श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 23

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 37 मिनट का पठन 111 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् | वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् || २३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
रुद्राणाम्
रुद्रों में
शङ्कर
शंकर
च
और
अस्मि
हूँ
वित्तेश
कुबेर
यक्ष-रक्षसाम्
यक्ष और राक्षसों में
वसूनाम्
वसुओं में
पावक
अग्नि
च
और
अस्मि
हूँ
मेरु
मेरु
शिखरिणाम्
पर्वतों में
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्ष और राक्षसों में मैं कुबेर (वित्तेश) हूँ, वसुओं में मैं पावक (अग्नि) हूँ, और पर्वतों में मैं मेरु हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म, वेद, पुराण और विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण के उपदेश मानव जाति के लिए केवल दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भौतिक जीवन और पारमार्थिक उन्नति का अचूक मार्गदर्शक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय का नाम 'विभूति योग' है। इस अध्याय में अर्जुन के जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों का उत्तर देते हुए योगेश्वर श्री कृष्ण अपनी अगाध, अनंत और ब्रह्मांडीय शक्तियों (विभूतियों) का परिचय देते हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु, महानता, ऊर्जा और चमत्कारिक आकर्षण में भगवान का ही अंश विद्यमान है, इस सत्य को स्थापित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में सृष्टि के अत्यंत प्रतिष्ठित, शक्तिशाली और पूजनीय स्वरूपों के साथ अपनी अनन्य एकता को प्रकट किया है।

'रुद्राणां शङ्करश्चास्मि...' यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय पदानुक्रम (Cosmic Hierarchy) की उस सर्वोच्च सत्ता का उद्घोष है जो संपूर्ण चराचर जगत को संचालित करती है। एकादश रुद्रों में भगवान शंकर का होना, यक्ष और रक्षों के बीच कुबेर का आधिपत्य, अष्टवसुओं में पावक (अग्नि) की ऊर्जा और समस्त पर्वतों में मेरु पर्वत की स्थिरता—यह सब इस बात का प्रमाण है कि जगत की प्रत्येक महान विभूति में साक्षात् परमब्रह्म श्री कृष्ण का ही तेज चमक रहा है। भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक कथाओं और दैनिक साधना में इसके महत्व का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भगवद्गीता दशमोऽध्यायः (विभूति योग) — श्लोक २३

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥


श्लोक का सरल संस्कृत उच्चारण:

Rudrāṇāṁ Śaṅkaraśh cāsmi vitteśho yakṣha-rakṣhasām |
Vasūnāṁ pāvakaśh cāsmi meruḥ śikhariṇām aham || 23 ||

पाठ विधि एवं साधना निर्देश:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान के पश्चात पवित्र मन से करना चाहिए। भगवान विष्णु या शिव के विग्रह के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर एकाग्र चित्त से इस श्लोक का 108 बार जप करने से साधक के भीतर साहस, तेज, और मानसिक स्थिरता का संचार होता है। यह श्लोक अहंकार के शमन और सर्वव्यापक ईश्वर दर्शन के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में वेदों का सार छिपा है। आइए इस श्लोक के एक-एक पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
रुद्राणाम् (Rudrāṇām) एकादश (ग्यारह) रुद्रों में से रुद्र भगवान शिव के वे रूप हैं जो प्रलय और संहार के देवता हैं, जो जीवन के समस्त दुखों को रुलाकर समाप्त करते हैं।
शङ्करः (Śaṅkaraḥ) भगवान शंकर (शिव) जो कल्याण करते हैं (शं करोति इति शङ्करः)। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को रुद्रों में सर्वोच्च संहारक व कल्याणकारी शिव के रूप में स्थापित करते हैं।
च अस्मि (Cha + Asmi) और हूँ यह निरंतरता और वर्तमान अस्तित्व को दर्शाता है, यानी यह केवल अतीत या भविष्य नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य है।
वित्तेशः (Vitteśaḥ) कुबेर (धन के स्वामी) यक्षों और राक्षसों के राजा, जो ब्रह्मांडीय धन और ऐश्वर्य के संरक्षक हैं।
यक्षरक्षसाम् (Yakṣha-rakṣhasām) यक्षों और राक्षसों में प्राणियों की वह योनि जो अत्यधिक भौतिक शक्ति, धन या तामसिक वृत्तियों से जुड़ी हैं, उनमें भी नियंत्रण और श्रेष्ठता का आधार ईश्वर ही है।
वसूनाम् (Vasūnām) आठ वसुओं में से प्रकृति के आठ मूल तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र) जो जगत के निर्माण आधार हैं।
पावकः (Pāvakaḥ) अग्नि देव (पावक) पवित्र करने वाला, ऊर्जा और तेज का प्रतीक जो समस्त यज्ञादि कर्मों को देवताओं तक पहुँचाता है।
मेरुः (Meruḥ) सुमेरु पर्वत समस्त भूगोल और पुराणों के केंद्र में स्थित वह जादुई और अडिग पर्वत जो ब्रह्मांडीय धुरी (Axis Mundi) माना जाता है।
शिखरिणाम् (Śikhariṇām) पर्वतों (शिखरों वाले) में विशालता, दृढ़ता और अडिगता के प्रतीक सभी पर्वतों में।
अहम् (Aham) मैं (स्वयं श्रीकृष्ण) अहंकार का बोध नहीं, बल्कि उस परम चेतना का सूचक जो संपूर्णता का मूल उद्गम है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक के भीतर निहित संदर्भों को समझने के लिए हमें हिंदू पुराणों, विशेष रूप से महाभारत के भीष्म पर्व, शिव महापुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और वाल्मीकि रामायण की कथाओं का स्मरण करना होगा। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने अपने स्वजनों को सामने देखकर हथियार डाल दिए और विषाद से घिर गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मज्ञान देने के लिए गीता का यह अमर ग्रंथ प्रदान किया। अर्जुन के मन में यह प्रश्न उठा कि वह किस प्रकार भगवान का स्मरण करे, क्योंकि सर्वव्यापक ईश्वर को देखना या समझना साधारण मानव के लिए असंभव है।

इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति योग के माध्यम से अर्जुन को समझाया कि उसे संपूर्ण ब्रह्मांड में भटकने की आवश्यकता नहीं है। संसार की हर वस्तु में जो उत्कृष्टता, शक्ति, सौंदर्य और प्रभाव दिखाई देता है, वह भगवान की ही विभूति है।

१. एकादश रुद्र और शंकर: हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कश्यप और अदिति के पुत्र या ब्रह्माजी के क्रोध से उत्पन्न ग्यारह रुद्र (अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा, रुद्र, हर, शंभु, त्र्यम्बक, अपराजिता, ईश्वर और वृषकापि) इस सृष्टि के संहारक और ऊर्जा के स्रोत हैं। इन सभी रुद्रों में भगवान शिव (शंकर) सर्वोच्च हैं, जो महाकाल भी हैं और आशुतोष भी। श्रीकृष्ण का स्वयं को रुद्रों में शंकर बताना यह सिद्ध करता है कि विष्णु और शिव में कोई तात्विक भेद नहीं है; दोनों एक ही परम सत्य के दो रूप हैं।

२. यक्ष-राक्षस और कुबेर: कुबेर ऋषि विश्रवा के पुत्र और रावण के सौतेले भाई हैं, जिन्होंने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर धन के आधिपत्य और उत्तर दिशा के लोकपाल का पद प्राप्त किया। यक्ष और राक्षस दोनों ही अर्धदिव्य योनियाँ हैं जिनमें अपार भौतिक शक्ति और धन-संपदा होती है। इन सबकी शक्ति के मूल में भगवान की ही शक्ति कार्य कर रही है।

३. अष्टवसु और पावक: प्रकृति के निर्माण में अष्टवसुओं (आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास) का महत्वपूर्ण योगदान है। इनमें 'अनल' या 'पावक' अग्नि देव हैं, जो हर यज्ञ की प्राण-ऊर्जा हैं। अग्नि के बिना जीवन की कल्पना असंभव है, अतः ऊर्जा का यह प्रचंड स्रोत साक्षात् भगवान का ही विग्रह है।

४. मेरु पर्वत: पौराणिक भूगोल के अनुसार सुमेरु पर्वत देवताओं का निवास स्थान और ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु है। वह अपने स्थान पर अटल, अचल और अडिग रहता है। पर्वतों की विशालता और दृढ़ता साधक को यह सिखाती है कि चाहे कितनी भी आंधियां आएं, मनुष्य को अपने धर्म और सत्य पर मेरु पर्वत की भांति अडिग रहना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पवित्र श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का स्मरण करने से साधक को अलौकिक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक शांति एवं एकाग्रता

श्लोक में वर्णित मेरु पर्वत की स्थिरता की तरह साधक का मन भी विचलित होना बंद हो जाता है और जीवन की कठिनाइयों में भी मानसिक संतुलन बना रहता है.

सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

अग्नि (पावक) और शिव (शंकर) के स्वरूपों का स्मरण करने से शरीर और चेतना में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे नकारात्मक विचार दूर होते हैं.

कर्मों की शुद्धि और पवित्रता

अग्नि देव की भांति यह श्लोक मनुष्य के आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को जलाकर उसके कर्मों को पवित्र और निष्काम बनाने में सहायता करता है.

अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि संसार की हर महानता और शक्ति के पीछे भगवान का ही बल है, तो उसके भीतर का झूठा अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है.

दैवीय कृपा और सुरक्षा की अनुभूति

भगवान कुबेर और शंकर के स्मरण से जीवन में आर्थिक स्थिरता और आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का अनुभव होता है, जिससे भय का नाश होता है.

सर्वव्यापक ईश्वर दर्शन की दृष्टि

यह श्लोक साधक की दृष्टि को बदलकर उसे हर प्राणी और प्रकृति के कण-कण में परमात्मा के दर्शन करने की दिव्य दृष्टि प्रदान करता है.

भय, चिंता और अवसाद से मुक्ति

महाकाल रुद्र और अडिग मेरु का ध्यान करने से मृत्यु का भय और भविष्य की चिंताएं समाप्त हो जाती हैं, जिससे जीवन आनंदमय बनता है.

आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त

विभूति योग के इन श्लोकों का नियमित पठन व्यक्ति को मोक्ष और भक्ति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ाता है.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorial Note): भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के तत्वावधान में प्रस्तुत यह आलेख शास्त्रीय ग्रंथों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (भीष्म पर्व), विभिन्न प्राचीन टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी की गीता प्रवचन) तथा सनातन पौराणिक साहित्यों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी तक वेदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, स्पष्ट और प्रामाणिक हिंदी भाषा में पहुँचाना है।

इस आलेख में प्रस्तुत प्रत्येक शब्दार्थ और पौराणिक पृष्ठभूमि को सनातन धर्म की परंपराओं के अनुरूप परखा गया है ताकि पाठकों को आध्यात्मिक संतुष्टि के साथ-साथ बौद्धिक स्पष्टता भी प्राप्त हो सके। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक आचार्यों और प्रामाणिक टीका ग्रंथों का संबल लेने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय (विभूति योग) का २३वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी अनंत विभूतियों और ब्रह्मांडीय शक्तियों के बारे में विस्तार से बताया है।

सनातन धर्म में भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) और भगवान शिव (शंकर) एक ही परम परमात्मा के दो अलग-अलग पहलू हैं। रुद्रों की संख्या ग्यारह है, जिनमें भगवान शंकर उनके स्वामी और सबसे शक्तिशाली संहारक व कल्याणकारी स्वरूप हैं। यह कथन अद्वैत वेदांत के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जहाँ संपूर्ण देवगण एक ही परम चेतना के अंतर्गत समाहित हैं।

कुबेर यक्ष और राक्षसों के बीच धन-संपदा, ऐश्वर्य और उत्तर दिशा के संरक्षक हैं। यद्यपि यक्ष और राक्षस योनि में तामसिक और भौतिक प्रवृत्तियों का प्राबल्य होता है, तथापि कुबेर अपनी साधना, धर्मपरायणता और शिव भक्ति के कारण उनके बीच सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। उनकी यह श्रेष्ठता और समृद्धि भी भगवान श्रीकृष्ण की ही ऊर्जा का विस्तार है।

इस श्लोक का नियमित जाप करने से साधक के भीतर मेरु पर्वत जैसी मानसिक स्थिरता और अग्नि (पावक) जैसी तेजस्विता उत्पन्न होती है। यह भय, तनाव और अहंकार को दूर कर व्यक्ति को जीवन की हर परिस्थिति में अडिग रहने की मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

इस पंक्ति का दार्शनिक अर्थ यह है कि संसार के तमाम पर्वतों और शिखरों में जो विशालता, दृढ़ता और अडिगता दिखाई देती है, वह वस्तुतः परमात्मा की अचल सत्ता का प्रतीक है। साधक को भी अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों और सत्यों पर उसी मेरु पर्वत की भांति अडिग रहना चाहिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्ष और राक्षसों में मैं कुबेर हूँ, वसुओं में मैं पावक (अग्नि) हूँ, और पर्वतों में मैं मेरु हूँ।"

The Lord identifies Himself with the presiding deities of various cosmic functions and the most majestic mountain, showing His presence in all levels of creation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/42 55% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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