श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 15

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 57 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

21 पद
सर्वस्य
सबके
च
और
अहम्
मैं
हृदि
हृदय में
सन्निविष्टः
स्थित हूँ
मत्तः
मुझसे
स्मृतिः
स्मृति
ज्ञानम्
ज्ञान
अपोहनम्
विस्मरण (या तर्क-वितर्क)
च
और
वेदैः
वेदों द्वारा
च
और
सर्वैः
सब
अहम्
मैं
एव
ही
वेद्यः
जानने योग्य
वेदान्तकृत्
वेदान्त के कर्ता (वेदों का निर्माण करने वाला)
वेदवित्
वेदों को जानने वाला
एव
ही
च
और
अहम्
मैं हूँ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन (तर्क-वितर्क या विस्मरण) होता है। मैं ही सब वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, वेदान्त का कर्ता (वेदों का निर्माता) और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म और भारतीय दर्शन परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्री कृष्ण के मुखकमल से निःसृत वह अमृतधारा माना गया है जो भवसागर से तारने वाली है। गीता के पंद्रहवें अध्याय का यह पंद्रहवां श्लोक (सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः...) वेदांत दर्शन, उपनिषदों के सार और सांख्य योग का एक अद्भुत एवं जीवंत संगम है। यह श्लोक मनुष्य के अंतस की गहराइयों से लेकर इस संपूर्ण ब्रह्मांड की अनंत परिधि तक व्याप्त उस परम चेतना (परमात्मा) का उद्घोष करता है जो इस संसार का आधार भी है और उसका नियामक भी।

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से यदि विचार किया जाए, तो यह श्लोक मनुष्य की बौद्धिक क्षमता, उसकी स्मृतियों, उसके तर्कों और उसके जीवन के प्रत्येक अनुभव को एक उच्चतर दैवीय अनुशासन से जोड़ता है। आज के इस आधुनिक और यंत्रिक युग में, जहां मानसिक तनाव, अवसाद, असमंजस और वैचारिक भटकाव मनुष्य का सहज स्वभाव बनता जा रहा है, इस श्लोक का अध्ययन और इसके मर्म का चिंतन अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि मानव मन में उठने वाला हर एक विचार, संचित होने वाली हर स्मृति, और ज्ञान का आलोक—सब कुछ उसी परम पिता की कृपा का प्रतिफल है। जब साधक यह समझ लेता है कि उसका बुद्धिदाता और संचालक कोई बाहरी शक्ति नहीं, अपितु उसके ही हृदय के भीतर विराजमान अंतर्यामी परमात्मा है, तब उसके भीतर का अहंकार, भय और अज्ञान स्वतः तिरोहित होने लगते हैं।

वैदिक संस्कृति में 'हृदय' को केवल मांसपिंड मात्र नहीं माना गया है, अपितु यह वह दिव्य गुहा है जहां जीवात्मा और परमात्मा दोनों एक साथ निवास करते हैं। इस श्लोक के माध्यम से भगवान ने यह सिद्ध कर दिया है कि धर्म, ज्ञान, वेद, वेदांत और मोक्ष प्राप्ति की समस्त यात्राएं अंततः उसी एक अद्वैत तत्व की ओर संकेत करती हैं। भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस शोधपरक आलेख में हम इसी महामंत्र के एक-एक शब्द की व्याख्या, उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, उसके व्यावहारिक लाभ और शास्त्रीय संदर्भों का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे ताकि साधक न केवल बौद्धिक स्तर पर अपितु आनुभविक स्तर पर भी इस श्लोक के मर्म को आत्मसात कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं पाठ विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग नामक पंद्रहवें अध्याय का यह पंद्रहवां श्लोक संस्कृत व्याकरण और छंद शास्त्र के नियमों के अनुसार अत्यंत संतुलित और सुंदर रचना है। इसका उच्चारण करने मात्र से मन में एक अद्भुत शांति और पवित्रता का संचार होता है।

श्लोक उच्चारण

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥

श्लोक का पदावली उच्चारण एवं पठन विधि:

