श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 34

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 45 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् | कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा || ३४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
मृत्यु
मृत्यु
सर्व-हर
सबका हरण करने वाला
च
और
अहम्
मैं
उद्भव
उत्पत्ति
च
और
भविष्यताम्
भविष्य में होने वालों की
कीर्ति
कीर्ति
श्री
श्री (लक्ष्मी)
वाक्
वाणी
च
और
नारीणाम्
स्त्रियों में
स्मृति
स्मृति
मेधा
मेधा
धृति
धृति
क्षमा
क्षमा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं सर्वहारी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वाले पदार्थों का उद्भव भी हूँ; स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् | कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा || ३४||"

आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डकीय दृष्टि

सनातन धर्म के सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय का नाम 'विभूतियोग' है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अपने परम ऐश्वर्य, अनंत विभूतियों और संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त अपनी असीम शक्तियों का विस्तार से अर्जुन को बोध कराते हैं। प्रस्तुत श्लोक (अध्याय १०, श्लोक ३४) भगवान की उन परम शक्तियों और रूपों का अत्यंत सजीव तथा मार्मिक चित्रण करता है, जो इस भौतिक जगत के संहार से लेकर उसकी उत्पत्ति और मानव मन के भीतर वास करने वाली पावन मानवीय वृत्तियों तक में निरंतर सक्रिय हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन के दो अत्यंत विरोधी प्रतीत होने वाले पहलुओं—महाप्रलयकारी 'मृत्यु' और सर्जनात्मक 'भविष्य की उत्पत्ति'—को एक ही ईश्वर की विभूति के रूप में स्थापित करता है। साधारण मनुष्य मृत्यु को एक भय, अंत और अनिष्ट के रूप में देखता है, परंतु गीता का यह अमोघ ज्ञान साधक को यह दृष्टि प्रदान करता है कि मृत्यु भी उसी परम चेतना का रूप है जो समस्त विकारों और उपभोग की वस्तुओं को हरने वाली (सर्वहरः) है। इसके अतिरिक्त, इस श्लोक में नारी जाति के भीतर निवास करने वाली सात सात्विक, दिव्य और उत्कृष्ट मानसिक-आध्यात्मिक शक्तियों (कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा) को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी ही प्रत्यक्ष विभूति माना है। यह इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी और उसके अंतःकरण में बसने वाले गुण कितने उच्चकोटि के, पूजनीय और दैवीय माने गए हैं।

ब्रह्माण्डकीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक साधक को भय से मुक्ति दिलाता है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि उसकी बुद्धि की मेधा, वाणी की मधुरता, संकटों में धैर्य (धृति) और जीवन की समस्त उपलब्धियां उसी एक परमेश्वर का रूप हैं, तब उसका अहंकार स्वतः गल जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष विद्वत्तापूर्ण लेख में हम इसी गूढ़ श्लोक का शास्त्रीय, व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जो जिज्ञासुओं के अंतःकरण को आलोकित करने में पूर्णतः समर्थ है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्लोक का सस्वर पाठ करने से चित्त की शुद्धि होती है और एकाग्रता बढ़ती है। यहाँ संस्कृत मूल पाठ देवनागरी लिपि में और उसका प्रामाणिक पदावली पाठ प्रस्तुत है:

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ ३४॥

संधि विच्छेद (पदार्थ स्पष्टीकरण हेतु):
  • मृत्युः सर्वहरः च अहम् उद्भवः च भविष्यताम्।
  • कीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा॥
पाठ विधि एवं साधना निर्देश:

