श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 12

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 45 मिनट का पठन 136 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
यत्
जो
आदित्यगतम्
सूर्य में स्थित
तेजः
तेज
जगत्
संसार को
भासयते
प्रकाशित करता है
अखिलम्
सम्पूर्ण
यत्
जो
चन्द्रमसि
चन्द्रमा में
यत्
जो
च
और
अग्नौ
अग्नि में
तत्
उस
तेजः
तेज को
विद्धि
जानो
मामकम्
मेरा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो तेज सूर्य में स्थित है और सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, जो चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है – उस तेज को मेरा ही जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति, श्रीमद्भगवद्गीता और वेदों के गूढ़ रहस्यों का प्रामाणिक एवं विस्तृत संकलन


ब्रह्मांडीय चेतना और परम प्रकाश का उद्गम: एक आध्यात्मिक प्रस्तावना

सनातन वैदिक धर्म में प्रकाश केवल भौतिक ऊर्जा या विज्ञान का विषय नहीं है, अपितु यह सीधे तौर पर पराब्रह्म परमात्मा की अहैतुकी कृपा, चेतना और साक्षात् विभूति का प्रतीक है। जब हम अपनी दृष्टि इस अनंत ब्रह्मांड पर डालते हैं, तो हमें आकाश में दमकता हुआ सूर्य, शीतलता प्रदान करने वाला चंद्रमा और यज्ञ की पावन वेदी पर प्रज्ज्वलित अग्निदेव दिखाई देते हैं। साधारण मानव इन तीनों को प्रकृति की स्वतंत्र भौतिक शक्तियां मान बैठता है, परंतु श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय 'विभूतियोग' में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो दिव्य उपदेश दिए हैं, वे इन समस्त भ्रांतियों को आश्वस्त करते हुए समूल नष्ट कर देते हैं। भगवान स्पष्ट रूप से उद्घोषित करते हैं कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी तेज, ओज, कांति, प्रकाश और ऊर्जा के रूप में दृष्टिगोचर होता है, वह अन्य किसी का नहीं, अपितु स्वयं परमेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण का ही महातेज है।

यह श्लोक (यदादित्यगतं तेजो...) केवल वेदों या पुराणों का एक साधारण श्लोक मात्र नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म जगत का एक ऐसा महान सूत्र है जो साधक को दृश्य जगत से अदृश्य निराकार और साकार परम ब्रह्म की यात्रा कराता है। वैदिक संस्कृति में सूर्य को जगत की आत्मा ("आत्मा जगतस्तस्थुषश्च"), चंद्रमा को मन का अधिष्ठाता देवता और अग्नि को मुख तथा देवताओं का दूत माना गया है। जब भगवान श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि इन तीनों का तेज उन्हीं का है, तो इसका तात्पर्य यह है कि संपूर्ण सृष्टि का जीवन-चक्र, ऊर्जा का प्रवाह और प्रकाश की हर एक किरण उसी एक अद्वितीय परम सत्ता से संचालित हो रही है। इस प्रकार, यह श्लोक आधुनिक भौतिक विज्ञान के उस सिद्धांत के भी बहुत निकट है जो ऊर्जा के संरक्षण और उसके एक मूल स्रोत की बात करता है, अंतर केवल इतना है कि विज्ञान इसे 'ऊर्जा' कहता है और हमारे ऋषि-मुनि इसे 'भगवान श्रीकृष्ण की चित्-शक्ति' या 'तेज' के रूप में अनुभव करते हैं।

साधना के मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक जिज्ञासु के लिए यह श्लोक एक महान संबल प्रदान करता है। जब साधक प्रातःकाल सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देता है, रात्रि में चंद्रमा की शीतल चाँदनी का आनंद लेता है, अथवा अपने घर के पूजागृह में संध्यावचन के समय दीपक प्रज्ज्वलित करता है, तब उसका मन केवल भौतिक पदार्थों में उलझ कर नहीं रहता, बल्कि उसकी चेतना उस परम दिव्य स्रोत से जुड़ जाती है जहाँ से इन समस्त प्रकाशों की उत्पत्ति हुई है। यही कारण है कि Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम इस महान श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक प्रसंग और जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग का अत्यंत सूक्ष्मता के साथ विश्लेषण करने जा रहे हैं, ताकि पाठकों का जीवन प्रकाशमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) का यह अत्यंत पावन और दिव्य श्लोक है, जिसे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ प्रतिदिन पढ़ा जाना चाहिए:

