श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 27

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 42 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् | ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् || २७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
उच्चैःश्रवसम्
उच्चैःश्रवा
अश्वानाम्
घोड़ों में
विद्धि
जानो
माम्
मुझे
अमृत-उद्भवम्
अमृत से उत्पन्न
ऐरावतम्
ऐरावत
गज-इन्द्राणाम्
श्रेष्ठ हाथियों में
नराणाम्
मनुष्यों में
च
और
नर-अधिपम्
राजा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

घोड़ों में मुझे अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा जानो, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय 'विभूतियोग' का यह परम पवित्र श्लोक भगवान श्रीकृष्ण की अनंत ऐश्वर्य, परम विभूतियों और संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी सर्वव्यापकता का अत्यंत मनोहारी और दार्शनिक उद्घोष करता है।

सनातन धर्म और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में 'विभूतियोग' का विशेष स्थान है। इस अध्याय में अर्जुन के बार-बार अनुरोध करने पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी उन विशिष्ट, अद्भुत और अलौकिक विभूतियों का वर्णन करते हैं, जिनके माध्यम से उनकी असीम शक्ति, सौंदर्य, श्रेष्ठता और दिव्यता का साक्षात्कार इस चराचर जगत में होता है। सामान्य मानव बुद्धि के लिए यह समझ पाना अत्यंत कठिन है कि निराकार और सर्वव्यापी परमात्मा इस साकार संसार में किस प्रकार अपनी ऊर्जा का विस्तार किए हुए हैं। इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए, जगतगुरु श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि सृष्टि की प्रत्येक उत्कृष्ट, श्रेष्ठ, तेजस्वी, बलवान और पवित्र वस्तु या जीव में जो आकर्षण और महानता दिखाई देती है, वह वस्तुतः किसी अन्य की नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण की ही विभूति का प्रत्यक्ष प्राकट्य है।

प्रस्तुत श्लोक में भगवान ने तीन प्रमुख प्रतीकों—अश्वों (घोड़ों) में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा (नराधिप)—के माध्यम से यह सत्य स्थापित किया है कि श्रेष्ठता का मानदंड और उसका मूल उद्गम केवल और केवल परमात्मा ही है। जब एक साधक इस तथ्य को अपने अंतःकरण में उतार लेता है, तब उसे संसार के हर कण में भगवान के दर्शन होने लगते हैं। यह श्लोक न केवल दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत प्रगाढ़ है, बल्कि यह मनुष्य के मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए एक अचूक मार्गदर्शिका भी है, जो भौतिकता से ऊपर उठकर साधक को दिव्यता की ओर अग्रसर करती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥

अध्याय १०, श्लोक २७ - श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीकृष्णार्जुनसंवाद)

श्लोक उच्चारण की विधि:

इस श्लोक का पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'उच्चैःश्रवसम्' बोलते समय विसर्ग का स्पष्ट उच्चारण करें। 'अमृतेद्भवम्' को 'अमृत-उद्भवम्' के रूप में समझें। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन पर बैठकर इस श्लोक का कम से कम 11 या 108 बार मानसिक जप करना चाहिए।

श्लोक का सरल हिंदी अनुवाद:

हे अर्जुन! घोड़ों में अमृत से उत्पन्न होने वाले उच्चैःश्रवा घोड़े को, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत हाथी को और मनुष्यों में राजा (नराधिप) को तू मेरी ही विभूति यानी मेरा ही स्वरूप जान। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो भी अपनी जाति या वर्ग में सर्वोच्च, अजेय और विशिष्ट है, वह सब मेरी ही अनंत ऊर्जा का प्रतीक है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। यहाँ इस श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक, सरल और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
उच्चैःश्रवसम् (उच्चैःश्रवसम्) उच्चैःश्रवा नामक दिव्य घोड़ा यह चंचल मन और उसकी तीव्र गति का प्रतीक है, जो नियंत्रण में आने पर साधक को ऊँचाइयों तक ले जाता है।
अश्वानाम् (अश्वानाम्) सभी घोड़ों में घोड़ा ऊर्जा, वेग, और पुरुषार्थ का घोतक है; समस्त गतिकी ऊर्जा का मूल स्रोत परमात्मा ही है।
विद्धि (विद्धि) तू जान, समझ ले ज्ञान चक्षुओं को खोलकर संसार के हर श्रेष्ठ रूप में परमेश्वर की उपस्थिति का बोध करने का निर्देश।
माम् (माम्) मुझको (श्रीकृष्ण को) अहंकार का त्याग कर समस्त श्रेष्ठता के केंद्र बिंदु में केवल और केवल भगवान वासुदेव को देखना।
अमृतोद्भवम् (अमृतोद्भवम्) अमृत मंथन से उत्पन्न जो अमरता, दिव्यता और पवित्रता का प्रतीक है; भौतिकता से परे आध्यात्मिक चेतना का जागरण।
ऐरावतं (ऐरावतं) ऐरावत हाथी इंद्र का वाहन, जो अचल शक्ति, धैर्य, महिमा और बादलों के समान वृष्टि (कृपा) करने वाला है।
गजेन्द्राणाम् (गजेन्द्राणाम्) श्रेष्ठ हाथियों में विशालता, स्थिरता और अंतःकरण की भारी-भरकम विद्वत्ता व गंभीरता का सर्वोत्तम उदाहरण।
नराणाम् (नराणाम्) समस्त मनुष्यों में मानव योनि को सभी योनियों में कर्म योनि होने के कारण सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
च (च) और समग्रता का बोधक, जो पशु-पक्षियों के बाद मानव समाज और उसके संचालन को जोड़ता है।
नराधिपम् (नराधिपम्) राजा या शासक को धर्म की रक्षा, न्याय और समाज के सुव्यवस्थित संचालन का भार उठाने वाले नेतृत्व का प्रतीक।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक में जिन तीन विशेष विभूतियों—उच्चैःश्रवा, ऐरावत और नराधिप (राजा)—का उल्लेख किया गया है, उनका सीधा संबंध भारतीय पुराणों की अत्यंत प्रसिद्ध और महामंथन कथा—'समुद्र मंथन' (क्षीरसागर मंथन) से है। श्रीमद्भागवत महापुराण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में इस महान घटना का विस्तृत वर्णन मिलता है।

