श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 33

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 38 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च | अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः || ३३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
अक्षराणाम्
अक्षरों में
अकार
अकार
अस्मि
हूँ
द्वन्द्व
द्वन्द्व समास
सामासिकस्य
समासों में
च
और
अहम्
मैं
एव
ही
अक्षय
अविनाशी
काल
काल
धाता
विधाता (ब्रह्मा)
अहम्
मैं
विश्वतो-मुख
सब ओर मुख वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अक्षरों में मैं अकार हूँ, समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ, मैं ही अविनाशी काल हूँ, और मैं ही सब ओर मुख वाला विधाता (ब्रह्मा) हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अक्षराणामकारोऽस्मि: सनातन ब्रह्माण्ड का आद्याध्वनिक और दार्शनिक स्वरूप

सनातन धर्म के सर्वाेच्च आध्यात्मिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है, का यह तैंतीसवां (३३वां) श्लोक साक्षात् परमब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के अनंत ऐश्वर्य, उनकी अगाध विभූतियों और इस चराचर जगत में उनकी सर्वव्यापकता का अत्यंत सूक्ष्म, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक दिग्दर्शन कराता है। इस संपूर्ण अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय सख अर्जुन को यह समझाते हैं कि इस सृष्टि में जो कुछ भी असाधारण, सुंदर, शक्तिशाली, बुद्धिमान या जाग्रत है, वह वस्तुतः उनकी ही शक्ति का एक छोटा सा अंश मात्र है।

जब हम इस श्लोक की गहराइयों में उतरते हैं, तो हमें यह ज्ञात होता है कि भगवान केवल मंदिरों की मूर्तियों तक सीमित नहीं हैं, अपितु वे संपूर्ण भाषा विज्ञान, व्याकरण के नियमों, समय के महाप्रवाह और सृष्टि के आदिकर्ता ब्रह्मा के रूप में हर पल इस ब्रह्माण्ड का संचालन कर रहे हैं। 'अक्षराणामकारोऽस्मि' कहकर भगवान ने यह सिद्ध कर दिया कि समस्त ध्वनियों का उद्गम और अंत 'अकार' (अ) में ही निहित है। यह ध्वनि ब्रह्मांड का वह प्रथम कंपन है जिससे नादब्रह्म की उत्पत्ति हुई।

वैदिक संस्कृति में शब्दों, समय और सृजन को अत्यंत पवित्र और दिव्य माना गया है। आधुनिक भौतिक विज्ञान भी आज इस बात को स्वीकार करने लगा है कि ऊर्जा का यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक विशेष आवृत्ति (Frequency) और कंपन (Vibration) पर आधारित है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि जो साधक अपनी चेतना को इन सूक्ष्म तत्वों (जैसे वर्णमाला के 'अ'कार, द्वन्द्व समास की समरसता, अक्षय काल और विश्वतोमुख विधाता) के साथ एकाकार कर लेता है, वह इस भवसागर के बंधनों से मुक्त होकर सहज रूप से परम शांति और भगवत प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी परम पावन श्लोक के हर एक शब्द, उसके ऐतिहासिक संदर्भ, पौराणिक आख्यानों और दैनिक जीवन में इसके तात्विक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।। ३३ ।।

सस्वर पाठ और उच्चारण की विधि:
  • शुद्धता: श्लोक का उच्चारण करते समय दीर्घ और ह्रस्व स्वरों (जैसे 'अ' और 'आ') का विशेष ध्यान रखें। 'अक्षराणाम्' में अनुस्वार का उच्चारण शुद्ध नासिका से होना चाहिए।
  • लय एवं छंद: यह श्लोक संस्कृत के अनुष्टुप छंद में है, जिसके प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं। इसका सस्वर गान एक निश्चित लय और आरोह-अवरोह के साथ किया जाना चाहिए।
  • मानसिक एकाग्रता: पाठ करने से पूर्व शांत चित्त होकर अपने इष्ट देव श्री कृष्ण का स्मरण करें और मन ही मन यह भाव रखें कि यह संपूर्ण जगत उन्ही का स्वरूप है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