अथ श्रीमद्भगवद्गीता दशमोऽध्यायः (विभूतियोगः)

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।

यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२॥

श्लोक पाठ की विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:

  • शुद्धता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने आसन को पवित्र करें।
  • दीपक प्रज्वलन: भगवान श्रीकृष्ण के चित्र या विग्रह के समक्ष शुद्ध गाय के घी का दीपक और धूप प्रज्ज्वलित करें।
  • मानसिक एकाग्रता: आँखें बंद करके सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के स्वरूप में भगवान के इस महातेज का मानसिक ध्यान करें।
  • जप संख्या: इस श्लोक का कम से कम 108 बार (एक माला) या अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रतिदिन निरंतर जप करें।
  • भाव: जप के अंत में यह समर्पण भाव रखें कि जगत का सारा प्रकाश और ऊर्जा केवल परमात्मा की ही देन है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्लोक के प्रत्येक शब्द की तह तक जाकर उसके आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ को समझना ही सच्ची वेदांत साधना है। नीचे दी गई सारणी में श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यत् जो (तेज या प्रकाश) यह शब्द संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त उस चेतना की ओर संकेत करता है जो हर कण में स्वतंत्र रूप से विद्यमान है।
आदित्यगतम् सूर्य में स्थित आदित्य (सूर्य) इस सौरमंडल का प्राण है। उसमें स्थित उष्णता और प्रकाश भगवान की प्रत्यक्ष ऊर्जा का मूर्त रूप है।
तेजः तेज, प्रकाश, कांति या ऊर्जा यहाँ तेज का अर्थ केवल भौतिक रोशनी नहीं, बल्कि बुद्धि, ज्ञान और पराशक्ति का वह पुंज है जो अज्ञान के अंधकार को चीरता है।
जगत् सम्पूर्ण संसार, ब्रह्मांड चराचर जगत, जिसमें समस्त जीव, ग्रह, नक्षत्र और भौतिक वस्तुएं सम्मिलित हैं, इस प्रकाश से पोषित होते हैं।
भासयते प्रकाशित करता है, प्रकाशित होता है यह क्रिया दर्शाती है कि परमात्मा का तेज केवल एक जगह स्थिर नहीं है, बल्कि वह पूरे ब्रह्मांड को अपनी चेतना से रोशन कर रहा है।
अखिलम् संपूर्ण, समस्त, बिना किसी शेष के अखिल का अर्थ है कि ब्रह्मांड का एक भी कोना ऐसा नहीं है जहाँ परमात्मा के इस तेज की पहुँच न हो।
च और यह समुच्चय बोधक शब्द सूर्य के साथ-साथ अन्य प्रकाश के स्रोतों (चंद्रमा और अग्नि) को एक ही सूत्र में पिरोता है।
चन्द्रमसि चंद्रमा में (जो शीतलता का प्रतीक है) चंद्रमा की सोमी (शीतल) और मन को शांति देने वाली चांदनी भी भगवान के ही शांत और आह्लादक स्वरूप की विभूति है।
च + अग्नौ तथा अग्नि में (जो उष्णता और यज्ञ का आधार है) अग्नि देव जो हवनीय पदार्थों को देवताओं तक पहुँचाती है और जीवन को ऊर्जा देती है, वह भी भगवान का ही ज्वलंत स्वरूप है।
तत् तेजः उस तेज को वह महान ऊर्जा जो इन तीनों प्राकृतिक स्तंभों (सूर्य, चंद्र, अग्नि) के माध्यम से संपूर्ण जगत को जीवंत रखती है।
विद्धि जानो, पहचानो, निश्चय करो भगवान अर्जुन (और समस्त मानव जाति) को यह आदेश देते हैं कि वे इस सत्य को भ्रमरहित होकर पूरी तरह से स्वीकार करें।
मामकम् मेरा ही (मेरे द्वारा उत्पन्न या मेरा स्वरूप) यहाँ 'मामकम्' शब्द भगवान श्रीकृष्ण के परमेश्वर रूप की पराकाष्ठा को सिद्ध करता है—"सब कुछ मेरा ही विस्तार है।"

