श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 31

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 44 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् | झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी || ३१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
पवन
पवन
पवताम्
पवित्र करने वालों में
अस्मि
हूँ
राम
राम
शस्त्र-भृताम्
शस्त्रधारियों में
अहम्
मैं
झषाणाम्
मछलियों में
मकर
मगर
च
और
अस्मि
हूँ
स्रोतसाम्
बहने वाली नदियों में
अस्मि
हूँ
जाह्नवी
गंगा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पवित्र करने वालों में मैं पवन हूँ, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, मछलियों में मैं मगर हूँ, और बहने वाली नदियों में मैं गंगा हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्रीमद्भगवद्गीता' को न केवल एक धार्मिक ग्रंथ, बल्कि साक्षात ब्रह्मविद्या और उपनिषदों का सार माना गया है। गीता का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से विख्यात है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने परम शिष्य अर्जुन को अपनी अचिंत्य, अनंत और सर्वव्यापक विभूतियों का बोध कराते हैं। अर्जुन के यह पूछने पर कि हे योगेश्वर! मैं किस-किस प्रकार से आपका निरंतर चिंतन करूं और किन-किन भावों में आप मुझे स्मरणीय हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी ऐश्वर्ययुक्त शक्तियों का विस्तार से वर्णन किया है। प्रस्तुत श्लोक—"पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् | झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ||"—इसी श्रृंखला का एक अत्यंत पावन और गूढार्थपूर्ण सोपान है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी पवित्र, श्रेष्ठ, शक्तिशाली और मोक्षदायिनी शक्ति के रूप में विद्यमान है, वह वस्तुतः उन्हीं का परा और अपरा प्रकृति का प्रत्यक्ष प्राकट्य है। वायु जो संपूर्ण ब्रह्मांड को प्राणवायु प्रदान करती है और जड़-चेतन को निरंतर पवित्र करती है, वह स्वयं भगवान का ही रूप है। शस्त्रधारियों में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का होना समस्त धर्म, नीति, त्याग और आदर्श जीवन शैली का सर्वोच्च शिखर है। जलचर जीवों में जलराशि का राजा मकर (शार्क या विशालकाय जल जीव) उनकी अजेय शक्ति का प्रतीक है, और समस्त नदियों में मोक्षदायिनी मां गंगा (जाह्नवी) तो स्वयं उनके चरणों से प्रकट होकर संपूर्ण धरा को पावन करने वाली धारा हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक मनुष्य को प्रकृति के प्रत्येक कण में ईश्वर के दर्शन करने की प्रेरणा देता है। जब एक साधक या भक्त इस श्लोक का पाठ करता है और इसके मर्म को समझता है, तो उसकी दृष्टि में परिवर्तन आता है। वह हवा के चलने में, बहती हुई नदी की कलकल में, और इतिहास के महानतम नायक श्रीराम के चरित्र में परमात्मा की ही ऊर्जा का अनुभव करने लगता है। यह श्लोक द्वैत और अद्वैत के उस सूक्ष्म सेतु को जोड़ता है जहाँ जीव और जगत दोनों में एक ही परम चेतना का स्पंदन महसूस होता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हमारा उद्देश्य इसी सनातन चेतना को सहज हिंदी भाषा में पाठकों तक पहुंचाना है, ताकि हर साधक अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति, उच्च नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) के इस इकतीसवें (31वें) श्लोक का सस्वर पाठ करने से पूर्व मन को शांत कर आसन पर बैठना चाहिए। यहाँ श्लोक का प्रामाणिक संस्कृत पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है:

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ ३१॥

पदावली एवं उच्चारण विधि:
  • पवनः (पवनों में, पवित्र करने वालों में) पवताम् (पवित्र करने वाली वस्तुओं में) अस्मि (हूँ)
  • रामः (श्रीराम) शस्त्रभृताम् (शस्त्र धारण करने वालों में, योद्धाओं में) अहम् (मैं)
  • झषाणां (मछलियों व जलचर जीवों में) मकरः (मकर/शार्क) च (और) अस्मि (हूँ)
  • स्रोतसाम् (बहने वाले जल स्रोतों/नदियों में) अस्मि (हूँ) जाह्नवी (गंगा जी)

