श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 29

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 43 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् | पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् || २९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अनन्त
अनंत (शेषनाग)
च
और
अस्मि
हूँ
नागानाम्
नागों में
वरुण
वरुण
यादसाम्
जलचर प्राणियों में
अहम्
मैं
पितॄणाम्
पितरों में
अर्यमा
अर्यमा
च
और
अस्मि
हूँ
यम
यम
संयमताम्
नियन्ताओं में
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

नागों में मैं अनन्त (शेषनाग) हूँ, जलचरों में मैं वरुण हूँ, पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और नियन्ताओं में मैं यम हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञानकोश

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) के इस पावन श्लोक का वृहद, दार्शनिक और शास्त्रीय विवेचन

आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय परिचय

सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान अद्वितीय है। यह केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुआ संवाद मात्र नहीं है, अपितु यह संपूर्ण मानवजाति के लिए जीवन जीने की कला, परम सत्य की खोज और मोक्ष प्राप्ति का मार्गदर्शक ग्रंथ है। गीता का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से विख्यात है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने परम ऐश्वर्य, असीम विभूतियों और इस संपूर्ण ब्रह्मांड में अपनी उपस्थिति का अत्यंत सूक्ष्मता से विस्तार करते हैं। अर्जुन के बार-बार पूछने पर कि "हे भगवान, मैं किस-किस रूप में आपका स्मरण करूँ और आपकी कौन-कौन सी योगशक्तियाँ इस संसार में व्याप्त हैं?", भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनन्त विभूतियों का सविस्तार वर्णन करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक—"अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् | पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् || २९||"—इसी श्रृंखला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ अर्थ समेटे हुए रत्न है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि नागों में वे अनन्त (शेषनाग) हैं, जलचर जीवों या जलीय आधिपत्य रखने वालों में वे वरुण देव हैं, पितरों में अर्यमा हैं और समस्त नियम-संयम रखने वालों अथवा दंड देने वालों में यमराज स्वयं उन्हीं का स्वरूप हैं। इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को इस संसार की हर सुंदर, शक्तिशाली, न्यायप्रिय और महान वस्तु या शक्ति के पीछे उस परम चेतना (श्रीकृष्ण) के दर्शन करना सिखाता है। जब एक साधक इस दृष्टिकोण को अपनाता है, तो उसका संपूर्ण जीवन कृतज्ञता और भक्ति से भर जाता है, और वह हर जीव में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

देवनागरी मूल श्लोक

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ २९॥

रोमन लिपि (IAST Transliteration)

anantaśh cāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham
pitṝṇām aryamā cāsmi yamaḥ saṁyamatām aham

सस्वर पाठ एवं उच्चारण की विधि:

इस श्लोक का पाठ करते समय उचित यति (विराम) और गति का ध्यान रखना आवश्यक है। 'अनन्तश्चास्मि' में विसर्ग और अनुस्वार का सही उच्चारण करें। 'यादसामहम्' बोलते समय दीर्घ स्वरों पर उचित बल दें। इसका प्रतिदिन प्रातः स्नान उपरांत शांत मन से तीन या ग्यारह बार सस्वर पाठ करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और भगवान की दिव्य विभूतियों के प्रति समर्पण भाव जागृत होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्लोक के प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका आध्यात्मिक एवं दार्शनिक मर्म नीचे सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Philosophical Interpretation)
अनन्तः (Anantaḥ) अनन्त (शेषनाग) संसार के आधार और अनंत काल के प्रतीक शेषनाग, जिन पर संपूर्ण ब्रह्मांड टिका है, भगवान की अमोघ शक्ति के दायक हैं।
च + अस्मि (Cha + Asmi) और हूँ (And I am) भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि इन विशिष्ट रूपों में अन्य कोई नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से वे स्वयं ही विद्यमान हैं।
नागानाम् (Nāgānām) नागों में (Among the Nagas) सर्प कुलों या नाग देवताओं के वर्ग में, जिनकी शक्ति और कुण्डलिनी जागरण में विशेष महत्ता है।
वरुणः (Varuṇaḥ) वरुण देव (Lord Varuna) जल के देवता और ब्रह्मांडीय नैतिक व्यवस्था (ऋत) के संरक्षक वरुण, जो जल तत्वों के स्वामी हैं।
यादसाम् (Yādasām) जलचर जीवों में (Among aquatic beings) समुद्र और जल में रहने वाले समस्त जीवों, जीवों के आधिपत्य और महासागरीय ऊर्जा में।
अहम् (Aham) मैं (I am) परब्रह्म परमात्मा की स्वतंत्र और सर्वव्यापक सत्ता का बोध कराने वाला अहम सर्वोपरि है।
पितॄणाम् (Pitṝṇām) पितरों में (Among the Pitris) पूर्वजों और दिवंगत आत्माओं के मार्गदर्शक एवं संरक्षक पितृगणों में।
अर्यमा (Aryamā) अर्यमा (Aryama) पितरों के देवताओं में श्रेष्ठ अर्यमा, जो सूर्य के विभिन्न रूपों में से एक हैं और मित्रता व परंपरा के प्रतीक हैं।
यमः (Yamaḥ) यमराज (Lord Yama) धर्मराज यम, जो मृत्यु के देवता और निष्पक्ष न्याय के अधिष्ठाता हैं।
संयमताम् (Saṁyamatām) संयम रखने वालों / दंड देने वालों में कानून, अनुशासन, आत्म-संयम रखने वाले शासकों और दण्ड के माध्यम से धर्म की रक्षा करने वालों में।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

