पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 17
श्लोक १७ में तीसरे पुरुष – उत्तम पुरुष (परमात्मा) का वर्णन है, जो तीनों लोकों में व्याप्त होकर सबको धारण करता है।
संस्कृत श्लोक
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७॥
uttamaḥ puruṣas tv anyaḥ paramātmety udāhṛtaḥ | yo loka-trayam āviśya bibharty avyaya īśvaraḥ ||17||
पदच्छेद / शब्दार्थ
उत्तमः पुरुषः: उत्तम पुरुष; तु: तो; अन्यः: अन्य (तीसरा); परमात्मा: परमात्मा; इति: इस प्रकार; उदाहृतः: कहा जाता है; यः: जो; लोकत्रयम्: तीनों लोकों में; आविश्य: व्याप्त होकर; बिभर्ति: धारण करता है; अव्ययः: अविनाशी; ईश्वरः: ईश्वर।
हिंदी अनुवाद
किन्तु उनसे (क्षर-अक्षर से) भी भिन्न जो उत्तम पुरुष है, वह परमात्मा कहा गया है, जो तीनों लोकों में व्याप्त होकर उन्हें धारण करता है, अविनाशी ईश्वर।
English Translation
But there is another, the Supreme Purusha, called the Supreme Self (Paramātman), who, entering the three worlds, sustains them – the imperishable Lord.
टीका / Commentary
अब भगवान तीसरे पुरुष का वर्णन करते हैं – उत्तम पुरुष या परमात्मा। वह क्षर और अक्षर दोनों से परे है, तीनों लोकों में व्याप्त है, और सबका धारण-पोषण करता है। वह अविनाशी ईश्वर है।