इस श्लोक का जप प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। मानसिक शांति, आत्मविश्वास और स्मरण शक्ति में वृद्धि के लिए प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) इस विभूति श्लोक का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है। जप के समय मन में यह भाव रखना चाहिए कि संसार की समस्त श्रेष्ठ और उदात्त ऊर्जाएं भगवान श्री कृष्ण की ही अनुकंपा हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई को समझने के लिए नीचे विस्तृत सारणी दी गई है, जो इसके दार्शनिक आयामों को स्पष्ट करती है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Philosophical Significance)
मृत्युः (Mrityuh) मृत्यु, महाकाल यह जीवन का अंत नहीं बल्कि भौतिक शरीर के विकारों और अहंकार का हरण करने वाली परम शक्ति है। मृत्यु से भयभीत होने के बजाय उसे ईश्वर का रूप मानना ही सच्चा ज्ञान है।
सर्वहरः (Sarvaharah) सब कुछ हरने वाला, सब कुछ चुराने वाला समय या काल ऐसा है जो अंत में राजा-रंक, धन-दौलत, मान-सम्मान सब कुछ अपने आगोश में समेट लेता है। वह सर्वहर भगवान श्रीकृष्ण ही हैं।
च अहम् (Chaham) और मैं ही हूँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि ये विनाशकारी और रचनात्मक दोनों ही छोर अन्य किसी स्वतंत्र शक्ति के अधीन नहीं, अपितु सीधे मेरे ही नियंत्रण में हैं।
उद्भवः (Udbhavah) उत्पत्ति, उद्गम, जन्म भविष्य में उत्पन्न होने वाले समस्त जीवों, प्रपंचों और नई संभावनाओं का बीज या उद्गम स्थल भगवान स्वयं हैं।
भविष्यताम् (Bhavishyatam) भविष्य में होने वाले प्राणियों की / भविष्य की रचनाओं की जो प्राणी या सृष्टियां अभी प्रकट होने बाकी हैं, उन सबका भविष्य श्री कृष्ण की ही संकल्प शक्ति पर आधारित है।
कीर्तिः (Kirtih) यश, ख्याति, प्रसिद्धि नारियों में पाई जाने वाली यशस्विता और सतकार्यों के कारण फैलने वाली महान कीर्ति भगवान का ही दिव्य स्वरूप है।
श्रीः (Shrih) संपत्ति, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, शोभा गृहस्थी की रौनक, घर की लक्ष्मी और समस्त भौतिक व आध्यात्मिक संपदाएं भगवती श्री के रूप में भगवान में ही निहित हैं।
वाक् च (Vak cha) और वाणी, सत्यभाषिणी शक्ति शब्दों का सही चयन, मधुरता, प्रभावोत्पादकता और सत्य वाचन की शक्ति जो वक्ता को गरिमा देती है, वह उन्हीं की वाणी विभूति है।
नारीणां (Narinam) स्त्रियों में, नारियों के भीतर विशेष रूप से स्त्री स्वभाव में सहज रूप से विद्यमान सात प्रमुख सात्विक और उत्कृष्ट दिव्य गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है।
स्मृतिः (Smritih) स्मरण शक्ति, याददाश्त, पूर्व संस्कारों का ज्ञान शास्त्रों, अनुभवों और अपने कर्तव्यों को स्मरण रखने की अद्भुत मानसिक क्षमता का प्रतीक।
मेधा (Medhah) धारणा शक्ति, बुद्धि की तीक्ष्णता जटिल विषयों को तुरंत ग्रहण करने, उनका विश्लेषण करने और ग्रहण करने की मेधा शक्ति।
धृतिः (Dhritih) धैर्य, सहनशीलता, दृढ़ता विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होने का अडिग मानसिक संयम और दृढ़ता।
क्षमा (Kshama) क्षमाशीलता, माफ करने का महान गुण अपराधियों और गलतियों को क्षमा कर देने की परम सात्विक शक्ति, जो ईश्वर का सबसे बड़ा आभूषण है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दिव्य संवाद

यह प्रसंग महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में वर्णित है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कौरव और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धनुर्धर अर्जुन घोर विषाद और कर्तव्य-विमुग्धता से ग्रसित हो गए। अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को सामने युद्ध के लिए तत्पर देखकर उनका गाण्डीव धनुष हाथ से छूटने लगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके सारथी की भूमिका निभाते हुए उन्हें जो उपदेश दिया, वही गीता है।