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

विभूतियोग और कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र की पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय की यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जहाँ कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। महाभारत के महान युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब पांडव श्रेष्ठ अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए और उनका गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके सारथी की भूमिका निभाते हुए उन्हें जो ज्ञान दिया, वही गीता है। अर्जुन के मन में बार-बार यह संशय उत्पन्न हो रहा था कि इस विराट और रहस्यमयी संसार में भगवान को कहाँ-कहाँ और किस रूप में खोजा जाए? उनकी इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने दशम अध्याय में अपनी 'विभूतियों' का वर्णन करना आरंभ किया।

वैदिक पुराणों और उपनिषदों में भी प्रकाश के इन तीनों देवताओं—सूर्य, चंद्रमा और अग्नि—की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। मुण्डकोपनिषद और कठोपनिषद में एक प्रसिद्ध मंत्र आता है—"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥" इसका अर्थ यह है कि उस परम ब्रह्म परमात्मा के प्रकाश के आगे न तो सूर्य चमक सकता है, न चंद्रमा और तारे, न ही बिजली और अग्नि; बल्कि उन सभी का प्रकाश उसी परमेश्वर के स्वयंप्रकाशित होने से ही संभव होता है। भगवान श्रीकृष्ण इसी वैदिक और उपनिषद् कालीन सनातन सत्य को गीता के इस श्लोक में अत्यंत सरल और सुबोध शब्दों में अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यदेव भगवान श्रीकृष्ण के ही अंश रूप और उनके परम भक्त माने जाते हैं। मार्कण्डेय पुराण और भविष्य पुराण में सूर्य उपासना के अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ यह बताया गया है कि सूर्य मंडल के अंतःकरण में स्वयं नारायण ही 'हिरण्मय पुरुष' के रूप में विराजमान हैं। इसी प्रकार, चंद्रमा को समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हुए रत्नों में गिना गया है और शास्त्रों में चंद्रमा को भगवान विष्णु के नेत्रों से उत्पन्न या उनके मन का प्रतीक कहा गया है। अग्निदेव को वेदों में 'वैश्वानर' और 'जातवेदा' कहा गया है, जो समस्त प्राणियों के भीतर पाचक रस (जठराग्नि) के रूप में कार्य करते हैं। जब हम महाभारत के पात्रों और वेदों के ऋषियों की इस परंपरा को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह श्लोक सनातन धर्म के संपूर्ण कॉस्मोलॉजी (ब्रह्मांड विज्ञान) और थियोलॉजी (ईश्वर विज्ञान) का सार है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में इस प्रसंग के माध्यम से मानवता को यह सिखाया है कि भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान में कोई विरोध नहीं है, बल्कि दोनों उसी एक परम सत्य की दो अलग-अलग भाषाएं हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दिव्य श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेक प्रकार के अलौकिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। इस श्लोक के जप से मन की चंचलता समाप्त होती है और गहन आंतरिक शांति एवं मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

सूर्य और अग्नि के तेज को भगवान का स्वरूप मानने से साधक के चारों ओर एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा का कवच बन जाता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है.

3. आत्मबल और पराक्रम में वृद्धि

सूर्य और अग्नि के ओज से जुड़ने के कारण व्यक्ति के भीतर साहस, दृढ़ संकल्प, नेतृत्व क्षमता और जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का अद्भुत आत्मबल जागृत होता है.

4. कार्मिक शुद्धि और पापों का नाश

अग्नि को सभी प्रकार के पापों और विसंगतियों को भस्म करने वाला पवित्र माध्यम माना गया है। इस श्लोक का प्रतिदिन स्मरण संचित कर्मों की शुद्धि में सहायक होता है.

