श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 30

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 36 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् | मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् || ३०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
प्रह्लाद
प्रह्लाद
च
और
अस्मि
हूँ
दैत्यानाम्
दैत्यों में
काल
काल
कलयताम्
गणना करने वालों में
अहम्
मैं
मृगाणाम्
पशुओं में
च
और
मृगेन्द्र
सिंह
अहम्
मैं
वैनतेय
गरुड़
च
और
पक्षिणाम्
पक्षियों में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में मैं काल हूँ, पशुओं में मैं सिंह हूँ, और पक्षियों में मैं वैनतेय (गरुड़) हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त उपनिषदों का सार और साक्षात् भगवान श्रीहरि की वाणी माना गया है। गीता के दशम अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है, में अर्जुन के बार-बार आग्रह करने पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनंत और असीम शक्तियों, ऐश्वर्यों तथा विभूतियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस अध्याय के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि संपूर्ण चराचर जगत में जो कुछ भी असाधारण, श्रेष्ठ, कांतिमान, बलवान और पवित्र है, वह सब वस्तुतः उनकी ही शक्ति का एक सूक्ष्म अंश मात्र है।

'भक्तिलोक' (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर हम श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक संख्या 30—"प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् | मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ||"—की गहराई में उतरेंगे। यह श्लोक साधारण शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की उन परम शक्तियों का द्योतक है जो मनुष्य को भौतिकता के अंधकार से निकालकर आध्यात्मिकता के प्रकाश की ओर ले जाती हैं। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने दैत्यों में प्रह्लाद, गणकों में काल, पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ को अपनी विभूति बताया है। इन चार प्रतीकों के माध्यम से भगवान ने भक्त की निष्ठा, समय की अनिवार्यता, प्रकृति के पराक्रम और देवत्व की निष्ठा का एक ऐसा अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है, जो साधक के अंतःकरण को जागृत कर देता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस श्लोक के प्रामाणिक पाठ, शब्द-दर-शब्द अर्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक लाभ और जीवन में इसके अनुप्रयोग का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि हर सनातन प्रेमी इसे अपने जीवन में उतारकर परम शांति और भगवद्कृपा का अनुभव कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः अथ दशमोऽध्यायः (विभूतियोग)

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् l
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ll ३० ll


(प्रह्लादश्च-अस्मि दैत्यानां कालः कलयताम्-अहम ् l
मृगाणां च मृगेन्द्रः-अहं वैनतेयः च पक्षिणाम् ll)

श्लोक उच्चारण एवं पाठ की शास्त्रीय विधि:
  • प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें और भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष आचमन करें।
  • दीपक प्रज्वलित कर मन को शांत करें और इस श्लोक का कम से कम 108 बार (एक माला) मानसिक या उपांश जप करें।
  • पाठ के दौरान प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर ध्यान दें, विशेषकर 'वैनतेयश्च' और 'कलयतामहम्' का स्पष्टारण करें।
  • जप के अंत में भगवान को तुलसी दल और मिश्री का भोग अर्पित कर अपनी समस्त चिंताओं को उनके चरणों में समर्पित कर दें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत व्याकरण और वेदान्त के दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक पद का गहरा दार्शनिक अर्थ है। आइए इसे एक विस्तृत तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रह्लादः च और प्रह्लाद भक्तों की पराकाष्ठा; जो घोर राक्षस कुल में उत्पन्न होकर भी भगवान की अनन्य भक्ति से विचलित नहीं हुए।
अस्मि हूँ भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन कि वे स्वयं ही उन श्रेष्ठ स्वरूपों में विद्यमान हैं।
दैत्यानाम् दैत्यों में, असुरों में असुरी प्रवृत्तियों और भौतिकता के बीच भी भगवद्प्रेम की सर्वोच्च स्थिति का प्रतीक।
कालः समय, काल (प्रलयकाल या यमराज) सबका नाश करने वाला और सब पर नियंत्रण रखने वाला निरंतर बहता हुआ समय।
कलयताम् गणना करने वालों में, दमन करने वालों में, या शासकों में समूची सृष्टि का नियमन, प्रबंधन और हिसाब रखने वाली परम शक्ति।
अहम् मैं (श्रीकृष्ण) संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल स्रोत और नियंत्रक का प्रत्यक्ष अभिस्वीकरण।
मृगाणां च और पशुओं में, मृगों में जंगली जीवों और पशु जगत का विशाल परिसर।
मृगेन्द्रः अहम् सिंह (पशुओं का राजा) हूँ निर्भयता, पराक्रम, और नेतृत्व क्षमता का सर्वोच्च प्रतीक, जो जंगल का राजा है।
वैनतेयः च और गरुड़ (विनता के पुत्र) भगवान विष्णु के वाहन, तीव्र गति, वेदस्वरूप और निष्ठावान सेवक।
पक्षिणाम् पक्षियों में नभचर जीवों का संपूर्ण वर्ग, जिसमें ऊँची उड़ान भरने की क्षमता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की जड़ें सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में गहराई से जुड़ी हुई हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में उपदेश दे रहे थे, तब उनका उद्देश्य अर्जुन के मोह को भंग करना और उसे यह समझाना था कि दृश्यमान जगत में जो कुछ भी अद्भुत या शक्तिशाली दिखाई देता है, वह सब परम ब्रह्म की ही विभूति है। इस श्लोक में जिन चार पात्रों और तत्वों—प्रह्लाद, काल, सिंह और गरुड़—का उल्लेख किया गया है, वे अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च प्रतिष्ठा रखते हैं।