अध्याय 10 (विभूतियोग) की पृष्ठभूमि तब तैयार होती है जब अर्जुन भगवान से यह जानना चाहते हैं कि हे योगेश्वर! मैं किस-किस प्रकार से निरंतर चिंतन करता हुआ आपका स्मरण करूँ? किन-किन भावों और रूपों में आप इस चराचर जगत में स्थित हैं? अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनगिनत विभूतियों का वर्णन करते हैं। वे स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि जहाँ-जहाँ भी कोई विशेष ऐश्वर्य, कांति, ऊर्जा या शक्ति युक्त वस्तु या प्राणी दिखाई दे, वहाँ-वहाँ तुम मेरी ही ऊर्जा का अंश समझो।

नारी शक्ति के सात गुणों का पौराणिक एवं तात्विक महत्व:

इस श्लोक में विशेष रूप से नारी जाति के अंतर्गत सात विशिष्ट गुणों (कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा) को भगवान ने अपनी विभूति बताया है। पुराणों में इन सातों गुणों को देवी लक्ष्मी, सरस्वती और महाकाली के विभिन्न अंशों के रूप में देखा जाता है।

  • कीर्ति और श्री: ये दोनों भगवती लक्ष्मी के स्वरूप हैं, जो यश और वैभव प्रदान करते हैं।
  • वाक्: यह माता सरस्वती का रूप है, जो वाणी की पवित्रता और साधना का प्रतीक है।
  • स्मृति और मेधा: ये बुद्धि, ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री देवियों के रूप में साधक के अंतःकरण को रोशन करती हैं।
  • धृति और क्षमा: ये धरती माता के समान असीम सहनशीलता और क्षमाशीलता का दर्शन कराती हैं, जो समाज और परिवार को जोड़कर रखती हैं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि नारी का अंतःकरण इन सात दैवीय गुणों का जीवंत मंदिर है। अतः नारी का सम्मान वस्तुतः ईश्वर की इन विभूतियों का ही सम्मान है। ऋषि-मुनियों और आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज) ने अपने भाष्यों में इसी तथ्य पर विशेष बल दिया है कि भौतिक संसार की हर छोटी-बड़ी गतिविधि परम ब्रह्म की ही लीला है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस ३४वें श्लोक का नियमित पाठ, मनन और स्मरण करने से साधक को अनेकानेक मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

मृत्यु और अनिश्चितता का भय निवारण

"मृत्युः सर्वहरश्चाहम्" के स्मरण मात्र से व्यक्ति के मन से मृत्यु का अस्वाभाविक भय समाप्त हो जाता है। वह काल और समय के चक्र को सहज भाव से स्वीकार करने लगता है।

स्मरण शक्ति और बौद्धिक तीक्ष्णता (मेधा)

इस श्लोक में निहित 'स्मृति' और 'मेधा' शब्दों का नियमित ध्यान विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और बौद्धिक कार्य करने वालों के मानसिक कौशल को अत्यधिक तीव्र बनाता है।

धैर्य एवं सहनशीलता (धृति) की प्राप्ति

जीवन के संघर्षों, असफलताओं और आपदाओं के बीच साधक के भीतर 'धृति' (धैर्य) का विकास होता है, जिससे वह कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।

क्षमाशीलता और अहंकार का शमन

'क्षमा' को ईश्वर की विभूति मानने से व्यक्ति के भीतर प्रतिशोध की भावना समाप्त होती है और उसके अंतःकरण में करुणा व क्षमा का भाव प्रस्फुटित होता है।

सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विस्तार

ईश्वरीय विभूतियों के नियमित पाठ से शरीर के चारों ओर एक सात्विक और रक्षात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करता है।

वाणी की प्रभावशीलता (वाक् सिद्धि)

'वाक् च नारीणां' के गहरे अर्थ को समझने और बोलने से साधक की वाणी में सत्य, माधुर्य और प्रभाव उत्पन्न होता है, जो दूसरों के मन को शांति देता है।

