पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 13
श्लोक १३ में बताया गया है कि भगवान पृथ्वी में प्रवेश करके प्राणियों को धारण करते हैं और चन्द्रमा बनकर वनस्पतियों का पोषण करते हैं।
संस्कृत श्लोक
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥
gām āviśya ca bhūtāni dhārayāmy aham ojasā | puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ ||13||
पदच्छेद / शब्दार्थ
गाम्: पृथ्वी में; आविश्य: प्रवेश करके; च: और; भूतानि: सम्पूर्ण प्राणियों को; धारयामि: धारण करता हूँ; अहम्: मैं; ओजसा: अपनी शक्ति से; पुष्णामि: पोषण करता हूँ; च: और; औषधीः: औषधियों (वनस्पतियों) को; सर्वाः: सब; सोमः: सोम (चन्द्र या रस) रूप; भूत्वा: होकर; रसात्मकः: रस स्वरूप।
हिंदी अनुवाद
पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करता हूँ, तथा रसस्वरूप सोम (चन्द्रमा) बनकर सब औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।
English Translation
Entering the earth, I sustain all beings by My energy; and becoming the Soma (the moon) full of sap (nourishment), I nourish all plants.
टीका / Commentary
भगवान बताते हैं कि वे पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी ऊर्जा से सबको धारण करते हैं और चन्द्रमा के रूप में वनस्पतियों को रस प्रदान करते हैं।