श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 19

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 36 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यः
जो
माम्
मुझे
एवम्
इस प्रकार
असम्मूढः
मोहरहित (सम्मोह से रहित)
जानाति
जानता है
पुरुषोत्तमम्
पुरुषोत्तम के रूप में
सः
वह
सर्ववित्
सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला)
भजति
भजता है
माम्
मुझे
सर्वभावेन
सब प्रकार से (सम्पूर्ण भाव से)
भारत
हे भारत (अर्जुन)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! जो मोहरहित (असम्मूढ) पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ होकर (सब कुछ जानकर) सब भावों से मेरी भक्ति करता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

सनातन धर्म और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात मोक्षदायिनी भगवती श्रुति का स्वरूप माना गया है। महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश आज भी संपूर्ण मानव जाति के लिए मार्गदर्शक प्रकाशस्तंभ हैं। इसी दिव्य ग्रंथ के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' की संज्ञा दी गई है। इस अध्याय में भगवान ने संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का बहुत ही सुंदर और मर्मस्पर्शी वर्णन करते हुए इसके छेदन का मार्ग बताया है। इसी क्रम में, संपूर्ण अध्याय के निष्कर्ष के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने इस परम श्लोक "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्" के माध्यम से अपनी सर्वोच्च सत्ता का उद्घोष किया है.

इस ब्रह्मांड में अनगिनत जीव, प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रज, तम) और नश्वर तथा अनश्वर पदार्थ विद्यमान हैं। सामान्य मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि और इंद्रियों के कारण प्रकृति के प्रपंच में उलझा रहता है और संसार को ही सत्य मान बैठता है। लेकिन जब किसी जिज्ञासु पर भगवान की अहैतुकी कृपा होती है, तब वह वेदों, उपनिषदों और आचार्यों के माध्यम से इस रहस्य को समझ पाता है कि क्षर (विनाशशील प्रकृति) और अक्षर (कूटस्थ जीव) से भी परे एक परम पुरुष है, जिसे 'पुरुषोत्तम' कहा जाता है। यह श्लोक मोहिनी माया के आवरण को चीरकर जीव को उसकी वास्तविक पहचान और परमात्मा के साथ उसके शाश्वत संबंध का बोध कराता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक अद्वैत वेदांत, विशिष्टाद्वैत और भक्ति मार्ग का एक अनूठा संगम है, जो साधक को बौद्धिक ज्ञान से आगे बढ़ाकर अनन्य प्रेमभक्ति की पराकाष्ठा तक पहुँचाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'यो माम्-एवम्-असम्मूढः' का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। 'पुरुषोत्तमम्' शब्द बोलते समय अनुस्वार पर विशेष ध्यान दें और 'भारत' संबोधन से अर्जुन को संबोधित करते हुए एकाग्रता बनाए रखें।

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय १५, श्लोक १९

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यः जो (मनुष्य) वह विशिष्ट पुण्यात्मा या जिज्ञासु जो सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठकर सत्य की खोज में प्रवृत्त हुआ है।
माम् मुझको (भगवान श्रीकृष्ण को) सृष्टि के पालनहार, आदि-नारायण और सबके आंतरिक नियंत्रक परम ईश्वर के रूप में।
एवम् इस प्रकार (कहे गए लक्षणों से युक्त) जैसा कि इस अध्याय में क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का भेद भली-भांति समझाया गया है।
असम्मूढः मोह से रहित होकर / भ्रममुक्त जिसकी बुद्धि अब सांसारिक माया, राग, द्वेष और अज्ञान के भ्रम जाल में नहीं फंसी है।
जानाति जान लेता है / अनुभव करता है केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण में प्रत्यक्ष अनुभूति या साक्षात्कारी ज्ञान प्राप्त करता है।
पुरुषोत्तमम् सर्वोत्तम पुरुष (पुरुषों में श्रेष्ठ) जो प्रकृति और जीव दोनों से परे है, जो वेदों और वेदान्त में 'पुरुषोत्तम' नाम से विख्यात है।
सः वह मनुष्य वह विरला और श्रेष्ठ भक्त जो संसार में रहते हुए भी जीवनमुक्त हो चुका है।
सर्ववित् सब कुछ जानने वाला (सर्वज्ञ) जिसे परमात्मा को जान लेने के बाद दुनिया का कोई अन्य ज्ञान शेष नहीं रहता, वह सारज्ञ बन जाता है।
भजति भक्ति करता है / रमता है निरंतर अनन्य भाव से भगवान के चरणों में अपना चित्त समर्पित कर देता है।
सर्वभावेन पूर्ण भाव से / हर प्रकार से मन, वचन और कर्म से, अपने अस्तित्व के हर एक अणु से भगवान को ही सब कुछ मानकर।
भारत हे अर्जुन! (भारत कुल में उत्पन्न) भगवान अर्जुन को याद दिलाते हैं कि तुम उस कुल में हो जहाँ ज्ञान और वीरता का अद्भुत समन्वय है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवां अध्याय महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व का एक अत्यंत पावन हिस्सा है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब धर्मसंकट में फंसे अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष को रख दिया था और सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण से अपने कल्याण का मार्ग पूछा था। भगवान श्रीकृष्ण ने समय-समय पर अर्जुन को विभिन्न योगों का उपदेश दिया—कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और राजयोग। परंतु जब गीता का अंतिम चरण आता है, तो भगवान रहस्यों के भी रहस्य को खोलना चाहते हैं।