  • समय: इस श्लोक का पाठ प्रातः काल ब्रह्म बेला में अथवा संध्या वंदन के समय करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
  • आसन: कुश या ऊन के पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके सुखासन में बैठें।
  • शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मानसिक रूप से भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करें।
  • आवृत्ति: इस श्लोक का कम से कम 108 बार (एक माला) जप करने से बुद्धि तीव्र होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का अपना एक स्वतंत्र और विराट दार्शनिक अर्थ है। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से शब्दों का विग्रह करके उनके आंतरिक अर्थ को समझना ही सच्ची शास्त्र साधना है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के मुख्य पदों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual & Philosophical Meaning)
सर्वस्य (Sarvasya) सबके (प्राणियों के) यह इंगित करता है कि परमात्मा का अस्तित्व किसी एक संप्रदाय, जाति या जीव तक सीमित नहीं है, अपितु चर-अचर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए वह समान रूप से उपलब्ध है।
च + अहम् (Cha + Aham) और मैं (ही) यहाँ 'च' समुच्चयबोधक है जो यह जोड़ता है कि संपूर्ण सृष्टिकर्ता वही परम चेतना है, और 'अहम' उसके अद्वैत स्वरूप का घोषणा पत्र है।
हृदि सन्निविष्टः (Hridayi Sannivishtah) हृदय में अच्छी प्रकार से स्थित हूँ भगवान केवल आकाश में या दूर किसी वैकुंठ लोक में नहीं रहते, बल्कि प्रत्येक जीव के हृदय रूपी गुफा में अंतर्यामी साक्षी रूप में सदा विद्यमान रहते हैं।
मत्तः (Mattah) मुझसे ही संसार की किसी भी भौतिक या मानसिक शक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है; चेतना का हर एक स्पंदन मूल रूप से परमात्मा से ही उद्भूत होता है।
स्मृतिः (Smritih) स्मृति / याददाश्त पूर्व अनुभवों का संचय, संस्कारों की याद और अपने मूल स्वरूप (अहं ब्रह्मास्मि) की सुधि—यह सब उसी परमात्मा की शक्ति से जीवित रहता है।
ज्ञानम् (Jnanam) यथार्थ ज्ञान / विवेक सत्य और असत्य का भेद करने की आंतरिक बुद्धि, शास्त्र ज्ञान और विज्ञान का प्रकाश भगवान की ही दी हुई अद्वितीय भेंट है।
अपोहनम् च (Apohanam Cha) और विस्मरण / तर्क / अपोहन भूल जाना, मोह का नाश होना, या तार्किक रूप से किसी वस्तु का खंडन-मंडन करना—यह भी ईश्वर की ही नियम-व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है।
वेदैः च सर्वैः (Vedaih Cha Sarvaih) और समस्त वेदों द्वारा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—इन चारों वेदों का मूल उद्गम और उनकी संपूर्ण ऋचाएं उसी एक महाचेतना का गुणगान करती हैं।
अहम् एव वेद्यः (Aham Eva Vedyah) मैं ही जानने योग्य हूँ वेदों को पढ़ने का अंतिम लक्ष्य कोई कर्मकांड मात्र नहीं, अपितु उन वेदों के माध्यम से केवल और केवल परमात्मा को ही जानना है।
वेदान्तकृत् (Vedantakrit) वेदांत (उपनिषदों) के रचयिता उपनिषदों के संकलनकर्ता, वेदों के निष्कर्ष को प्रकट करने वाले और ब्रह्मसूत्र के प्रणेता (व्यास रूपी भगवान) स्वयं वही हैं।
वेदवित् एव च अहम् (Vedavit Eva Cha Aham) और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ भगवान केवल वेदों के रचयिता ही नहीं हैं, बल्कि वेदों के आन्तरिक रहस्यों और उनके गूढ़तम अर्थ को जानने वाले एकमात्र सर्वज्ञ भी वही हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के उस अत्यंत तनावपूर्ण और निर्णायक क्षण से जुड़ी है जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। संपूर्ण गीता का यह पंद्रहवां अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से विख्यात है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वर्णन करते हैं जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म लोक में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं।

