श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 10

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 23 मिनट का पठन 186 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
उत्क्रामन्तम्
जाते हुए (शरीर त्यागते हुए)
स्थितम्
स्थित (शरीर में रहते हुए)
वा
या
अपि
भी
भुञ्जानम्
भोग करते हुए
वा
या
गुणान्वितम्
गुणों से युक्त
विमूढा
मूढ़ (अज्ञानी) जन
न
नहीं
अनुपश्यन्ति
देख पाते
पश्यन्ति
देखते हैं
ज्ञानचक्षुषः
ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों सहित विषयों को भोगते हुए जीव को मूढ़ (अज्ञानी) लोग नहीं देख पाते, किन्तु ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी) उसे देखते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवां अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है, वेदों के सार का निचोड़ है। प्रस्तुत श्लोक—"उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥"—मानव चेतना की उस सूक्ष्म अवस्था का वर्णन करता है जिसे साधारण भौतिक दृष्टि से देख पाना असंभव है। यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि आत्मा का अस्तित्व शरीर से सर्वथा स्वतंत्र है। जब जीव शरीर त्यागता है (उत्क्रामन्तं), जब वह शरीर में स्थित रहता है (स्थितं), या जब वह प्रकृति के गुणों के माध्यम से विषयों का भोग करता है (भुञ्जानं), तब भी वह अपनी शुद्ध अवस्था में निर्लिप्त रहता है।

सांसारिक मनुष्य, जो केवल इंद्रियों के अधीन हैं, वे इस सूक्ष्म सत्य को नहीं देख पाते। वे शरीर को ही 'स्व' मान लेते हैं, जिससे वे जन्म-मरण के चक्र में भ्रमित रहते हैं। इसके विपरीत, 'ज्ञानचक्षु' (ज्ञान रूपी नेत्र) वाले ज्ञानी पुरुष यह देख पाते हैं कि आत्मा न तो कभी मरती है और न ही कभी जन्म लेती है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक है जो हमें भौतिकता के अंधकार से निकालकर आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश की ओर ले जाता है। इसका सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह हमें 'अहंकार' के त्याग और 'आत्मा' की शाश्वतता का बोध कराता है, जो भारतीय दर्शन का मूल आधार है। इस श्लोक का चिंतन करने से साधक के भीतर वह दिव्य दृष्टि विकसित होती है, जिससे वह संसार के प्रत्येक कण में परमात्मा का अंश देख सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'उत्क्रामन्तं' में 'त्' और 'क' का स्पष्ट मेल होना चाहिए। 'ज्ञानचक्षुषः' का उच्चारण करते समय 'क्ष' पर विशेष ध्यान दें। इसे शांत चित्त होकर, पद्मासन या सुखासन में बैठकर, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर जपें। प्रतिदिन 108 बार इसका मानसिक जप करने से बुद्धि की सूक्ष्मता बढ़ती है और अंतःकरण शुद्ध होता है। यह श्लोक हमें यह स्मरण दिलाता है कि हम शरीर नहीं, अपितु अविनाशी आत्मा हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
उत्क्रामन्तम्शरीर से निकलते हुएआत्मा का एक शरीर त्यागकर दूसरे में प्रवेश करने की प्रक्रिया।
स्थितम्शरीर में स्थितआत्मा का वर्तमान शरीर में निवास करना।
वा अपिअथवा भीदोनों ही अवस्थाओं में आत्मा की उपस्थिति।
भुञ्जानम्भोग करते हुएइंद्रियों के माध्यम से विषयों का अनुभव करना।
गुणान्वितम्प्रकृति के गुणों से युक्तसत्व, रज और तम गुणों के प्रभाव में कार्य करना।
विमूढाःअज्ञानी जनजो माया के वशीभूत होकर सत्य को नहीं देख पाते।
न अनुपश्यन्तिनहीं देख पातेआत्मा के सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव न कर पाना।
पश्यन्तिदेखते हैंआत्म-साक्षात्कार प्राप्त ज्ञानी पुरुष।
ज्ञानचक्षुषःज्ञान रूपी नेत्रों वालेवह दिव्य दृष्टि जो शास्त्रों और गुरु के उपदेश से प्राप्त होती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह अध्याय कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह उपदेश है, जो कालजयी है। जब अर्जुन विषाद में थे, तब भगवान ने उन्हें 'पुरुषोत्तम' का ज्ञान दिया। इस श्लोक की पृष्ठभूमि में वेदों का वह ज्ञान है जो 'कठोपनिषद' और 'श्वेताश्वतर उपनिषद' में भी वर्णित है। प्राचीन ऋषियों ने इसे 'आत्म-विद्या' कहा है।