पंद्रहवें अध्याय के आरंभ में संसार रूपी उल्टे वृक्ष का वर्णन मिलता है, जिसकी जड़ें ऊपर ब्रह्मलोक में हैं और शाखाएं नीचे संसार में फैली हैं। इस संसार रूपी वृक्ष का कोई अंत नहीं दिखाई देता, इसलिए वैराग्य रूपी शस्त्र से इसे काटना आवश्यक होता है। इसी प्रसंग में भगवान ने समझाया कि संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं—क्षर (नाशवान शरीर और प्रकृति) और अक्षर (जीवात्मा जो कूटस्थ है)। लेकिन इन दोनों से भी एक अत्यंत विलक्षण और दिव्य तीसरा तत्त्व है, जिसे वेदों में 'उत्तमः पुरुषः' या 'परमात्मा' कहा गया है।

पौराणिक कथाओं और वेदान्त ग्रंथों के अनुसार, जब ऋषि नारद, सनत्कुमार और शुकदेव जैसे महामुनियों ने परम सत्य की खोज की, तो उन्होंने इसी 'पुरुषोत्तम' तत्त्व का साक्षात्कार किया। भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वे ही वह परम पुरुषोत्तम हैं, जिनकी स्तुति वेद करते हैं, जिन्हें पाने के लिए ऋषिगण जंगलों और गुफाओं में कठिन तपस्या करते हैं। इस प्रकार, यह श्लोक न केवल गीता के पंद्रहवें अध्याय का सार है, बल्कि संपूर्ण उपनिषदों की निचोड़ वाणी है, जो हर सनातनधर्मी के हृदय में भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण का बीज बोती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मोह और अज्ञान का नाश

इस श्लोक के नियमित चिंतन और पाठ से मनुष्य के मन से सांसारिक मोह-माया, ईर्ष्या, और भ्रम का कोहरा छंट जाता है। उसे जीवन की वास्तविकता का बोध होता है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता

आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में जब मन अशांत रहता है, तब इस दिव्य श्लोक का स्मरण मानसिक उद्वेग को शांत कर अगाध शांति प्रदान करता है।

3. कर्मिक शुद्धि (पाप कर्मों का क्षय)

जब साधक पूर्ण भाव से भगवान को पुरुषोत्तम मानकर उनकी शरण में जाता है, तो उसके संचित और प्रार्ब्ध कर्मों के बंधन ढीले पड़ने लगते हैं और आंतरिक शुद्धि होती है।

4. सर्वज्ञता और बुद्धि की तीक्ष्णता

शास्त्रों के अनुसार 'सर्ववित्' होने का अर्थ है आत्मज्ञान प्राप्त करना। इस श्लोक के प्रभाव से बुद्धि सूक्ष्म, ग्रहणशील और विवेकशील बनती है।

5. अनन्य भक्ति की प्राप्ति

साधारण भक्ति से ऊपर उठकर 'सर्वभावेन' (संपूर्ण भाव से) भगवान को भजने की शक्ति मिलती है, जिससे भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है।

6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

इस श्लोक के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को पवित्र करती हैं और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विस्तार करती हैं।

7. भय और मृत्यु का निवारण

जो व्यक्ति पुरुषोत्तम को जान लेता है, उसके मन से मृत्यु का भय और भविष्य की अनिश्चितताओं की चिंता हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है।