कार्मिक शुद्धि और पापों का शमन

गीता के वचनों का पठन यज्ञ के समान पवित्र माना गया है। यह कर्मों के बंधनों को ढीला करता है और साधक को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।

परम डिवाइन ग्रेस (दिव्य कृपा) की प्राप्ति

जब मनुष्य हर वस्तु में भगवान के दर्शन करने लगता है, तब उसे पग-पग पर भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष और परोक्ष कृपा का अनुभव होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं (जैसे शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य) तथा वैदिक व्याकरण के नियमों का पालन करते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका दार्शनिक मर्म और आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता पाठकों तक अत्यंत शुद्ध, प्रामाणिक और सरल हिंदी में पहुंचे।

हमारा उद्देश्य केवल धार्मिक शब्दों को प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे वैज्ञानिक, मानसिक और आध्यात्मिक सत्यों से पाठकों को अवगत कराना है। यदि आप गीता के अन्य अध्यायों या विभूतियों के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, तो Bhaktilok.in के अन्य शोधपरक लेखों का अध्ययन अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: साधारण मनुष्य मृत्यु को एक भयानक अंत या शाप के रूप में देखता है, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से मृत्यु इस भौतिक शरीर, उसके विकारों, अहंकार और असत्य का हरण करने वाली परम शक्ति (सर्वहरः) है। काल के रूप में मृत्यु सब कुछ हर लेती है, और चूँकि काल और प्रलय भी भगवान की ही ऊर्जा के अंतर्गत हैं, इसलिए भगवान ने मृत्यु को अपनी प्रत्यक्ष विभूति कहा है ताकि साधक मृत्यु के भय से मुक्त होकर सत्य को जान सके।

उत्तर: इस श्लोक में नारी के अंतःकरण में निवास करने वाली सात सात्विक शक्तियों का वर्णन है: 1. कीर्ति (यश), 2. श्री (सौंदर्य, लक्ष्मी व ऐश्वर्य), 3. वाक् (मधुर व सत्य वाणी), 4. स्मृति (स्मरण शक्ति), 5. मेधा (बुद्धि की तीक्ष्णता), 6. धृति (धैर्य व दृढ़ता), और 7. क्षमा (माफ करने का महान गुण)। ये सातों गुण मानवीय चेतना को उन्नत बनाते हैं और इन्हें भगवान ने अपनी ही विभूतियां माना है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। इस श्लोक में विशेष रूप से 'स्मृति' (याददाश्त) और 'मेधा' (बुद्धिमत्ता) शब्दों का सीधा संबंध हमारी मानसिक क्षमताओं से है। जब कोई साधक या विद्यार्थी इस श्लोक का सस्वर पाठ और इसका अर्थ चिंतन करता है, तो उसके भीतर मानसिक अवरोध दूर होते हैं, एकाग्रता बढ़ती है और बौद्धिक विकास होता है।

उत्तर: विभूतियों का यह विस्तृत वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के दशवें अध्याय (अध्याय १०) में मिलता है, जिसे 'विभूतियोग' कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर अपनी अनगिनत लोक-परलोक की शक्तियों और ऐश्वर्यों का परिचय दिया है।

उत्तर: इस श्लोक के जप के लिए प्रातः काल (ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के समय) का समय सबसे उत्तम माना गया है। स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण करके पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके शांत चित्त से इस श्लोक का 108 बार मानसिक या मौखिक जप करना चाहिए। जप के दौरान मन में यह भाव रखना चाहिए कि संसार की सभी उच्च वृत्तियां और ऊर्जाएं भगवान का ही स्वरूप हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "मैं सर्वहारी मृत्यु हूँ और भविष्य में होने वाले पदार्थों का उद्भव भी हूँ; स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।"

The Lord encompasses both ends of existence — the destroyer and the creator. He also manifests as the most cherished feminine virtues, showing His presence in the qualities that ennoble human life.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 34 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 34/42 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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