इस श्लोक में उपयोग किए गए प्रत्येक पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक अर्थ नीचे दी गई सारणी में स्पष्ट किया गया है ताकि साधक इसके मर्म को भली-भांति समझ सकें:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Essence)
अक्षराणाम् समस्त अक्षरों या वर्णमाला में संपूर्ण भाषा विज्ञान, लिपि और ध्वनियों का मूल आधार जो कभी नष्ट नहीं होता।
अकारः अस्मि 'अ' (अकार) हूँ वह प्रथम ध्वनि जिससे सृष्टि की शुरुआत होती है और जिसके बिना कोई भी व्यंजन उच्चारित नहीं हो सकता।
द्वन्द्वः द्वन्द्व समास वह समास जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं, जो प्रकृति और पुरुष के मिलन या समानता का प्रतीक है।
सामासिकस्य च तथा समस्त समासों में शब्दों के परस्पर जुड़ने की कला, जिससे बड़े-बड़े वेद-वेदांत और ज्ञान ग्रंथ रचे जाते हैं।
अहम् एव निश्चित रूप से मैं ही हूँ परमात्मा का यह दावा कि इस सृष्टि की हर महान व्यवस्था के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी ही ऊर्जा सक्रिय है।
अक्षयः कालः विनाशरहित या अनंत समय वह समय जो कभी समाप्त नहीं होता, भूत, भविष्य और वर्तमान जिसका विस्तार हैं (महाकाल रूप)।
धाता विधाता, पालनकर्ता या ब्रह्मा सृष्टि के कर्मों के अनुसार जीवों को उनके भाग्य और फल का निर्धारण करने वाली शक्ति।
विश्वतोमुखः सब तरफ मुख वाले (सर्वत्र मुख वाले) जिसका हर दिशा में विस्तार है, जो सर्वव्यापक है और हर प्राणी में जिसकी आँखें और मुख हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (कुरुक्षेत्र का युद्ध और विभूतियों का रहस्य)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस संवाद की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी। जब पाण्डव पुत्र अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और भाइयों को सामने युद्धरत देखकर भयंकर मानसिक विषाद और मोह से घिर गए, तब उन्होंने अपने धनुष-बाण रख दिए और भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु एवं सारथी स्वीकार करते हुए शरण ली। अर्जुन के इस आंतरिक संताप को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही गीता ज्ञान के रूप में अमर हो गया।

दशम अध्याय (विभूतियोग) तक पहुँचते-पहुँचते अर्जुन भगवान के विराट स्वरूप और उनकी अचिंत्य शक्तियों के बारे में और अधिक जानने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। अर्जुन पूछते हैं—'हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करते हुए आपको जानूँ? और किन-किन भावों में आप मेरे द्वारा स्मरण करने योग्य हैं?' इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनगिनत विभूतियों का वर्णन करते हैं।

इस श्लोक में भगवान ने चार प्रमुख उदाहरण दिए हैं:

  • वर्णमाला में 'अकार': महर्षि पाणिनि के व्याकरण शास्त्र और शिवसूत्रों में भी 'अ'कार को सबसे पहला और सबसे शुद्ध स्वर माना गया है। बिना 'अ' के किसी भी वर्ण का उच्चारण असंभव है। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान इस संपूर्ण जगत के मूल बीज हैं।
  • समासों में 'द्वन्द्व समास': संस्कृत व्याकरण में समास कई प्रकार के होते हैं—अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। द्वन्द्व समास में दोनों पदों की प्रधानता होती है (जैसे राम-लक्ष्मण, माता-पिता)। यह समाज में संतुलन, परस्पर प्रेम और द्वैत में अद्वैत का सुंदर संदेश देता है।
  • अक्षय काल: पुराणों में काल (समय) को ही महाकाल यानी भगवान शिव या विष्णु का रूप माना गया है। समय न कभी थकता है, न कभी बूढ़ा होता है और न कभी नष्ट होता है। यह निरंतर बहने वाली महाधारा है।
  • विश्वतोमुख विधाता: अथर्ववेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में विधाता (ब्रह्मा जी या परमेश्वर) का वर्णन 'विश्वतोमुख' के रूप में किया गया है—यानी जिसके मुख चारों दिशाओं में हैं। इसका दार्शनिक अर्थ है कि भगवान हर जगह से देख रहे हैं, सुन रहे हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड उनके नियंत्रण में है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसंग को स्मरण करने मात्र से मनुष्य के जीवन के सभी संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और उसे हर कण में ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक को अनेकों अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

१. मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि

श्लोक के संस्कृत शब्दों का सही उच्चारण करने से मस्तिष्क की तरंगे शांत होती हैं। 'अकार' के ध्यान से मानसिक उथल-पुथल समाप्त होती है और गहरी एकाग्रता (Meditation) प्राप्त होती है।

२. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

जब साधक यह समझता है कि समय और भाषा के हर तत्व में भगवान स्वयं विराजमान हैं, तो उसके आसपास एक सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का आवरण निर्मित होता है जो नकारात्मकता को दूर रखता है।