5. दिव्य दृष्टि और ज्ञान चक्षु का उन्मीलन

भौतिक नेत्रों से आगे बढ़कर संसार को दिव्य दृष्टि से देखने की क्षमता विकसित होती है, जिससे हर वस्तु में ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं.

6. शारीरिक स्वास्थ्य और आरोग्यता

सूर्य की धूप और जठराग्नि के संतुलन को परमात्मा का रूप मानने से शरीर की जैव-घड़ी (Biological Clock) और पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है.

7. समाज में मान-सम्मान एवं प्रभावलय

सूर्य के तेज का प्रभाव साधक के व्यक्तित्व पर भी पड़ता है, जिससे उसके चेहरे पर एक अलग ही ओज और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.

8. भगवत्कृपा और मोक्ष का मार्ग

भगवान श्रीकृष्ण के इस विभूति दर्शन से साधक की भक्ति अनन्य हो जाती है, जो अंततः उसे भवसागर से पार लगाकर भगवद्धाम की प्राप्ति कराती है.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण), मुण्डकोपनिषद तथा विभिन्न पुराणों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारी संपादकीय टीम और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण और उसका दार्शनिक मर्म पूरी प्रमाणिकता के साथ हमारे पाठकों तक पहुँचे। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि वेदों और गीता के वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक सत्यों को आधुनिक संदर्भ में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करना है। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न या सुझाव है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) का 12वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के आग्रह पर अपनी अनंत विभूतियों (ऐश्वर्य, प्रकाश और ऊर्जा के रूपों) का वर्णन कर रहे हैं, ताकि अर्जुन संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी उपस्थिति का अनुभव कर सकें।

वैदिक संस्कृति में सूर्य, चंद्रमा और अग्नि को त्रैलोक्य (पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग) के मुख्य प्रकाश और ऊर्जा स्तंभ माना गया है। सूर्य दिन का प्रकाश और ऊष्मा देता है, चंद्रमा रात्रि की शीतलता और शांति प्रदान करता है, तथा अग्नि यज्ञ और जीवन की आंतरिक ऊर्जा (पाचन व उष्णता) का आधार है। इन तीनों के माध्यम से भगवान यह समझाते हैं कि जगत का संपूर्ण प्रकाश उन्हीं का है।

हाँ, बिल्कुल। चूंकि चंद्रमा मन का कारक है और इस श्लोक में चंद्रमा की शीतलता को भगवान का स्वरूप बताया गया है, इसके नियमित जप और इसके दार्शनिक अर्थ पर ध्यान लगाने से मन शांत होता है, अवसाद और तनाव कम होता है तथा एक गहरी मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

इस श्लोक के पाठ के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय का समय (जब सूर्य को अर्घ्य देते हैं) तथा संध्याकाल (जब दीपक प्रज्ज्वलित किया जाता है) सबसे उत्तम माना गया है। स्नान करके शुद्ध होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके इसका 108 बार जप करना अत्यधिक फलदायी होता है।

हाँ, आधुनिक भौतिक विज्ञान ऊर्जा के संरक्षण (Conservation of Energy) के सिद्धांत की बात करता है और मानता है कि ब्रह्मांड में ऊर्जा का मूल स्रोत एक ही है। अध्यात्म जगत में उसी मूल स्रोत को भगवान श्रीकृष्ण की 'चित्-शक्ति' या 'तेज' कहा गया है। इस प्रकार विज्ञान और वेदांत दोनों ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा के एकीकरण के सिद्धांत पर सहमति रखते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं कि सूर्य में स्थित जो तेज है, जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है – उस सब तेज को तुम मेरा ही समझो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जगत में जितने भी प्रकाश के स्रोत हैं, वे सब परमात्मा की ही विभूतियाँ हैं। वही सबका मूल स्रोत है। इस प्रकार सृष्टि के सभी तेजस्वी पदार्थों में उसी का अंश देखना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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श्लोक 12/20 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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