इस वृक्ष के प्रसंग को समझाने के उपरांत, भगवान अर्जुन को यह समझाते हैं कि इस संसार रूपी असत्य वृक्ष का छेदन कैसे किया जाए। जब अर्जुन के मन में यह प्रश्न उठता है कि इस अगाध और जटिल सृष्टि को संचालित करने वाली सर्वोच्च शक्ति कौन है और वेदों का वास्तविक तात्पर्य क्या है, तब भगवान अत्यंत प्रेम और अधिकार के साथ अपने विराट स्वरूप का उद्घाटन करते हुए इस श्लोक (सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो...) का उच्चारण करते हैं।

पौराणिक कथाओं और उपनिषदों (विशेषकर कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद) में भी इस बात का प्रबल समर्थन मिलता है कि 'अंगुष्ठ मात्र पुरुष' परमात्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और ब्रह्मसूत्रों की रचना करते समय इसी तथ्य को केंद्र में रखा है। वेदों के प्रकट होने की कथा भी अत्यंत रोचक है; सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी को वेदों का जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह भगवान नारायण की श्वास-प्रश्वास से ही निःसृत हुआ था। इसलिए भगवान स्वयं कहते हैं कि "वेदों का रचयिता (वेदान्तकृत्) और वेदों का मर्म जानने वाला (वेदवित्) दोनों ही रूपों में केवल मैं ही विद्यमान हूँ।"

यह श्लोक वैदिक परंपरा के उस सनातन सत्य को स्थापित करता है जहां ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं है। ज्ञानयोगी जिस ब्रह्म को 'नेति नेति' कहकर खोजता है, और भक्तियोगी जिस भगवान को अपने हृदय में प्रेम से स्थापित करता है—वे दोनों कोई और नहीं, बल्कि यही पुरुषोत्तम श्री कृष्ण हैं। इस प्रकार, यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि धर्म का मार्ग कोई शुष्क बौद्धिक व्यायाम नहीं है, अपितु अपने ही भीतर बैठे अंतर्यामी से जुड़ने की एक जीवंत यात्रा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस महाश्लोक का नियमित रूप से स्मरण, स्वाध्याय और ध्यान करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। शास्त्रीय मान्यताओं और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके निम्नलिखित प्रमुख लाभ सिद्ध माने गए हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

जब यह बोध होता है कि भगवान हमारे हृदय के भीतर ही बैठे हैं, तो अकेलापन और असुरक्षा की भावना समाप्त हो जाती है। मन में अगाध शांति और स्थिरता का अनुभव होने लगता है।

2. स्मरण शक्ति और बुद्धि का विकास

चूंकि भगवान स्वयं कहते हैं कि "मत्तः स्मृतिर्ज्ञानम्" (स्मृति और ज्ञान मुझसे ही आते हैं), अतः इस श्लोक के नियमित जप से विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं की बुद्धि तीव्र होती है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विस्तार

वेदों और गीता के इन पावन मंत्रों के उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपकंपी वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण (औरा) बनता है जो नकारात्मक दृष्टियों और शक्तियों से रक्षा करता है।

4. अहंकार और भ्रम का शमन

"यह ज्ञान मैंने प्राप्त किया है या मेरी बुद्धि बहुत श्रेष्ठ है"—इस प्रकार के मिथ्या अहंकार का नाश होता है। साधक विनम्र और कृतज्ञ स्वभाव का बनता है।

5. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

हृदयस्थ परमात्मा को साक्षी मानकर कर्म करने से मनुष्य पाप और अधर्म से दूर रहता है, जिससे उसके संचित कर्मों की शुद्धि होती है और जीवन में सुकर्मों की प्रवृत्ति बढ़ती है।

6. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता

जीवन के जटिल मोड़ों पर जब व्यक्ति असमंजस में होता है ('अपोहनं च' - तार्किक निर्णय), तब आंतरिक विवेक जागृत होता है और सही निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है।

