पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 16

श्लोक १६ में दो प्रकार के पुरुषों का वर्णन है – क्षर (सभी प्राणी) और अक्षर (कूटस्थ अविनाशी तत्त्व)।

संस्कृत श्लोक

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६॥

dvāv imau puruṣau loke kṣaraś cākṣara eva ca | kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho 'kṣara ucyate ||16||

पदच्छेद / शब्दार्थ

द्वौ: दो; इमौ: ये; पुरुषौ: पुरुष; लोके: संसार में; क्षरः: क्षर (विनाशी); च: और; अक्षरः: अक्षर (अविनाशी); एव: ही; च: भी; क्षरः: क्षर; सर्वाणि: सब; भूतानि: प्राणी (भूत-समूह); कूटस्थः: कूटस्थ (अपरिवर्तनशील); अक्षरः: अक्षर; उच्यते: कहा जाता है।

हिंदी अनुवाद

इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं – क्षर (विनाशी) और अक्षर (अविनाशी)। क्षर तो सब प्राणी हैं, और कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) अक्षर कहा जाता है।

English Translation

There are two kinds of beings in the world – the perishable and the imperishable. The perishable comprises all creatures, while the unchanging (Kūṭastha) is called the imperishable.

टीका / Commentary

भगवान दो प्रकार के पुरुषों (तत्त्वों) का वर्णन करते हैं – क्षर (बदलने वाला, नाशवान) जो सभी जीव हैं, और अक्षर (अविनाशी, अपरिवर्तनशील) जो कूटस्थ (आत्मा या ब्रह्म) कहलाता है।