पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 11

श्लोक ११ में बताया गया है कि योगीजन प्रयत्नपूर्वक आत्मा को देखते हैं, किन्तु अशुद्ध अन्तःकरण वाले उसे नहीं देख पाते।

संस्कृत श्लोक

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११॥

yatanto yoginaś cainaṃ paśyanty ātmany avasthitam | yatanto 'py akṛtātmāno nainaṃ paśyanty acetasaḥ ||11||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यतन्तः: प्रयत्न करते हुए; योगिनः: योगी जन; च: और; एनम्: इस (आत्मा) को; पश्यन्ति: देखते हैं; आत्मनि: अपने में; अवस्थितम्: स्थित; यतन्तः: प्रयत्न करते हुए; अपि: भी; अकृतात्मानः: अशुद्ध अन्तःकरण वाले (जिन्होंने आत्मा को नहीं जाना); न: नहीं; एनम्: इसे; पश्यन्ति: देखते; अचेतसः: बुद्धिहीन (विवेकहीन)।

हिंदी अनुवाद

प्रयत्नशील योगीजन इस आत्मा को अपने ही भीतर स्थित देखते हैं, किन्तु अशुद्ध अन्तःकरण वाले अप्रबुद्ध (अचेतस) जन प्रयत्न करते हुए भी उसे नहीं देख पाते।

English Translation

The Yogis striving (for perfection) see the Self abiding in themselves; but the unrefined (impure-minded) ones, though striving, do not see Him, lacking discrimination.

टीका / Commentary

यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार के लिए आवश्यक शर्त बताता है – केवल प्रयत्न ही नहीं, अपितु अन्तःकरण की शुद्धि और विवेक भी आवश्यक है। योगीजन साधना द्वारा आत्मा को देख लेते हैं, किन्तु अशुद्ध मन वाले नहीं।