क्षीरसागर मंथन और उच्चैःश्रवा तथा ऐरावत का प्राकट्य

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण देवराज इंद्र और समस्त देवता श्रीहीन हो गए थे। तब दैत्यराज बलि के नेतृत्व में असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। इस संकट से उबरने के लिए भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर (दूध के समुद्र) का मंथन करने का निर्णय लिया। मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। जब इस महान मंथन की प्रक्रिया आरंभ हुई, तो क्षीरसागर के गर्भ से चौदह मूल्यवान रत्न और दिव्य वस्तुएं प्रकट हुईं।

इसी क्रम में, सात मुखों वाला दैदीप्यमान, श्वेत वर्ण का परम तेजस्वी अश्व 'उच्चैःश्रवा' प्रकट हुआ, जिसे उसकी असीम गति और सुंदरता के कारण सभी घोड़ों में सर्वश्रेष्ठ माना गया। इसके तुरंत पश्चात, देवराज इंद्र का दिव्य वाहन, श्वेत पर्वतों के समान विशाल और चार दांतों वाला गजराज 'ऐरावत' प्रकट हुआ, जो हाथियों में सर्वोच्च शक्ति और ऐश्वर्य का प्रतीक बना। भगवान श्रीकृष्ण ने इन दोनों का उल्लेख करके यह सिद्ध किया कि संसार के जितने भी उत्कृष्ट, दुर्लभ और दिव्य रत्न या जीव हैं, वे सब मेरी ही शक्ति के चमत्कार हैं।

मानव समाज में राजा (नराधिप) का दार्शनिक महत्व

श्लोक के उत्तरार्ध में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'नराणां च नराधिपम्' यानी मनुष्यों में राजा (शासक) मेरा स्वरूप है। प्राचीन वेदों और धर्मशास्त्रों (विशेषकर मनुस्मृति और महाभारत के शांतिपर्व) के अनुसार, राजा या शासक केवल एक व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह समाज में धर्म, नीति, न्याय और व्यवस्था को बनाए रखने वाला दैवीय प्रतिनिधि है। अराजकता और भय के साम्राज्य को समाप्त कर प्रजा की रक्षा करना राजा का सर्वोच्च धर्म है। चूंकि समाज का संचालन सर्वोच्च प्रशासनिक और नैतिक शक्ति के बिना असंभव है, इसलिए भगवान ने मानव जाति में राजा या नेतृत्वकर्ता को अपनी ही प्रत्यक्ष विभूति बताया है, जो कर्तव्यनिष्ठा और न्यायपरायणता का प्रतीक है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पवित्र श्लोक का नियमित स्मरण, पाठ और इसके अर्थ पर मनन करने से साधक को अनेकों मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और एकाग्रता

अश्व (उच्चैःश्रवा) को मन की चंचलता का प्रतीक माना गया है। इस श्लोक का स्मरण करने से मन की उथल-पुथल शांत होती है और ध्यान में गहरी एकाग्रता प्राप्त होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

दिव्य विभूतियों के स्मरण से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

3. कर्म शुद्धि और कर्तव्यबोध

मनुष्यों में राजा (नेतृत्वकर्ता) का उल्लेख होने से यह श्लोक व्यक्ति को अपने जीवन में उत्तरदायित्व निभाने, न्यायप्रिय बनने और श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है।

4. सर्वव्यापकता का अद्भूत अनुभव

साधक इस संसार की हर सुंदर, महान और शक्तिशाली वस्तु में भगवान के दर्शन करना सीख जाता है, जिससे उसका द्वैतभाव और अहंकार समाप्त हो जाता है।

