श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 13

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 36 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
गाम्
पृथ्वी में
आविश्य
प्रवेश करके
च
और
भूतानि
सम्पूर्ण प्राणियों को
धारयामि
धारण करता हूँ
अहम्
मैं
ओजसा
अपनी शक्ति से
पुष्णामि
पोषण करता हूँ
च
और
औषधीः
औषधियों (वनस्पतियों) को
सर्वाः
सब
सोमः
सोम (चन्द्र या रस) रूप
भूत्वा
होकर
रसात्मकः
रस स्वरूप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करता हूँ, तथा रसस्वरूप सोम (चन्द्रमा) बनकर सब औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय एवं ब्रह्मांडीय चेतना का परिचय

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्रीकृष्णामृत माना गया है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड, जीव, प्रकृति और परमात्मा के बीच के गूढ़ संबंधों का सबसे बड़ा दस्तावेज है। पंद्रहवां अध्याय, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है, वेदों के सार और उपनिषदों के निष्कर्ष को प्रकट करता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को एक उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में चित्रित किया है, जिसकी जड़ें ऊपर ब्रह्मलोक में हैं और शाखाएं नीचे संसार में फैली हैं। इसी श्रृंखला में भगवान अपने सर्वव्यापिस्वरूप, अपनी असीम विभूतियों और प्रकृति के कण-कण में अपनी उपस्थिति का अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक उद्घोष करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक "गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥" यह स्पष्ट करता है कि संपूर्ण भौतिक जगत में जो स्थिरता, पोषण, रस और जीवन का संचार दिखाई देता है, वह किसी प्राकृतिक या यांत्रिक संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे साक्षात परमेश्वर की प्राण-ऊर्जा (ओज) कार्य कर रही है। पृथ्वी जैसी विशाल ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति, उसमें निहित सहनशीलता, और चंद्रमा के माध्यम से औषधियों तथा वनस्पतियों में रस का संचरण—यह सब उस परम चेतना के प्रत्यक्ष रूप हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जिस भी अन्न, जल और वायु का उपभोग करते हैं, वह सब ईश्वर का ही प्रसाद है, जो विभिन्न प्राकृतिक माध्यमों से हमारे तक पहुंचता है। आधुनिक युग में जहां मनुष्य प्रकृति को केवल एक भोग्य वस्तु समझ बैठा है, यह श्लोक हमें प्रकृति और ईश्वर के अद्वैत संबंध का बोध कराता है, जिससे जीवन के प्रति कृतज्ञता और भक्ति भाव जागृत होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सस्वर पाठ एवं उच्चारण के लिए प्रामाणिक संस्कृत श्लोक (देवनागरी लिपि में)

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥


श्लोकोच्चारण एवं पाठ विधि (Anusthan & Path Vidhi)

इस श्लोक का दैनिक जीवन में पाठ करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि अन्न और जल के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न होता है। पाठ करने की सरल विधि निम्नलिखित है:

  • प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण या अपने इष्टदेव के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को खोलकर या मन में स्मरण करते हुए इस श्लोक का कम से कम 11, 21 या 108 बार मानसिक अथवा उपांश जप करें।
  • जप के पश्चात भगवान को सात्विक फल या नैवेद्य अर्पित करें और समस्त चराचर जगत के कल्याण की प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्लोक के प्रत्येक शब्द की व्याकरणिक और दार्शनिक व्याख्या नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
गाम् (गाम् आविश्य) पृथ्वी में पृथ्वी नामक इस विशाल ग्रह में, जो समस्त जीवों का आधार है।
आविश्य प्रवेश करके अंतर्यामी रूप से भीतर समाहित होकर, अपनी सत्ता का संचार करके।
च और समुच्चय बोधक, जो पृथ्वी के साथ समस्त चराचर को जोड़ता है।
भूतानि समस्त भूतों (प्राणियों/तत्वों) को ब्रह्मांड के सभी स्थावर (पेड़-पौधे) और जंगम (चलने वाले जीव) प्राणी।
धारयामि धारण करता हूँ संभाले रखता हूँ, गुरुत्वाकर्षण और जीवन-शक्ति प्रदान करता हूँ।
अहम् मैं (भगवान श्रीकृष्ण) परब्रह्म पुरुषोत्तम, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के नियंत्रणकर्ता हैं।
ओजसा अपनी ऊर्जा (ओज) से दिव्य तेज, पराशक्ति और सामर्थ्य के बल पर।
पुष्णामि पुष्ट करता हूँ / पोषण करता हूँ बढ़ाता हूँ, परिपक्व करता हूँ, जीवन रस से सिंचित करता हूँ।
च औषधीः सर्वाः और संपूर्ण औषधियों को सभी प्रकार की वनस्पतियों, अन्न, धान और जड़ी-बूटियों को।
सोमः भूत्वा चंद्रमा बनकर (अमृतमय सोम बनकर) नक्षत्रराज चंद्रमा के रूप में शीतलता और रस प्रदान करने वाला बनकर।
रसात्मकः रस से युक्त / रस का आश्रय जो वनस्पतियों में प्राण-रस, माधुर्य और पोषण का स्रोत है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुए संवाद पर आधारित है। जब अर्जुन ने भगवान से उनकी संपूर्ण विभूतियों और उनके द्वारा इस जगत के संचालन के बारे में विस्तार से पूछा, तब भगवान ने अपनी योगमाया का वर्णन किया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों—विशेषकर वेदों, उपनिषदों और पुराणों—में सूर्य और चंद्रमा को ब्रह्मांड के दो मुख्य नेत्र माना गया है। जहां सूर्य तेज, अग्नि और ऊर्जा का प्रतीक है, वहीं चंद्रमा (सोम) शीतलता, मन, औषधि और रस का प्रतीक है।

वैदिक परंपरा में 'सोम' को अमृत का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद में सोम देवता की स्तुति करते हुए उन्हें औषधियों का राजा और वनस्पतियों का पोषण करने वाला बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उसी वैदिक ऋचा के दार्शनिक सिद्धांत को अद्यतन करते हैं और घोषणा करते हैं कि प्रकृति में जो 'सोमत्व' या रस है, वह कोई स्वतंत्र भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि स्वयं उनका ही स्वरूप है। जब चंद्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से औषधियों और पृथ्वी के धान्य को सींचता है, तो वस्तुतः वह भगवान की ही कृपा होती है जो प्राणियों के पोषण का माध्यम बनती है।

महाभारत और विभिन्न पुराणों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण ही इस सृष्टि के पालनकर्ता (विष्णु रूप में) हैं। पृथ्वी देवी (भूमि) को भगवान की पत्नी या उनके द्वारा धारण की जाने वाली शक्ति (वराह अवतार के प्रसंग में) के रूप में देखा जाता है। जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में पहुँचा दिया था, तब भगवान वराह ने अपने विशाल दाँतों पर पृथ्वी को धारण किया था। उसी शाश्वत सत्य का आध्यात्मिक रूप इस श्लोक में प्रकट होता है, जहां भगवान केवल वराह अवतार में ही नहीं, बल्कि हर पल अपनी ऊर्जा (ओज) से इस पृथ्वी और इसमें बसने वाले समस्त जीवों को थामे हुए हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि यह पूरी सृष्टि एक दिव्य यज्ञशाला है, जहां हर एक जीव भगवान की ऊर्जा से पोषित हो रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक के नियमित स्मरण और मनन से साधक के जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक परिवर्तन आते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

श्लोक का स्मरण करने से यह विश्वास दृढ़ होता है कि हम एक सुरक्षित और सर्वोच्च शक्ति के संरक्षण में हैं, जिससे मन का अज्ञात भय और चिंताएं समाप्त होती हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा (ओज) का विकास

भगवान की ऊर्जा (ओज) के साथ तन्मयता स्थापित होने से साधक के शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है, जिससे सुस्ती और नकारात्मकता दूर होती है।

3. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान

यह बोध होता है कि अन्न, जल और औषधियाँ ईश्वरीय प्रसाद हैं, जिससे व्यक्ति का भोजन और जीवनशैली अधिक सात्विक और पर्यावरण-अनुकूल बनती है।