पाठ करने की विधि: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान-ध्यान के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण या अपने इष्टदेव के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें। इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) या नित्यप्रति 11 बार सस्वर जप करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस सारगर्भित तालिका के माध्यम से श्लोक के प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक भाव स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
पवनः वायु, हवा यह जीवन का आधार प्राणवायु है, जो बिना किसी भेदभाव के सबको शुद्ध करती है और अदृश्य रहकर सबको जीवन देती है।
पवताम् पवित्र करने वाली वस्तुओं में जगत में जितनी भी चीजें शरीर या मन को शुद्ध करने वाली हैं, उन सबकी आंतरिक पवित्र करने की शक्ति ईश्वर की ही है।
अस्मि हूँ यह परमात्मा का घोषणात्मक कथन है कि ये सभी उत्कृष्ट भाव और रूप वस्तुतः मेरा ही प्रत्यक्ष ऐश्वर्य हैं।
रामः मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम धर्म, कर्तव्यनिष्ठा, मर्यादा, पितृभक्ति और आदर्श शासन के सर्वोच्च प्रतीक, जो त्रेतायुग में मानवीय अवतार रूप में प्रकट हुए।
शस्त्रभृताम् शस्त्र धारण करने वाले योद्धाओं में समस्त शूरवीरों, योद्धाओं और न्याय की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने वालों में सबसे श्रेष्ठ और अजेय शक्ति।
अहम् मैं अहंकार का बोध नहीं, बल्कि सर्वव्यापी परम चेतना का बोध जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामित्प को प्रकट करता है।
झषाणां मछलियों और जलचरों में जल के भीतर निवास करने वाले विशाल, शक्तिशाली और अदम्य साहसी जीवों का समुदाय।
मकरः मकर, जलजीव (शार्क) जलचरों में अपार शक्ति, गति और भयमुक्त तैरने की क्षमता का प्रतीक, जो जल की गहराइयों का राजा है।
स्रोतसाम् नदियों और जल स्रोतों में निरंतर बहने वाली जलधाराएं जो पृथ्वी की प्यास बुझाती हैं और जीवन का संचार करती हैं।
जाह्नवी माता गंगा (ऋषि जाह्नु की पुत्री) स्वर्ग से उतरकर भूलोक और पाताल को पावन करने वाली, मोक्षदायिनी और पापों का नाश करने वाली परम पवित्र नदी।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभ में, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भयंकर मानसिक विषाद और कर्तव्य-विमूढ़ता से घिर जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता का उपदेश देते हैं। अर्जुन यह जानना चाहते हैं कि वे अपनी दृष्टि को किस प्रकार सांसारिक मोह से हटाकर दिव्यता की ओर केंद्रित करें। भगवान श्रीकृष्ण अपने योगेश्वर स्वरूप का उद्घाटन करते हुए बताते हैं कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी विभूतिमय, कांतिमान, बलवान या कल्याणकारी है, वह सब मेरी ही एक कला का अंश है—'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' (या विभूतियों के संदर्भ में 'मम तेजोऽशसम्भवम्')।

इस श्लोक में उल्लिखित चार प्रमुख उदाहरण सनातन पुराणों, वेदों और महाकाव्यों के गहरे रहस्यों को समेटे हुए हैं:

1. पवन (वायु) - परम पवित्रता और प्राणशक्ति:

वैदिक साहित्य में वायु को 'वायू रोहिताय' और प्राण का देवता कहा गया है। उपनिषदों में प्राण को ही ब्रह्म बताया गया है। हवा सब कुछ स्पर्श करती है—पवित्र से पवित्र और अपवित्र से अपवित्र वस्तु को—किंतु वह कभी दूषित नहीं होती। यह ईश्वर के उस निर्विकार और सर्वव्यापक स्वभाव का प्रतीक है जो हर जगह मौजूद रहकर भी किसी दोष से लिप्त नहीं होता।