इस श्लोक में जिन चार प्रमुख विभूतियों—**अनंत (शेषनाग), वरुण, अर्यमा और यम**—का उल्लेख किया गया है, वे सभी भारतीय पौराणिक ग्रंथों (पुराणों, वेदों और महाकाव्यों) में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन पात्रों और शक्तियों की उत्पत्ति और उनके ऐतिहासिक/पौराणिक संदर्भ को समझना इस श्लोक की गहराई तक पहुँचने की कुंजी है।

१. नागों में अनन्त (शेषनाग):

पौराणिक कथाओं के अनुसार, अनन्त या शेषनाग भगवान विष्णु के परम भक्त और उनके शैया हैं। क्षीरसागर में अनंत नाग के फनों की छांव में विश्राम करते भगवान विष्णु का रूप सृष्टि के पालन और स्थिरता का प्रतीक है। महाभारत और पुराणों में अनन्त नाग को अपार बल का स्वामी बताया गया है, जिन्होंने अपनी फनों पर इस समस्त पृथ्वी को धारण कर रखा है। भगवान श्रीकृष्ण का यह कहना कि "मैं नागों में अनन्त हूँ", यह दर्शाता है कि अचल स्थिरता और योगबल का स्रोत वही हैं।

२. जलचरों में वरुण देव:

ऋग्वेद काल से ही वरुण देव को ब्रह्मांडीय जल, महासागरों और वर्षा का देवता माना गया है। उन्हें 'ऋतस्य गोपा' (नैतिक और प्राकृतिक नियमों का संरक्षक) कहा गया है। जल जीवन का आधार है, और संसार के दो-तिहाई हिस्से पर जल का आधिपत्य है। भगवान श्रीकृष्ण का वरुण के रूप में स्वयं को बताना यह प्रमाणित करता है कि प्रकृति के सबसे विशाल और जीवनदायी तत्वों में प्रत्यक्ष रूप से दिव्य शक्ति कार्य कर रही है।

३. पितरों में अर्यमा:

वैदिक ज्योतिष और पुराणों के अनुसार, अर्यमा आदित्यों (द्वादश सूर्यों) में से एक हैं और वे पितृलोक के मुख्य शासक व देवता हैं। अर्यमा का अर्थ है 'मित्रता', 'सद्भावना' और 'वंश परंपरा का निर्वाह करने वाला'। वे पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। पितरों में अर्यमा की उपस्थिति का अर्थ है कि हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद और हमारी वंशगत संस्कृति में भी भगवान का ही अनुशासन और प्रेम प्रवाहित हो रहा है।

४. संयमियों और शासकों में यमराज:

धर्मराज यम को सूर्यपुत्र और मृत्यु के देवता के रूप में जाना जाता है। वे निष्पक्ष न्याय, अनुशासन और कर्मफल के विधान के प्रतीक हैं। 'संयमतामहम्' का अर्थ है कि जो लोग इस संसार में अनुशासन, कानून, नैतिक संयम और उचित न्याय की स्थापना करते हैं, उनकी शक्ति के पीछे भगवान का न्यायप्रिय स्वरूप ही कार्य कर रहा है। यमराज का भय पापियों के लिए दंड है, किंतु भक्तों के लिए वह ईश्वरीय न्याय व्यवस्था का अटूट हिस्सा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का स्मरण और मनन करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक शांति एवं स्थिरता

अनन्त नाग की तरह मन को स्थिर और शांत रखने की क्षमता प्राप्त होती है, जिससे जीवन के विकारों से लड़ने की शक्ति मिलती है।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