पौराणिक संदर्भ में, हम देखते हैं कि कैसे धृतराष्ट्र जैसे पात्र, जो शारीरिक दृष्टि से तो संपन्न थे, किंतु 'ज्ञानचक्षु' के अभाव में अपने पुत्रों के मोह में अंधे थे। दूसरी ओर, संजय को भगवान व्यास ने वह दिव्य दृष्टि दी थी, जिससे वे कुरुक्षेत्र की घटनाओं को दूर बैठे देख पा रहे थे। यह श्लोक उसी 'संजय दृष्टि' की ओर संकेत करता है। जब हम सांसारिक मोह में फंसते हैं, तो हम 'विमूढ़' हो जाते हैं। लेकिन जब हम गुरु के चरणों में बैठकर शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो हमारे भीतर 'ज्ञानचक्षु' का प्राकट्य होता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल शरीर का पोषण करना नहीं, बल्कि उस आत्मा को पहचानना है जो इस शरीर के भीतर रहकर भी इससे परे है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का मोहभंग इसी ज्ञान के माध्यम से हुआ था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि आत्मा का एक वस्त्र बदलकर दूसरे में प्रवेश करने की प्रक्रिया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक के नियमित चिंतन से मन की चंचलता कम होती है और व्यक्ति शांत रहता है।
  • मृत्यु का भय समाप्त: आत्मा की अमरता का बोध होने से मृत्यु के प्रति स्वाभाविक भय दूर हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नित्य जप से साधक के चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • कर्म शुद्धि: यह बोध कि हम गुणों के अधीन हैं, हमें कर्मों के प्रति अधिक जागरूक और तटस्थ बनाता है।
  • विवेक की जागृति: 'ज्ञानचक्षु' के सक्रिय होने से सही और गलत के बीच भेद करने की क्षमता विकसित होती है।
  • अहंकार का नाश: यह श्लोक 'मैं' और 'मेरा' के मिथ्या अहंकार को नष्ट करने में सहायक है।
  • ईश्वरीय कृपा: निरंतर अभ्यास से साधक को परमात्मा की कृपा का अनुभव होने लगता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान की गहराई में उतरने के लिए यह श्लोक एक शक्तिशाली मंत्र की तरह कार्य करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय के दसवें श्लोक पर आधारित है। इसमें दी गई व्याख्याएं आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य और आधुनिक वेदांत भाष्यकारों के सिद्धांतों के समन्वय से तैयार की गई हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों से सरल भाषा में जोड़ना है। यह सामग्री पूर्णतः प्रामाणिक ग्रंथों के संदर्भों पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार के कपोल-कल्पित दावों का समावेश नहीं किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका के रूप में ग्रहण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

ज्ञानचक्षु का अर्थ है वह दिव्य दृष्टि जो शास्त्रों के अध्ययन, गुरु की कृपा और निरंतर ध्यान से प्राप्त होती है। यह भौतिक आंखों से परे सत्य को देखने की क्षमता है।

अज्ञानता स्थायी नहीं है। जैसे ही व्यक्ति जिज्ञासा और भक्ति के मार्ग पर चलता है, अज्ञान का पर्दा हटने लगता है और वह सत्य को देखने में सक्षम हो जाता है।

इसका अर्थ है प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त। जीव जब तक माया में है, वह इन गुणों के प्रभाव में कार्य करता है।

दैनिक जीवन में किसी भी कार्य को करते समय यह स्मरण रखें कि आप केवल शरीर नहीं हैं। यह भाव आपको तनाव और आसक्ति से मुक्त रखेगा।

हाँ, आत्म-साक्षात्कार ही मोक्ष का प्रथम सोपान है। जब हम स्वयं को शरीर से अलग देख लेते हैं, तब हम बंधन मुक्त होने की दिशा में अग्रसर होते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जीव जब शरीर त्यागता है, जब शरीर में स्थित रहता है, या जब गुणों के साथ विषयों का भोग करता है, तब अज्ञानी (विमूढ़) उसे नहीं देख पाते। किन्तु ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी) उसे देखते हैं, अर्थात आत्मा की गतिविधियों को समझते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है, वह इंद्रियों या मन का विषय नहीं है। उसे केवल ज्ञान (विवेक) से देखा जा सकता है। ज्ञानीजन आत्मा को शरीर से भिन्न जानते हैं, इसलिए वे जन्म-मरण से परे हो जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/20 50% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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