३. कर्मिक शुद्धि और पापों का नाश

गीता के वचनों का दैनिक स्वाध्याय व्यक्ति के अचेतन मन में जमे पुराने विकारों और बुरे संस्कारों (कर्मों के बंधनों) को जलाकर राख कर देता है, जिससे चित्त निर्मल हो जाता है।

४. समय के सदुपयोग की प्रेरणा

'अक्षयः कालो' (अनंत काल) के स्मरण से व्यक्ति को समय के महत्व का बोध होता है। वह अपने जीवन के हर एक क्षण का सदुपयोग भगवत स्मरण और परोपकार में लगाने लगता है।

५. सर्वव्यापक ईश्वर की अनुभूति (दृष्टिकोण में परिवर्तन)

साधक का संकुचित दृष्टिकोण समाप्त हो जाता है। वह हर जीव, हर वस्तु और पूरी प्रकृति में परमात्मा के दर्शन करने लगता है जिससे समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ता है।

६. वाक् शक्ति और बौद्धिक कौशल में निखार

चूँकि भगवान ने अक्षरों में 'अकार' को अपनी विभूति बताया है, अतः इस श्लोक के नियमित पाठ से वक्ताओं, लेखकों और विद्यार्थियों की वाणी में ओज, स्पष्टता और प्रभावशीलता आती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेद व्यास विरचित श्रीमद्भगवद्गीता (दशम अध्याय - विभूतियोग, श्लोक ३३), विभिन्न आचार्यों के भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और संत ज्ञानेश्वर जी) तथा पारंपरिक संस्कृत व्याकरण के नियमों का गहन अध्ययन करने के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक पूरी तरह से शुद्ध, प्रामाणिक, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से प्रेरणादायी सामग्री पहुँचाना है। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई सुझाव या जिज्ञासा है, तो आप हमें संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: संस्कृत वर्णमाला और भाषा विज्ञान के अनुसार 'अ' (अकार) समस्त ध्वनियों का मूल आधार है। बिना 'अ' के किसी भी व्यंजन का उच्चारण संभव नहीं है। जिस प्रकार संपूर्ण भाषा और शब्द 'अ' पर टिके हैं, उसी प्रकार यह संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान श्रीकृष्ण की ऊर्जा पर आधारित है। इसलिए भगवान ने अक्षरों में खुद को 'अकार' बताया है।

उत्तर: व्याकरण की दृष्टि से द्वन्द्व समास वह है जिसमें दोनों पद समान रूप से प्रधान होते हैं (जैसे सुख-दुःख, माता-पिता)। यह इस बात का प्रतीक है कि परमात्मा सृष्टि के हर द्वैत (विरोधी प्रतीत होने वाले तत्वों जैसे प्रकाश-अंधकार, जन्म-मृत्यु) में समान रूप से विद्यमान हैं और उन दोनों का संतुलन बनाए रखते हैं।

उत्तर: 'अक्षयः कालो' का अर्थ है वह समय जो कभी क्षीण या नष्ट नहीं होता यानी महाकाल। समय निरंतर प्रवाहित होता रहता है। इसका स्मरण करने से मनुष्य को यह बोध होता है कि जीवन सीमित है, इसलिए उसे अपने समय का सदुपयोग सत्कर्मों और ईश्वर आराधना में करना चाहिए।

उत्तर: 'विश्वतोमुख' का अर्थ है जिसके मुख सभी दिशाओं में हैं। धाता का अर्थ है सृष्टिकर्ता या पालनहार (ब्रह्मा जी या परमेश्वर)। इसका अर्थ है कि भगवान सर्वत्र मौजूद हैं। संसार के किसी भी कोने में कोई भी कर्म उनकी दृष्टि से छिप नहीं सकता, क्योंकि वे हर दिशा से इस ब्रह्मांड को देख रहे हैं।

उत्तर: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या बेला में स्नान आदि से निवृत्त होकर शांत चित्त से करना सर्वाधिक उत्तम माना गया है। हालांकि, भगवान के स्मरण की कोई समय सीमा नहीं होती; इसे किसी भी समय मानसिक रूप से जपा जा सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "अक्षरों में मैं अकार हूँ, समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ, मैं ही अविनाशी काल हूँ, और मैं ही सब ओर मुख वाला विधाता हूँ।"

The Lord reveals His presence in the fundamentals of language, time, and creation. As the letter "A", He is the source of all sound; as time, He is eternal; as Brahma, He is the creator with universal vision.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 33 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 33/42 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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