7. वेदों और शास्त्रों के प्रति सहज आकर्षण

इस श्लोक के माध्यम से सनातन ग्रंथों के प्रति आदर भाव बढ़ता है। मनुष्य को वेदों और उपनिषदों के अध्ययन की प्रेरणा मिलती है, जिससे उसका आध्यात्मिक विकास तेजी से होता है।

8. भगवत्कृपा और मोक्ष का मार्ग

समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य उस परम पुरुष की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है, जिससे भवसागर के बंधनों से मुक्ति और भगवद्धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामानुजचार्य और श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखे गए प्रामाणिक भाष्यों के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा यह निरंतर प्रयास रहता है कि आधुनिक पाठकों और साधकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों का शुद्धतम ज्ञान बिना किसी मिलावट या भ्रम के पहुंचे। इस लेख में उपयोग किए गए सभी श्लोक और उनके अर्थ पारंपरिक शास्त्रीय व्याकरण और प्रामाणिक टीकाओं (जैसे गीता प्रेस गोरखपुर और अन्य आर्ष ग्रंथों) के अनुरूप सत्यापित हैं। यदि किसी पाठक के पास इस विषय में कोई अतिरिक्त जिज्ञासा या सुझाव है, तो वे हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय जिसका नाम 'पुरुषोत्तम योग' है, उसका 15वां श्लोक है। इस प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण संसार रूपी पीपल के वृक्ष का वर्णन करने के बाद अपने अंतर्यामी, सर्वज्ञ और सृष्टि के मूल कारण रूपी दिव्य स्वरूप को अर्जुन के सामने प्रकट करते हैं।

उत्तर: 'अपोहन' शब्द का अर्थ विस्मरण, भूल जाना या तार्किक रूप से किसी बात का खंडन करके सही निष्कर्ष पर पहुंचना है। भगवान कहते हैं कि न केवल याद रखना (स्मृति) बल्कि समय पर भ्रम या गलत चीजों का भूल जाना और तार्किक बुद्धि का संचालन भी ईश्वर की ही शक्ति से होता है। यह मनुष्य की मानसिक प्रणालियों को नियंत्रित करने की दैवीय शक्ति को दर्शाता है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। चूंकि श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च" (स्मृति और ज्ञान मुझसे ही उत्पन्न होते हैं), इसलिए जो विद्यार्थी एकाग्रचित्त होकर इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करते हैं, उन्हें अपनी पढ़ाई में स्मरण शक्ति, एकाग्रता और बौद्धिक तीक्ष्णता में显著 रूप से लाभ प्राप्त होता है।

उत्तर: वेद भारतीय सनातन ज्ञान के मूल स्रोत (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) हैं, और वेदांत (उपनिषद) उनका अंतिम निष्कर्ष या सार हैं। भगवान कहते हैं कि वेदों के रचयिता (वेदान्तकृत्) और वेदों के आन्तरिक मर्म को जानने वाले (वेदवित्) दोनों ही रूपों में साक्षात मैं ही विद्यमान हूँ। इसका अर्थ है कि समस्त ज्ञान का स्रोत भगवान स्वयं हैं।

उत्तर: गृहस्थ साधक इस श्लोक को अपने जीवन में इस प्रकार उतार सकता है कि वह हर कार्य को करते समय यह स्मरण रखे कि उसका अंतर्यामी परमात्मा उसके हृदय में ही बैठा है। अतः कोई भी अनैतिक या पापकर्म करने से बचे। इसके साथ ही, अपने पास मौजूद ज्ञान, बुद्धि और स्मरण शक्ति के लिए अहंकार करने के बजाय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे।

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"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन (विस्मरण या तर्क) होता है। मैं ही सभी वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ; मैं ही वेदान्त का कर्ता (वेदों का रचयिता) हूँ और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा ही सबके हृदय में अन्तर्यामी के रूप में विद्यमान है। वही हमारे स्मरण, ज्ञान और विचारों का स्रोत है। सभी वेद उसी का गान करते हैं। अतः उसकी शरण में जाकर ही सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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श्लोक 15/20 75% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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