1. दैत्यों में प्रह्लाद:

हिरण्यकशिपु जैसे महाक्रूर और नास्तिक असुर के घर में जन्म लेने के बावजूद प्रह्लाद जी ने कभी भगवान नारायण के प्रति अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी। उन्हें मारने के लिए अनेक यंत्रणाएं दी गईं—उन्हें उबलते तेल में डाला गया, हाथियों के पैरों तले कुचला गया, पर्वतों से फेंका गया और विषैले सांपों से डंसवाया गया—किंतु उनकी भक्ति अडिग रही। भगवान श्रीकृष्ण यह संदेश देते हैं कि कुल या बाहरी परिस्थितियां मनुष्य की आध्यात्मिक महानता को तय नहीं करतीं; बल्कि भगवान के प्रति उसका समर्पण ही उसकी सबसे बड़ी विभूति है।

2. गणना करने वालों में 'काल':

काल (समय) दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है। राजा हो या रंक, देवता हो या असुर—कोई भी काल के ग्रास से बच नहीं सकता। 'कलयतामहम्' का अर्थ है कि जो सब का नियमन करता है, जो इतिहास को रचता और मिटाता है, वह निर्विकार महाकाल स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं।

3. पशुओं में 'मृगेन्द्र' (सिंह) और पक्षियों में 'वैनतेय' (गरुड़):

पशुओं में सिंह अपनी निर्भयता, अदम्य साहस और राजा की तरह आचरण के कारण सर्वोच्च माना जाता है। इसी प्रकार पक्षियों में 'वैनतेय' अर्थात महर्षि कश्यप और विनता के पुत्र गरुड़, जो भगवान विष्णु के वाहन हैं, वेदों के रूप और अमोघ गति के प्रतीक हैं। गरुड़ जी की दृष्टि, उनकी गति और भगवान के प्रति उनकी अनन्य सेवा उन्हें समस्त पक्षी जगत में मुकुटमणि बनाती है। इन चारों का उल्लेख करके भगवान ने यह सिद्ध कर दिया कि चेतना के हर स्तर पर श्रेष्ठतम वस्तु में उनका ही वास है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस पवित्र श्लोक का नियमित स्मरण, पठन और इसके अर्थ पर मनन करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक शांति एवं स्थिरता

जीवन की उथल-पुथल और तनाव के बीच जब व्यक्ति 'काल' और भगवान की सर्वव्यापकता का स्मरण करता है, तो उसका मन शांत होता है और भविष्य की चिंताएं दूर होती हैं।

भय और अवसाद से मुक्ति

प्रह्लाद जी की अटूट आस्था का ध्यान करने से बड़े से बड़ा संकट या विरोधी परिस्थिति भी तुच्छ प्रतीत होने लगती है और मन से हर प्रकार का अज्ञात भय समाप्त हो जाता है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

भगवान की विभूतियों के चिंतन से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक ऊर्जा (आरंभिक औरा) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

कर्मों की शुद्धि और पवित्रता

यह बोध होने पर कि सब कुछ ईश्वर का ही स्वरूप है, व्यक्ति अनैतिक कार्यों से दूर रहता है और उसके कर्म स्वतः ही सेवा और धर्म की दिशा में प्रवृत्त होने लगते हैं।

