ किसी असंयमित आहार की मांग करे, तो हमें तुरंत यह सोचना चाहिए कि 'मैं इन इंद्रियों का स्वामी हूँ, इनका गुलाम नहीं।' यह विचार हमें तुरंत आत्म-नियंत्रण (Self-Control) प्रदान करता है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के अंतर्गत आता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी वृक्ष का वर्णन करते हुए जीवात्मा की गति, उसके शरीर बदलने की प्रक्रिया और अंत में परम पुरुषोत्तम परमात्मा के स्वरूप को अत्यंत सरल भाषा में समझाया है।

नहीं, श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक के पाठ के लिए किसी कठोर दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा, पवित्रता और सात्विक भाव के साथ किसी भी समय पढ़ सकता है। हाँ, प्रातःकाल स्नान करके पाठ करने से मानसिक पवित्रता अधिक जल्दी प्राप्त होती है।

© सर्वाधिकार सुरक्षित | Bhaktilok.in - सनातन संस्कृति और अध्यात्म का समर्पित मंच

"ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जीव शरीर में रहकर श्रोत्र (कान), चक्षु (आँख), स्पर्शन (त्वचा), रसना (जीभ), घ्राण (नाक) तथा मन – इन सबका आश्रय लेकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि विषयों का भोग करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जीव की विषयों में आसक्ति ही बंधन का कारण है। वह सोचता है कि मैं भोग कर रहा हूँ, जबकि वास्तव में वह इंद्रियों और मन के माध्यम से प्रकृति के साथ क्रीड़ा कर रहा है। यह भोग ही उसे पुनर्जन्म के चक्र में डालता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 9 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 9/20 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!