पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करता हूँ, तथा रसस्वरूप सोम (चन्द्रमा) बनकर सब औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अध्याय एवं ब्रह्मांडीय चेतना का परिचय
भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्रीकृष्णामृत माना गया है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड, जीव, प्रकृति और परमात्मा के बीच के गूढ़ संबंधों का सबसे बड़ा दस्तावेज है। पंद्रहवां अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है, वेदों के सार और उपनिषदों के निष्कर्ष को प्रकट करता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को एक उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में चित्रित किया है, जिसकी जड़ें ऊपर ब्रह्मलोक में हैं और शाखाएं नीचे संसार में फैली हैं। इसी श्रृंखला में भगवान अपने सर्वव्यापिस्वरूप, अपनी असीम विभूतियों और प्रकृति के कण-कण में अपनी उपस्थिति का अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक उद्घोष करते हैं।
प्रस्तुत श्लोक "गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥" यह स्पष्ट करता है कि संपूर्ण भौतिक जगत में जो स्थिरता, पोषण, रस और जीवन का संचार दिखाई देता है, वह किसी प्राकृतिक या यांत्रिक संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे साक्षात परमेश्वर की प्राण-ऊर्जा (ओज) कार्य कर रही है। पृथ्वी जैसी विशाल ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति, उसमें निहित सहनशीलता, और चंद्रमा के माध्यम से औषधियों तथा वनस्पतियों में रस का संचरण—यह सब उस परम चेतना के प्रत्यक्ष रूप हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जिस भी अन्न, जल और वायु का उपभोग करते हैं, वह सब ईश्वर का ही प्रसाद है, जो विभिन्न प्राकृतिक माध्यमों से हमारे तक पहुंचता है। आधुनिक युग में जहां मनुष्य प्रकृति को केवल एक भोग्य वस्तु समझ बैठा है, यह श्लोक हमें प्रकृति और ईश्वर के अद्वैत संबंध का बोध कराता है, जिससे जीवन के प्रति कृतज्ञता और भक्ति भाव जागृत होता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
सस्वर पाठ एवं उच्चारण के लिए प्रामाणिक संस्कृत श्लोक (देवनागरी लिपि में)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥
श्लोकोच्चारण एवं पाठ विधि (Anusthan & Path Vidhi)
इस श्लोक का दैनिक जीवन में पाठ करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि अन्न और जल के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न होता है। पाठ करने की सरल विधि निम्नलिखित है:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
श्लोक के प्रत्येक शब्द की व्याकरणिक और दार्शनिक व्याख्या नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुए संवाद पर आधारित है। जब अर्जुन ने भगवान से उनकी संपूर्ण विभूतियों और उनके द्वारा इस जगत के संचालन के बारे में विस्तार से पूछा, तब भगवान ने अपनी योगमाया का वर्णन किया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों—विशेषकर वेदों, उपनिषदों और पुराणों—में सूर्य और चंद्रमा को ब्रह्मांड के दो मुख्य नेत्र माना गया है। जहां सूर्य तेज, अग्नि और ऊर्जा का प्रतीक है, वहीं चंद्रमा (सोम) शीतलता, मन, औषधि और रस का प्रतीक है।
वैदिक परंपरा में 'सोम' को अमृत का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद में सोम देवता की स्तुति करते हुए उन्हें औषधियों का राजा और वनस्पतियों का पोषण करने वाला बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उसी वैदिक ऋचा के दार्शनिक सिद्धांत को अद्यतन करते हैं और घोषणा करते हैं कि प्रकृति में जो 'सोमत्व' या रस है, वह कोई स्वतंत्र भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि स्वयं उनका ही स्वरूप है। जब चंद्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से औषधियों और पृथ्वी के धान्य को सींचता है, तो वस्तुतः वह भगवान की ही कृपा होती है जो प्राणियों के पोषण का माध्यम बनती है।