8. भगवत कृपा और मोक्ष का मार्ग

यह श्लोक सीधे तौर पर भगवत प्राप्ति की कुंजी है। इसके नियमित अभ्यास से साधक इस लोक में सुख भोगते हुए अंततः परम धाम को प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन के हमारे विद्वान आचार्यों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के शोधकर्ताओं द्वारा इस आलेख को अत्यंत प्रामाणिक और वेदान्त सम्मत बनाया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों, शंकराचार्य, रामानुजचार्य और ज्ञानेश्वर महाराज के टीका ग्रंथों (भाष्य) का गहन अध्ययन करने के पश्चात ही इस विषय वस्तु को आप तक पहुँचाया गया है।

हमारा उद्देश्य इंटरनेट पर सनातन धर्म से जुड़ी भ्रामक या अधूरी जानकारियों को दूर करना और प्रामाणिक ग्रंथों (जैसे वेद, पुराण, उपनिषद और गीता) के मूल संदेश को सरल हिंदी में आधुनिक पाठकों तक पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द और भावार्थ को सनातन परंपरा के मानकों के अनुसार परखा गया है, ताकि साधक को एक शुद्ध, सुरक्षित और उच्च कोटि का आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'पुरुषोत्तम' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'पुरुष' (चेतन सत्ता या आत्मा) और 'उत्तम' (सबसे श्रेष्ठ)। इस प्रकार समस्त क्षर (नाशवान) और अक्षर (कूटस्थ) जीवों तथा प्रकृति से जो परे हैं और जिनमें संपूर्ण ब्रह्मांड की सर्वोच्च सत्ता निहित है, वे भगवान श्रीकृष्ण ही 'पुरुषोत्तम' हैं। वे वेदों और उपनिषदों में सर्वोच्च ब्रह्म के रूप में पूजित हैं।

हाँ, यहाँ 'सर्ववित्' का अर्थ सांसारिक ज्ञान नहीं बल्कि 'आत्मज्ञान' या 'परमात्मा का ज्ञान' है। जब ज्ञानी पुरुष यह जान लेता है कि कण-कण में भगवान ही व्याप्त हैं और वही सब कुछ हैं, तब उसका अहंकार समाप्त हो जाता है। उस पूर्ण ज्ञान की परिणति अनन्य और प्रेममयी भक्ति में होती है। ज्ञान और भक्ति कोई विरोधी मार्ग नहीं हैं, बल्कि ज्ञान की पराकाष्ठा ही सच्ची भक्ति है।

इस श्लोक का पाठ प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या बेला में पूजा के समय करना सबसे उत्तम माना गया है। इसके अलावा, जब भी मन अशांत हो या जीवन में कोई कठिन निर्णय लेना हो, तब इस श्लोक का मानसिक स्मरण करने से अद्भुत मानसिक स्पष्टता और शांति प्राप्त होती है।

'सर्वभावेन' का अर्थ है—अपने अस्तित्व के सभी भावों से, यानी मन, वचन, कर्म, श्रद्धा, प्रेम और समर्पण के साथ भगवान का भजन करना। इसमें किसी प्रकार का दिखावा या स्वार्थ नहीं होता। भक्त अपने सुख-दुःख, मान-अपमान और हर परिस्थिति को भगवान की इच्छा मानकर जीवन जीता है और पूरी तरह उन्हीं पर आश्रित हो जाता है।

पंद्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी वृक्ष का वर्णन करने के बाद क्षर और अक्षर पुरुषों से परे भगवान के सर्वोच्च और परम उत्तम स्वरूप 'पुरुषोत्तम' का विस्तार से परिचय दिया है। इस अध्याय का मुख्य केंद्रीय विषय पुरुषोत्तम परमात्मा की प्राप्ति और उनके साथ योग (संयोग/भक्ति) स्थापित करना है, इसीलिए इसे 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से जाना जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं: हे भारत! जो मनुष्य मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार (क्षर-अक्षर से परे) पुरुषोत्तम के रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) हो जाता है और सब भावों से (अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से) मेरी भक्ति करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान के सच्चे स्वरूप को जानना ही सच्चा ज्ञान है। यह ज्ञान सब कुछ जानने के समान है। ऐसा ज्ञानी मोह से मुक्त होकर पूर्ण समर्पण भाव से भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है, जो मोक्ष का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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