पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 18
श्लोक १८ में भगवान कहते हैं कि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं, इसलिए लोक और वेदों में वे पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
संस्कृत श्लोक
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८॥
yasmāt kṣaram atīto 'ham akṣarād api cottamaḥ | ato 'smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ ||18||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यस्मात्: क्योंकि; क्षरम्: क्षर से; अतीतः: अतीत (परे) हूँ; अहम्: मैं; अक्षरात्: अक्षर से; अपि: भी; च: और; उत्तमः: उत्तम हूँ; अतः: इसलिए; अस्मि: हूँ; लोके: लोक में; वेदे: वेदों में; च: और; प्रथितः: प्रसिद्ध; पुरुषोत्तमः: पुरुषोत्तम।
हिंदी अनुवाद
क्योंकि मैं क्षर (विनाशी) से अतीत हूँ और अक्षर (अविनाशी) से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेदों में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
English Translation
As I transcend the perishable and am also superior to the imperishable, I am renowned in the world and in the Vedas as the Supreme Person (Puruṣottama).
टीका / Commentary
भगवान स्वयं को पुरुषोत्तम कहते हैं क्योंकि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे और श्रेष्ठ हैं। यह उनका सर्वोच्च स्वरूप है।