2. राम - शस्त्रधारियों में सर्वोच्च आदर्श:

जब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को शस्त्रधारियों में 'राम' कहते हैं, तो यह वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी के रामचरितमानस के उस अमर चरित्र की प्रतिष्ठा है, जो धर्म, मर्यादा, वचनबद्धता और करुणा की पराकाष्ठा है। भगवान श्रीराम ने दुष्टों का संहार करने के लिए शस्त्र उठाया, किंतु उनके हृदय में प्रजा के प्रति वात्सल्य और शत्रुओं के प्रति भी न्याय का भाव था। शस्त्रधारियों में उनका नाम लेना यह सिखाता है कि शक्ति का उपयोग हमेशा धर्म और लोककल्याण के लिए होना चाहिए, अहंकार या अत्याचार के लिए नहीं।

3. मकर - जलचरों की अजेय शक्ति:

पुराणों में 'मकर' को वरुण देवता का वाहन और जलचरों में सबसे शक्तिशाली जीव माना गया है। कामदेव का प्रतीक 'मकरध्वज' भी इसी ऊर्जा से जुड़ा है। जल की असीम गहराइयों में निवास करने वाला मकर अपनी प्रचंड गति और शक्ति के लिए जाना जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति की अदृश्य और भयानक ताकतों में भी भगवान का ही नियंत्रण कार्य कर रहा है।

4. जाह्नवी (गंगा) - मोक्ष की धारा:

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा भगीरथ के कठिन तप से प्रसन्न होकर माता गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। जब वे मार्ग में महर्षि जाह्नु के आश्रम के पास से गुजरीं, तो उनके तीव्र प्रवाह से ऋषि का यज्ञोपवीत और हवन सामग्री बह गई। क्रोधित होकर महर्षि जाह्नु ने गंगाजी का संपूर्ण जल पी लिया। तब देवताओं और भगीरथ की प्रार्थना पर ऋषि ने उन्हें अपने कान के रास्ते से बाहर निकाला, जिससे उनका नाम 'जाह्नवी' (जह्नु की पुत्री) पड़ा। गंगा नदी केवल भारत की भौगोलिक नदी नहीं है, बल्कि यह वह अमृत धारा है जो पापी से पापी जीव को भी अपने स्पर्श से तार देती है। भगवान का यह कहना कि 'स्रोतसामस्मि जाह्नवी' यह सिद्ध करता है कि गंगा का जल साधारण जल नहीं, बल्कि साक्षात भगवत्स्वरूप अमृत है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

गीता के इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन या श्रवण करने से साधक को अनेकानेक मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

श्लोक का सस्वर पाठ मन की चंचलता को शांत करता है। वायु और गंगा की तरह मन भी निर्मल और प्रवाहमयी बनता है, जिससे तनाव और चिंता दूर होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पवन और जाह्नवी (गंगा) जैसी पवित्र शक्तियों का स्मरण करने से आसपास का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है और नकारात्मक विचार नष्ट होते हैं।

3. कार्मिक शुद्धि (पापों का शमन)

गंगा को पापमोचनी कहा गया है। इस श्लोक के माध्यम से गंगा और भगवान राम का स्मरण करने से पुराने कर्मों के बंधनों से मुक्ति में सहायता मिलती है।

4. नैतिक गुणों और मर्यादा का विकास

'रामः शस्त्रभृतामहम्' के स्मरण से व्यक्ति के भीतर अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, सत्यनिष्ठा और न्यायप्रियता जैसे दिव्य गुणों का विकास होता है।

5. अद्वैत चेतना की प्राप्ति

साधक प्रकृति के प्रत्येक तत्व में परमात्मा को देखने लगता है, जिससे उसका अहंकार समाप्त होता है और संपूर्ण सृष्टि के प्रति प्रेम भाव जागृत होता है।

6. भय और अड़चनों से मुक्ति

जलचरों के राजा मकर और अजेय राम की शक्ति का बोध होने से साधक के मन से अज्ञात भय, शत्रुओं का डर और जीवन की बाधाएं समाप्त होने लगती हैं।

