श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 17

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 37 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
उत्तमः पुरुषः
उत्तम पुरुष
तु
तो
अन्यः
अन्य (तीसरा)
परमात्मा
परमात्मा
इति
इस प्रकार
उदाहृतः
कहा जाता है
यः
जो
लोकत्रयम्
तीनों लोकों में
आविश्य
व्याप्त होकर
बिभर्ति
धारण करता है
अव्ययः
अविनाशी
ईश्वरः
ईश्वर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किन्तु उनसे (क्षर-अक्षर से) भी भिन्न जो उत्तम पुरुष है, वह परमात्मा कहा गया है, जो तीनों लोकों में व्याप्त होकर उन्हें धारण करता है, अविनाशी ईश्वर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को दिया गया यह ज्ञान केवल युद्ध के मैदान का उपदेश नहीं है, बल्कि यह भवसागर से पार उतरने का सर्वोत्कृष्ट मार्गदर्शक है। गीता के पंद्रहवें अध्याय का नाम 'पुरुषोत्तम योग' है, जो कि अत्यंत गूढ़ और मोक्षदायिनी विद्या माना जाता है। इस अध्याय में भगवान ने संसार रूपी उल्टे पीपल के वृक्ष का वर्णन करने के पश्चात, उससे अनासक्त होने का उपाय बताया है और अंत में क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी) पुरुषों से भी परे एक परम तत्व का उद्घाटन किया है, जिसे 'उत्तम पुरुष' या 'परमात्मा' कहा गया है।

यह श्लोक—“उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥”—वेदांत दर्शन का मेरुदण्ड है। साधारण मनुष्य इस संसार को ही सब कुछ मान बैठता है, जबकि साधना के मार्ग पर चलने वाले साधक क्षर (शरीर, प्रकृति) और अक्षर (कूटस्थ, जीवात्मा का सूक्ष्म रूप) तक पहुँचकर संतुष्ट हो जाते हैं। परंतु वैदिक ऋषियों और योगियों की दृष्टि इससे भी अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक सत्य पर जाती है। वह सत्य है 'पुरुषोत्तम', जो इन दोनों कोटियों से परे है। वह न केवल संपूर्ण ब्रह्मांड (तीनों लोकों—भूः, भुवः, स्वः) में व्याप्त है, बल्कि अपनी अचिंत्य शक्ति से इस पूरे अस्तित्व का धारण और पोषण भी कर रहा है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इस श्लोक का स्मरण और मनन करने से मानव जीवन में व्याप्त मोह, अहंकार, अज्ञान और मृत्यु के भय का शमन होता है। आधुनिक युग की भौतिकवादी दौड़-भाग में जब मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और एकाग्रता की कमी से जूझ रहा है, तब यह श्लोक आंतरिक शांति, आत्म-साक्षात्कार और परम सत्ता के साथ जुड़ाव का अनुभव कराता है। भक्तिलok.इन के इस विशद अध्ययन में हम इसी परम श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों का गहराई से विश्लेषण करेंगे, ताकि साधकगण इसके मर्म को भली-भांति आत्मसात कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७॥


(अथ पञ्चदशोऽध्यायः पुरुषोत्तमयोगः - श्लोक १७)