4. कर्म शुद्धि एवं पापकर्मों से मुक्ति

प्रत्येक वस्तु को ईश्वर का रूप मानकर उपभोग करने से भोग-वृत्ति समाप्त होती है और कर्म योग की भावना विकसित होती है, जिससे कर्मों के बंधनों से मुक्ति मिलती है।

5. अद्वैत दर्शन की अनुभूति

साधक को यह अनुभव होने लगता है कि चंद्रप्रकाश, वनस्पति और पृथ्वी का हर कण एक ही परमात्मा की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं, जिससे भेद-भाव मिटता है।

6. शारीरिक स्वास्थ्य एवं आरोग्य लाभ

औषधियों और सोम (चंद्रमा) के पोषण को ईश्वरीय आशीर्वाद मानकर ग्रहण करने से पाचन तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य पर अनुकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है।

7. ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति (भक्ति योग)

भगवान के सर्वव्यापिस्वरूप का प्रत्यक्ष अहसास होने से साधक के हृदय में उनके प्रति गाढ़ा प्रेम और अनन्य समर्पण भाव उत्पन्न होता है।

8. जीवन की कठिनाइयों में धैर्य

जिस प्रकार पृथ्वी समस्त भार को सहन करती है और भगवान उसे ओज से धारण करते हैं, उसी प्रकार साधक को जीवन के संकटों में धैर्य धारण करने की शक्ति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' (अध्याय 15, श्लोक 13), उपनिषदों और वैदिक साहित्य के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्री पहुंचे, वह पूरी तरह से प्रामाणिक, शास्त्रीय मर्यादा के अनुकूल और सरस हिंदी में हो। इस आलेख का उद्देश्य पाठकों को आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच सनातन संस्कृति के शाश्वत सत्यों से जोड़ना और उनमें आध्यात्मिक चेतना जागृत करना है। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक टीकाओं जैसे शंकराचार्य भाष्य या गीता प्रेस गोरखपुर के संस्करणों का संदर्भ लेने की अनुशंसा की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) का 13वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी वृक्ष का वर्णन करते हुए अपनी सर्वव्यापकता और विभूतियों का सुंदर प्रकाश डाला है।

वैदिक दर्शन में चंद्रमा (सोम) को अमृत और रसों का स्वामी माना गया है। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि चंद्रमा अपनी शीतल किरणों से जो रस और पोषण पृथ्वी की औषधियों और वनस्पतियों को प्रदान करता है, वह कोई जड़ प्राकृतिक क्रिया नहीं है, बल्कि उसके पीछे स्वयं परमात्मा की ही रस-प्रद शक्ति कार्य कर रही है।

इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर अन्न, जल और प्रकृति के प्रति गहरी कृतज्ञता का भाव जागृत होता है। यह मन को शांत करता है, सकारात्मक ऊर्जा (ओज) को बढ़ाता है और जीवन में भोग-वृत्ति के स्थान पर सात्विक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करता है।

'ओजसा' शब्द 'ओजस्' से बना है जिसका अर्थ दिव्य तेज, प्राण-शक्ति, सामर्थ्य और पराशक्ति होता है। भगवान कहते हैं कि वे अपनी असीम ऊर्जा या ओज के बल पर ही इस विशाल पृथ्वी और उस पर रहने वाले समस्त जीवों को धारण किए हुए हैं।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के सभी श्लोक सार्वभौमिक हैं और मानवता के कल्याण के लिए हैं। कोई भी साधक, विद्यार्थी, गृहस्थ या वृद्ध व्यक्ति श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस श्लोक का पाठ, मनन और जप कर सकता है। इसके लिए किसी प्रकार के कठिन अनुष्ठान की अनिवार्यता नहीं है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति (ओजसा) से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ। और रसात्मक सोम (चन्द्रमा) बनकर मैं सब वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा ही सबका पोषक और धारक है। वह सृष्टि के प्रत्येक कण में व्याप्त है और अपनी शक्ति से सबका पालन करता है। यह उसकी व्यापकता और करुणा का प्रतीक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/20 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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