7. प्राणशक्ति (प्राणायाम बल) में वृद्धि

'पवनः पवतामस्मि' के ध्यान से श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण बेहतर होता है, जो योग साधना और स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

8. भगवत्कृपा और मोक्ष का मार्ग

भगवान की विभूतियों का निरंतर स्मरण करने से भक्त का चित्त निरंतर ईश्वर में लगा रहता है, जो अंततः परम गति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य एवं गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण), वाल्मीकि रामायण और विभिन्न पुराणों के मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन करने के पश्चात विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन धर्म के आचार्यों की देखरेख में तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और शास्त्रों का वास्तविक, त्रुटिहीन और जीवनोपयोगी संदेश पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय प्रामाणिकता, स्पष्टता और उच्च कोटि के आध्यात्मिक मानकों का पूर्ण ध्यान रखा गया है, ताकि आधुनिक जीवनशैली से जुड़े साधक सनातन संस्कृति की गहराइयों से सहजता से जुड़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं विष्णु के ही पूर्ण अवतार हैं और त्रेतायुग में वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में प्रकट हुए थे। 'रामः शस्त्रभृतामहम्' कहकर वे यह दर्शाते हैं कि शस्त्र धारण करने वाले योद्धाओं में न्याय, धर्म, मर्यादा, पितृभक्ति और आदर्श शासन का जो सर्वोच्च मानक श्रीराम ने स्थापित किया, वह अद्वितीया है और वह मर्यादा स्वरूप स्वयं भगवान का ही ऐश्वर्य है।

वायु संपूर्ण ब्रह्मांड को निरंतर प्राणवायु देती है और सबको बिना किसी भेदभाव के शुद्ध करती है, जो ईश्वर के सर्वव्यापक और निर्विकार प्रेम का प्रतीक है। इसी प्रकार गंगा (जाह्नवी) सभी नदियों में सबसे अधिक पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यह मोक्षदायिनी है और इसके स्पर्श मात्र से भौतिक व आध्यात्मिक पापों का नाश होता है। ये दोनों प्रकृति के ऐसे उपादान हैं जो सीधे तौर पर जीवन और मुक्ति दोनों का आधार हैं।

इस श्लोक का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है। स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए इस श्लोक का 11, 21 या 108 बार सस्वर पाठ किया जा सकता है। इसके अर्थ का मनन करते हुए यदि इसे दैनिक दिनचर्या में शामिल किया जाए, तो यह मन को अत्यंत शांत और केंद्रित रखता है।

'झष' का अर्थ जलचर जीव या मछलियाँ होता है। जल की असीम और रहस्यमयी गहराइयों में रहने वाला मकर (शार्क या विशाल जलजीव) अपनी प्रचंड शक्ति, गति और अदम्य साहस के लिए जाना जाता है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति के शांत रूपों के साथ-साथ भयंकर और शक्तिशाली रूपों में भी नियंत्रण परमेश्वर का ही है, और साधक को हर परिस्थिति में भगवान की इस शक्ति का सम्मान करना चाहिए।

दशम अध्याय यह सिखाता है कि यह संपूर्ण जगत और इसमें मौजूद हर श्रेष्ठ, सुंदर, शक्तिशाली और पवित्र वस्तु कोई साधारण चीज नहीं, बल्कि साक्षात परमात्मा का ही विस्तार है। इसे पढ़ने से मनुष्य की संकीर्ण दृष्टियां समाप्त होती हैं और वह पशु-पक्षियों, नदियों, पर्वतों, मनुष्यों और पूरी प्रकृति के प्रति आदर व प्रेम का भाव विकसित करता है, जो अद्वैत दर्शन और भक्तियोग की सर्वोच्च अवस्था है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "पवित्र करने वालों में मैं पवन हूँ, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, मछलियों में मैं मगर हूँ, और बहने वाली नदियों में मैं गंगा हूँ।"

The Lord identifies with the most powerful and sacred in each category — the purifying wind, the perfect warrior-avatar, the mightiest aquatic creature, and the holiest river.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 31 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 31/42 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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