पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में बताया गया है कि जो पुरुष भगवान को पुरुषोत्तम रूप में जान लेता है, वह मोहरहित होकर सब कुछ जान लेता है और पूर्ण भक्ति करता है।

संस्कृत श्लोक

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९॥

yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣottamam | sa sarva-vid bhajati māṃ sarva-bhāvena bhārata ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यः: जो; माम्: मुझे; एवम्: इस प्रकार; असम्मूढः: मोहरहित (सम्मोह से रहित); जानाति: जानता है; पुरुषोत्तमम्: पुरुषोत्तम के रूप में; सः: वह; सर्ववित्: सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला); भजति: भजता है; माम्: मुझे; सर्वभावेन: सब प्रकार से (सम्पूर्ण भाव से); भारत: हे भारत (अर्जुन)।

हिंदी अनुवाद

हे भारत! जो मोहरहित (असम्मूढ) पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ होकर (सब कुछ जानकर) सब भावों से मेरी भक्ति करता है।

English Translation

He who, free from delusion, thus knows Me as the Supreme Person, he knows all (everything) and worships Me with all his being, O Bharata (Arjuna).

टीका / Commentary

जो मनुष्य भगवान को पुरुषोत्तम के रूप में समझ लेता है (अर्थात उनके स्वरूप को जान लेता है), वह मोह से मुक्त हो जाता है, सब कुछ जान लेता है और पूर्ण भाव से भगवान की भक्ति करता है।