5. भय, चिंता और हीन भावना का नाश

जब यह विश्वास पक्का हो जाता है कि सब कुछ भगवान का ही स्वरूप है, तब जीवन के बड़े-बड़े संकट और चुनौतियां तिनके के समान प्रतीत होने लगती हैं।

6. नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक कौशल

'नराधिपम्' शब्द के प्रभाव से शासकों, प्रबंधकों और लीडर्स में सही निर्णय लेने की क्षमता, धैर्य और निष्पक्ष न्याय करने के गुण विकसित होते हैं।

7. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान श्रीकृष्ण की इस पावन विभूति कथा का अध्ययन करने से पूर्व जन्मों के संचित नकारात्मक कर्मों के प्रभाव में कमी आती है और सत्कर्मों में रुचि बढ़ती है।

8. भगवद् प्राप्ति और भक्ति का मार्ग

यह श्लोक भक्त को भगवान के ऐश्वर्य रूप से परिचित कराता है, जिससे अनन्य भक्ति, समर्पण और भगवान के प्रति अगाध प्रेम स्वतः उत्पन्न होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in के उच्च अध्ययन और शोध मंच के अंतर्गत, यह लेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत महापुराण, और महाभारत के आदि पर्व व शांति पर्व—के गहन अध्ययन के उपरांत तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और शास्त्रीय सामग्री पहुंचे, वह पूर्णतः शुद्ध, व्याकरण की दृष्टि से परिष्कृत और प्रामाणिक परंपराओं पर आधारित हो।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: इस आलेख को प्रस्तुत करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि आधुनिक जीवनशैली से जुड़े पाठकों के लिए संस्कृत के गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को अत्यंत सरल, सुबोध और व्यावहारिक हिंदी में प्रस्तुत किया जाए, ताकि वे अपनी व्यस्त दिनचर्या में भी सनातन संस्कृति के इस अमूल्य ज्ञान को आत्मसात कर सकें। किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचते हुए, शास्त्रों में वर्णित यथार्थ और तार्किक दर्शन को ही प्राथमिकता दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर अपनी उन विशेष, अलौकिक और महान विभूतियों (ऐश्वर्य और शक्तियों) का विस्तार से वर्णन किया है जिनके माध्यम से संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी उपस्थिति का अहसास होता है। यह अध्याय साधक को यह सिखाता है कि इस संसार की समस्त श्रेष्ठता और दिव्यता का मूल स्रोत केवल परमेश्वर ही हैं।

उत्तर: नहीं, उच्चैःश्रवा कोई साधारण घोड़ा नहीं है। यह समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर से उत्पन्न हुआ एक दिव्य, सात मुखों वाला और श्वेत वर्ण का परम तेजस्वी अश्व था, जिसे देवताओं के राजा इंद्र ने अपने पास रखा था। इसकी गति और असीम ऊर्जा अलौकिक थी, इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने घोड़ों में इसे अपनी श्रेष्ठ विभूति बताया है।

उत्तर: सनातन वैदिक संस्कृति में राजा या शासक को 'नराधिप' (मनुष्यों का स्वामी) कहा गया है जो धर्म, न्याय, कानून और समाज की रक्षा का सर्वोच्च उत्तरदायित्व निभाता है। समाज के सुचारू संचालन और अराजकता को रोकने के लिए नेतृत्व की शक्ति अत्यंत आवश्यक है। इसी प्रबंधकीय और प्रशासनिक सर्वोच्चता के कारण भगवान ने मानव समाज में न्यायप्रिय राजा को अपनी विभूति माना है।

उत्तर: आप प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा के समय इस श्लोक का पाठ कर सकते हैं। इसके साथ ही, जब भी आप जीवन में किसी महान, उत्कृष्ट या सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण वस्तु या व्यक्ति को देखें, तो यह स्मरण करें कि यह सब भगवान श्रीकृष्ण की ही शक्ति का विस्तार है। इससे आपके भीतर विनम्रता, सकारात्मकता और ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम का भाव जागृत होगा।

उत्तर: ऐरावत हाथी भी समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर से प्रकट होने वाले चौदह रत्नों में से एक था। श्वेत पर्वतों के समान भव्य और चार शक्तिशाली दांतों वाला यह गजराज देवराज इंद्र का प्रमुख वाहन बना। यह अचल शक्ति, धैर्य, गरिमा और बादलों के समान सब पर कृपा बरसाने का प्रतीक है, इसीलिए हाथियों में इसे सर्वश्रेष्ठ (गजेन्द्राणां) माना गया है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "घोड़ों में मुझे अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा जानो, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा जानो।"

The Lord identifies with the noblest and most powerful representatives — the celestial horse born of nectar, the divine elephant, and the human ruler who maintains order and justice.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/42 64% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!