नेतृत्व और पराक्रम में वृद्धि

पशुराज सिंह और गरुड़ के गुणों (साहस, तेज, वफादारी और दूरदृष्टि) का प्रभाव साधक के व्यक्तित्व में उतरता है, जिससे उसकी नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास मजबूत होता है।

भगवद्कृपा और मोक्ष का मार्ग

विभूतियों को जानने से अर्जुन की तरह साधक की अनन्य भक्ति पुष्ट होती है, जिससे भवसागर से तरने और भगवद्धाम प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: 'भक्तिलोक' (Bhaktilok.in) के तत्वावधान में इस आलेख को तैयार करते समय प्राचीन वेदान्त परंपराओं, आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे गीताप्रेस गोरखपुर एवं स्वामी ज्ञाननानंद जी के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति की शुद्ध, त्रुटिहीन और अकाट्य जानकारी पहुंचाना है। इस श्लोक की व्याख्या में किसी भी प्रकार की आधुनिक कल्पना या भ्रामक प्रसंग का समावेश नहीं किया गया है, अपितु इसे विशुद्ध शास्त्रीय और पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर ही प्रस्तुत किया गया है ताकि जिज्ञासुओं को आध्यात्मिक उन्नति का सही मार्ग मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

दैत्य कुल स्वभाव से नास्तिक, क्रूर और भगवान विरोधी माने जाते हैं। ऐसे घोर तामसी वातावरण में उत्पन्न होने के बावजूद प्रह्लाद जी ने कभी भगवान के प्रति अपनी अटूट भक्ति और प्रेम को कम नहीं होने दिया। भगवान यह दर्शाना चाहते हैं कि सच्ची भक्ति किसी बाहरी कुल या वंश की मोहताज नहीं होती, और जहाँ निष्काम प्रेम व अटूट निष्ठा होती है, वहाँ स्वयं भगवान का वास होता है। इसलिए वे दैत्यों में प्रह्लाद को अपनी विभूति मानते हैं।

'कलयताम्' का अर्थ है गणना करने वाले, प्रबंध करने वाले या नियंत्रण करने वाले। इस संसार में समय (काल) ही वह महान शक्ति है जो हर प्राणी की आयु गिनती है, इतिहास रचती है और सब कुछ अपने आगोश में समेट लेती है। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि सृष्टिक्रम को नियंत्रित करने वाली यह महाकाल शक्ति और कोई नहीं, बल्कि उनका ही अपरिवर्तनीय स्वरूप है।

पशु जगत में सिंह अपने अदम्य साहस, निर्भयता, बल और नेतृत्व के कारण 'मृगेन्द्र' (राजा) कहलाता है। इसी प्रकार पक्षियों में गरुड़ अत्यंत तीव्र गति, दिव्य दृष्टि, वेदमय स्वरूप और भगवान विष्णु के परम वाहन होने के नाते श्रेष्ठतम माने जाते हैं। प्रकृति में जो भी अपने वर्ग में सर्वोच्च, तेजस्वी और गुणवान है, वह भगवद्शक्ति का ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।

आप प्रातःकाल पूजा के समय इस श्लोक का पाठ कर सकते हैं या दिनभर में जब भी आपको मानसिक तनाव या एकाग्रता की कमी महसूस हो, तब इसका मानसिक स्मरण कर सकते हैं। यह आपको यह याद दिलाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी प्रह्लाद की तरह अडिग रहना चाहिए और समय की गति को स्वीकार करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

विभूतियोग का मुख्य उद्देश्य साधक की दृष्टि को बदलना है। सामान्य मनुष्य इस संसार को केवल भौतिक पदार्थों और सुख-दुखों का आगार समझता है, किंतु विभूतियोग के अध्ययन से व्यक्ति कण-कण में परमात्मा के दर्शन करने लगता है। इससे उसके मन में संसार के प्रति अनासक्ति और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम स्वतः ही जागृत हो जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में मैं काल हूँ, पशुओं में मैं सिंह हूँ, और पक्षियों में मैं वैनतेय (गरुड़) हूँ।"

The Lord shows His presence in all realms — even among demons, He manifests as the devotee Prahlada; as time, He is the ultimate measurer; as lion and Garuda, He is the king of beasts and birds.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 30 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 30/42 71% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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