पाठ करने की विधि: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व पवित्र होकर आसन पर बैठें। मन को शांत करें और श्वासों पर नियंत्रण रखते हुए भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें। पंद्रहवें अध्याय का पाठ या केवल इस सत्रहवें श्लोक का नियमित 108 बार मानसिक जप साधक की ऊर्जा को उर्ध्वगामी (spiritual ascension) बनाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अद्वैत वेदांत का गांभीर्य छिपा है। आइए इसे तालिका के माध्यम से विस्तारपूर्वक समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
उत्तमः सबसे श्रेष्ठ, सर्वोच्च जो क्षर (नाशवान भौतिक जगत) और अक्षर (अविनाशी जीवात्मा/प्रकृति का मूल) दोनों से कोटि गुना श्रेष्ठ है।
पुरुषः चेतना, पुरुष तत्व वह दिव्य चेतन सत्ता जो समस्त चराचर जगत में निवास करती है और चेतना का मूल स्त्रोत है।
तु लेकिन, परंतु, निश्चय ही यह शब्द पिछले दो पुरुषों (क्षर और अक्षर) से इस उत्तम पुरुष की विलक्षणता और भिन्नता को स्पष्ट करता है।
अन्यः दूसरा, बिल्कुल भिन्न यह स्पष्ट करता है कि परमात्मा केवल भौतिक प्रकृति या केवल आत्मा का ही विस्तारित रूप नहीं, बल्कि उनसे एक स्वतंत्र और उच्चतम सत्ता है।
परमात्मा परम + आत्मा (सर्वोच्च आत्मा) समस्त आत्माओं के मूल आधार, भगवान विष्णु या महाविष्णु का वह रूप जो ब्रह्मांड के परे भी विद्यमान है।
इति इस प्रकार से शास्त्रों, वेदों और महर्षियों द्वारा इस नाम से जिसका वर्णन किया गया है।
उदाहृतः कहा गया है, वर्णित है श्रुतियों और स्मृतियों में जिसका गुणगान 'परमात्मा' के रूप में एकस्वर से किया गया है।
यः जो (परमेश्वर) वह सर्वशक्तिमान ईश्वर जो अपने गुणों से अनंत है।
लोकत्रयम् तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) समग्र ब्रह्मांडीय संरचना, जिसमें चौदह भुवन और तीनों काल (भूत, भविष्य, वर्तमान) समाहित हैं।
आविश्य प्रवेश करके, ओतप्रोत होकर कण-कण में, अणु-अणु में अपनी सूक्ष्म शक्ति से व्याप्त होकर रहना।
बिभर्ति धारण और पोषण करता है माता की भांति संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने स्नेह, शक्ति और नियमों के अंतर्गत संभाले रखना।
अव्ययः अक्षय, जिसका कभी क्षय न हो काल, अवस्था और प्रलय के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त, शाश्वत और अपरिवर्तनीय।
ईश्वरः समस्त जगत के स्वामी, नियंत्रक जो संपूर्ण ब्रह्मांड के नियमन, संचालन और संहार के एकमात्र अधिपति हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवां अध्याय महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है, जहां कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का अमृतपान कराते हैं। जब अर्जुन ने संसार की असारता और इस मायारूपी वृक्ष से मुक्त होने का उपाय पूछा, तब भगवान ने विस्तार से 'पुरुषोत्तम योग' का मार्ग प्रशस्त किया। इस अध्याय के आरंभ में ही भगवान कहते हैं कि इस संसार रूपी वृक्ष की जड़ें ऊपर (ब्रह्मलोक में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर हैं, जिसके पत्ते वैदिक छंद हैं। इस वृक्ष को वैराग्यरूपी कुल्हाड़ी से काटकर ही उस परम पद को प्राप्त किया जा सकता है, जहाँ जाने के बाद मनुष्य फिर लौटकर इस संसार में नहीं आता।

इसी क्रम में भगवान ने तीन प्रकार के पुरुषों का वर्गीकरण किया है:

  1. क्षर पुरुष: समस्त नाशवान प्राणी, भौतिक शरीर और प्रकृति के विकार।
  2. अक्षर पुरुष: कूटस्थ, अचल, जीवात्मा का सूक्ष्म और अविनाशी अंश जो प्रकृति के साक्ष्यरूप में रहता है।
  3. उत्तम पुरुष (परमात्मा): यह इन दोनों से सर्वथा भिन्न है। उपनिषदों में इसी तत्व को 'निष्कलं निष्क्रियं शांतं' कहा गया है। कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद में भी इस बात की पुष्टि मिलती है कि उस परम प्रकाशमान ब्रह्म से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

पौराणिक संदर्भों में, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और पुराणों में इस बात पर बार-बार बल दिया है कि भगवान विष्णु या महाविष्णु ही वह 'पुरुषोत्तम' हैं जो अपने विभिन्न अवतारों के माध्यम से इस लोकत्रय का पालन करते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी कपिल देव और देवहूति के संवाद में इसी अद्वैत और सांख्य दर्शन का सार मिलता है। जब साधक यह समझ लेता है कि वह शरीर (क्षर) भी नहीं है और मात्र अकेला साक्षी चैतन्य (अक्षर) भी नहीं, बल्कि वह उस परमेश्वर का ही अंश है, तब उसकी दृष्टि में द्वैत समाप्त हो जाता है और उसे सर्वत्र वासुदेवमय जगत के दर्शन होने लगते हैं। यही इस श्लोक की ऐतिहासिक, पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि का मूल आधार है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस महान श्लोक का नियमित पठन, श्रवण और मनن करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

दैनिक जीवन की चिंताओं, तनाव और अनिश्चितता से घिरे मनुष्य के लिए इस श्लोक का स्मरण मानसिक स्थिरता प्रदान करता है, क्योंकि यह सिखाता है कि सब कुछ एक सर्वोच्च अविनाशी ईश्वर के नियंत्रण में है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) का विकास