महाभारत और विभिन्न पुराणों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण ही इस सृष्टि के पालनकर्ता (विष्णु रूप में) हैं। पृथ्वी देवी (भूमि) को भगवान की पत्नी या उनके द्वारा धारण की जाने वाली शक्ति (वराह अवतार के प्रसंग में) के रूप में देखा जाता है। जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में पहुँचा दिया था, तब भगवान वराह ने अपने विशाल दाँतों पर पृथ्वी को धारण किया था। उसी शाश्वत सत्य का आध्यात्मिक रूप इस श्लोक में प्रकट होता है, जहां भगवान केवल वराह अवतार में ही नहीं, बल्कि हर पल अपनी ऊर्जा (ओज) से इस पृथ्वी और इसमें बसने वाले समस्त जीवों को थामे हुए हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि यह पूरी सृष्टि एक दिव्य यज्ञशाला है, जहां हर एक जीव भगवान की ऊर्जा से पोषित हो रहा है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
इस पावन श्लोक के नियमित स्मरण और मनन से साधक के जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक परिवर्तन आते हैं:
1. मानसिक शांति एवं स्थिरता
श्लोक का स्मरण करने से यह विश्वास दृढ़ होता है कि हम एक सुरक्षित और सर्वोच्च शक्ति के संरक्षण में हैं, जिससे मन का अज्ञात भय और चिंताएं समाप्त होती हैं।
2. सकारात्मक ऊर्जा (ओज) का विकास
भगवान की ऊर्जा (ओज) के साथ तन्मयता स्थापित होने से साधक के शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है, जिससे सुस्ती और नकारात्मकता दूर होती है।
3. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान
यह बोध होता है कि अन्न, जल और औषधियाँ ईश्वरीय प्रसाद हैं, जिससे व्यक्ति का भोजन और जीवनशैली अधिक सात्विक और पर्यावरण-अनुकूल बनती है।
4. कर्म शुद्धि एवं पापकर्मों से मुक्ति
प्रत्येक वस्तु को ईश्वर का रूप मानकर उपभोग करने से भोग-वृत्ति समाप्त होती है और कर्म योग की भावना विकसित होती है, जिससे कर्मों के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
5. अद्वैत दर्शन की अनुभूति
साधक को यह अनुभव होने लगता है कि चंद्रप्रकाश, वनस्पति और पृथ्वी का हर कण एक ही परमात्मा की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं, जिससे भेद-भाव मिटता है।
6. शारीरिक स्वास्थ्य एवं आरोग्य लाभ
औषधियों और सोम (चंद्रमा) के पोषण को ईश्वरीय आशीर्वाद मानकर ग्रहण करने से पाचन तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य पर अनुकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है।
7. ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति (भक्ति योग)
भगवान के सर्वव्यापिस्वरूप का प्रत्यक्ष अहसास होने से साधक के हृदय में उनके प्रति गाढ़ा प्रेम और अनन्य समर्पण भाव उत्पन्न होता है।
8. जीवन की कठिनाइयों में धैर्य
जिस प्रकार पृथ्वी समस्त भार को सहन करती है और भगवान उसे ओज से धारण करते हैं, उसी प्रकार साधक को जीवन के संकटों में धैर्य धारण करने की शक्ति मिलती है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' (अध्याय 15, श्लोक 13), उपनिषदों और वैदिक साहित्य के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्री पहुंचे, वह पूरी तरह से प्रामाणिक, शास्त्रीय मर्यादा के अनुकूल और सरस हिंदी में हो। इस आलेख का उद्देश्य पाठकों को आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच सनातन संस्कृति के शाश्वत सत्यों से जोड़ना और उनमें आध्यात्मिक चेतना जागृत करना है। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक टीकाओं जैसे शंकराचार्य भाष्य या गीता प्रेस गोरखपुर के संस्करणों का संदर्भ लेने की अनुशंसा की जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति (ओजसा) से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ। और रसात्मक सोम (चन्द्रमा) बनकर मैं सब वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
परमात्मा ही सबका पोषक और धारक है। वह सृष्टि के प्रत्येक कण में व्याप्त है और अपनी शक्ति से सबका पालन करता है। यह उसकी व्यापकता और करुणा का प्रतीक है।