पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 10
श्लोक १० में बताया गया है कि अज्ञानी जीव की उपस्थिति को नहीं देख पाते, जबकि ज्ञानी जन उसे ज्ञान-चक्षुओं से देखते हैं।
संस्कृत श्लोक
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १०॥
utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam | vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñāna-cakṣuṣaḥ ||10||
पदच्छेद / शब्दार्थ
उत्क्रामन्तम्: जाते हुए (शरीर त्यागते हुए); स्थितम्: स्थित (शरीर में रहते हुए); वा: या; अपि: भी; भुञ्जानम्: भोग करते हुए; वा: या; गुणान्वितम्: गुणों से युक्त; विमूढा: मूढ़ (अज्ञानी) जन; न: नहीं; अनुपश्यन्ति: देख पाते; पश्यन्ति: देखते हैं; ज्ञानचक्षुषः: ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी)।
हिंदी अनुवाद
जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों सहित विषयों को भोगते हुए जीव को मूढ़ (अज्ञानी) लोग नहीं देख पाते, किन्तु ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी) उसे देखते हैं।
English Translation
The deluded do not see the soul when it departs from the body, when it stays in it, or when it enjoys objects associated with the modes; but those with the eye of wisdom see it.
टीका / Commentary
यह श्लोक जीव की सूक्ष्म गतिविधियों को देखने की क्षमता का वर्णन करता है। अज्ञानी जीव के शरीर त्यागने, रहने या भोग करने की वास्तविकता को नहीं समझते, जबकि ज्ञानी जन आत्म-साक्षात्कार द्वारा उसे देखते हैं।