पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में भगवान कहते हैं कि वे जठराग्नि के रूप में प्राणियों के शरीर में रहकर चार प्रकार के अन्न को पचाते हैं।

संस्कृत श्लोक

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४॥

ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ deham āśritaḥ | prāṇāpāna-samāyuktaḥ pacāmy annaṃ catur-vidham ||14||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अहम्: मैं; वैश्वानरः: वैश्वानर (जठराग्नि) रूप; भूत्वा: होकर; प्राणिनाम्: प्राणियों के; देहम्: शरीर में; आश्रितः: स्थित; प्राणापानसमायुक्तः: प्राण और अपान से युक्त; पचामि: पचाता हूँ; अन्नम्: अन्न; चतुर्विधम्: चार प्रकार का (चर्व्य, चूष्य, लेह्य, पेय)।

हिंदी अनुवाद

मैं प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर (जठराग्नि) रूप होकर, प्राण और अपान से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

English Translation

Becoming the Vaiśvānara fire and abiding in the bodies of living beings, united with the prāṇa and apāna, I digest the four kinds of food.

टीका / Commentary

भगवान बताते हैं कि वे ही जठराग्नि (वैश्वानर) के रूप में शरीर में रहते हैं और भोजन को पचाते हैं। यह उनकी सर्वव्यापकता का एक और उदाहरण है।