संपूर्ण ब्रह्मांड के जल तत्वों और प्रकृति के महानायकों में ईश्वर के दर्शन करने से साधक की औरा (अवरोधक ऊर्जा क्षेत्र) सकारात्मक बनती है।

कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

धर्मराज यम और अर्यमा के स्मरण से कर्मों के प्रति सजगता बढ़ती है, जिससे अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित और कर्म शुद्धि होती है।

पूर्वजों का आशीर्वाद (Pitru Kripa)

पितरों के अधिपति अर्यमा के इस श्लोक का जप करने से पितृ दोष शांत होता है और कुल में सुख-शांति व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

भय और अनिश्चितता का नाश

मृत्यु और न्याय के देवता यमराज को ईश्वर का ही रूप मानने से मृत्यु का स्वाभाविक भय समाप्त होता है और जीवन का सत्य स्वीकार होता है।

दिव्य दृष्टि और सर्वव्यापकता का ज्ञान

साधक में यह समझ विकसित होती है कि संसार की हर महान शक्ति किसी अन्य की नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की ही ऊर्जा का विस्तार है।

आत्म-अनुशासन और संयम की वृद्धि

'संयमतामहम्' शब्द का चिंतन व्यक्ति को जीवन में नैतिक अनुशासन, संयम और कर्तव्यपरायण बनने की प्रेरणा देता है।

परम भक्ति और शरणागति

भगवान की विभूतियों के निरंतर स्मरण से मन में अहैतुकी भक्ति और उनके चरणों में पूर्ण शरणागति का भाव उत्पन्न होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ संस्कृत विद्वानों, वैदिक आचार्यों और सनातन धर्म के शोधकर्ताओं की देखरेख में तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के मूल वल्लभाचार्य, शंकराचार्य तथा स्वामी रामानुजाचार्य के भाष्यों के आधार पर इस श्लोक के शब्दों का प्रामाणिक अर्थ निकाला गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और पुराणों का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी ज्ञान पहुँचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी सनातन संस्कृति की गहरी जड़ें मजबूत बनी रहें। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक गुरुजनों और प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन की संस्तुति की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर अपनी असीम और अनंत शक्तियों (विभूतियों) का वर्णन किया है। चूंकि इस अध्याय में यह बताया गया है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड की श्रेष्ठ, शक्तिशाली और सुंदर वस्तुएं व शक्तियां भगवान की ही विभूतियां हैं, इसलिए इस अध्याय का नाम 'विभूतियोग' रखा गया है।

उत्तर: इस श्लोक में 'अनंत' शब्द शेषनाग (या अनंत नाग) के लिए प्रयुक्त हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शेषनाग भगवान विष्णु के प्रिय सेवक और शैया हैं, जिन्होंने अपनी फनों पर इस विशाल पृथ्वी को धारण कर रखा है। वे अचल स्थिरता, अनंत काल और अमोघ शक्ति के प्रतीक हैं।

उत्तर: अर्यमा वैदिक देवताओं (आदित्यों) में से एक हैं और उन्हें पितृलोक का मुख्य शासक माना जाता है। अर्यमा का संबंध मित्रता, परंपरा, पारिवारिक दायित्वों और पूर्वजों से है। वे इस बात के प्रतीक हैं कि हमारे पूर्वजों का अनुशासन और आशीर्वाद भी भगवान का ही एक रूप है।

उत्तर: धर्मराज यम न्याय, अनुशासन, काल और कर्मफल के सख्त नियंत्रक हैं। वे इस संसार में नियमों और अनुशासन (संयम) का पालन करवाते हैं। गलत कार्य करने वालों को दंड देना और सही न्याय करना उनका कार्य है, इसलिए अनुशासन और न्याय की सर्वोच्च शक्ति के रूप में उन्हें भगवान का स्वरूप बताया गया है।

उत्तर: इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से व्यक्ति को यह बोध होता है कि प्रकृति और न्याय की हर बड़ी शक्ति के पीछे दिव्य नियंत्रण है। इससे मन में भय समाप्त होता है, अनुशासन की भावना जागृत होती है, और साधक हर परिस्थिति में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हुए मानसिक शांति प्राप्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "नागों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में मैं वरुण हूँ, पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और नियन्ताओं में मैं यम हूँ।"

The Lord identifies with the presiding deities of various realms — the cosmic serpent who supports the universe, the lord of waters, the chief of ancestors, and the dispenser of justice after death.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 29 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 29/42 69% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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