संस्कृत के इन पवित्र मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) शरीर के चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक और सुरक्षात्मक ऊर्जा आवरण बनता है।

3. कर्मिक शुद्धि और मोह का नाश

यह श्लोक व्यक्ति को भौतिक संसार के प्रति अत्यधिक आसक्ति (मोह) से मुक्त करता है। साधक यह समझ जाता है कि नाशवान शरीरों से ऊपर एक शाश्वत आत्मा और परमात्मा का संबंध है।

4. आत्म-बोध और उच्च चेतना की प्राप्ति

नियमित ध्यान और श्लोक के अर्थ पर विचार करने से 'अहं ब्रह्मास्मि' और सर्वत्र ईश्वर के दर्शन की भावना पुष्ट होती है, जिससे चेतना का उच्च स्तर प्राप्त होता है।

5. भय और असुरक्षा की भावना से मुक्ति

मृत्यु, भविष्य और हानि का भय तभी तक रहता है जब तक मनुष्य खुद को केवल शरीर मानता है। परमात्मा को 'अव्यय' और 'धारक' जानने पर सभी प्रकार के भय स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

आंतरिक रूप से शांत और ईश्वर से जुड़ा हुआ व्यक्ति जीवन के कठिन दौर में भी विवेकपूर्ण और धर्मसंगत निर्णय लेने में सक्षम होता है।

7. भक्ति और समर्पण भाव का प्रगाढ़ होना

जब साधक यह जानता है कि भगवान ही संपूर्ण लोकत्रय का पालन-पोषण कर रहे हैं, तो उसके हृदय में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, कृतज्ञता और समर्पण का भाव स्वतः उत्पन्न होता है।

8. मोक्ष और परम शांति का मार्ग प्रशस्त होना

गीता के वचनों के अनुसार, पुरुषोत्तम को जान लेने वाला ज्ञानी सब प्रकार से कृतकृत्य हो जाता है और अंततः परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलok.इन पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भ सहित), उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र—के गहन अध्ययन पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री का उद्देश्य पाठकों को बिना किसी भ्रम या संप्रदायिक पूर्वाग्रह के शुद्ध, अकादमिक और आध्यात्मिक रूप से पुष्ट ज्ञान प्रदान करना है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत जानकारों ने यह सुनिश्चित किया है कि शब्दों के अर्थ, व्याकरण और दार्शनिक संदर्भ अपने मूल रूप में सुरक्षित रहें, ताकि आधुनिक पीढ़ी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

गीता के पंद्रहवें अध्याय में 'उत्तम पुरुष' या 'परमात्मा' उस सर्वोच्च अविनाशी ईश्वर (भगवान श्रीकृष्ण या महाविष्णु) को कहा गया है, जो नाशवान भौतिक जगत (क्षर पुरुष) और कूटस्थ जीवात्मा (अक्षर पुरुष) दोनों से सर्वथा भिन्न, श्रेष्ठ और परे है। यही संपूर्ण ब्रह्मांड का धारण और पोषण करता है।

इस संसार के समस्त नाशवान प्राणी, भौतिक शरीर और पदार्थ 'क्षर पुरुष' कहलाते हैं। इसके विपरीत, प्रकृति में स्थित जीवात्मा का सूक्ष्म, अचल और निर्विकार अंश 'अक्षर पुरुष' कहलाता है। इन दोनों से भी परे जो अनंत शक्तिमान ईश्वर है, उसे उत्तम पुरुष कहा जाता है।

इस श्लोक का नियमित जाप और मनन करने से मानसिक तनाव दूर होता है, आंतरिक शांति मिलती है, सांसारिक मोह-माया से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और व्यक्ति की चेतना उच्च आध्यात्मिक स्तर की ओर अग्रसर होती है।

इसका अर्थ है कि वह अविनाशी (अव्यय) ईश्वर तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल या भूः, भुवः, स्वः) में पूरी तरह से प्रवेश करके (व्याप्त होकर) अपनी अनंत शक्ति से उनका धारण और पोषण करता है।

हाँ, यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय से संबंधित है, जिसे 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह अध्याय वेदों और उपनिषदों के सबसे गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रकट करता है।

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हरिः ॐ तत्सत् ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

क्षर और अक्षर से भिन्न एक और उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) में व्याप्त होकर सबको धारण करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा क्षर और अक्षर दोनों से परे है। वह सबका अन्तर्यामी है, सबको धारण करता है, और सबमें व्याप्त है। उसकी शरण में जाना ही मोक्ष का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/20 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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