श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 24

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 37 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् | सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः || २४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
पुरोधसाम्
पुरोहितों में
च
और
मुख्यम्
मुख्य
माम्
मुझे
विद्धि
जानो
पार्थ
हे पार्थ
बृहस्पतिम्
बृहस्पति
सेनानीनाम्
सेनापतियों में
अहम्
मैं
स्कन्द
कार्तिकेय
सरसाम्
जलाशयों में
अस्मि
हूँ
सागर
सागर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! पुरोहितों में मुझे मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो; सेनापतियों में मैं स्कन्द (कार्तिकेय) हूँ, और जलाशयों में मैं सागर हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का अद्वितीय स्थान है। यह ग्रंथ केवल मोक्ष का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता, अनुशासन और कर्तव्य-परायणता का पाठ पढ़ाता है। गीता के दसवें अध्याय का नाम 'विभूतियोग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने परम ऐश्वर्य, अनंत विभूतियों और इस संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त अपनी अचिंत्य शक्तियों का विस्तार से परिचय देते हैं। अर्जुन के बार-बार यह पूछने पर कि हे केशव! मैं किन-किन रूपों में आपका निरंतर स्मरण करूँ, भगवान श्रीकृष्ण अपनी उन विशिष्ट और श्रेष्ठ विभूतियों को प्रकट करते हैं जो संसार में सर्वोच्चता, नेतृत्व, ज्ञान और विशालता के प्रतीक हैं।

प्रस्तुत श्लोक—"पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् | सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः || २४||"—इसी विभूतियोग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी स्तंभ है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने तीन अत्यंत प्रभावशाली क्षेत्रों—आध्यात्मिक व बौद्धिक नेतृत्व (पुरोहित), सैन्य शक्ति व पराक्रम (सेनापति), और विशाल प्राकृतिक जलराशि (समुद्र)—में अपनी सर्वोच्च उपस्थिति दर्ज कराई है। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि इस संसार में जो भी बुद्धि, तेज, शक्ति और अनंतता दिखाई देती है, वह वस्तुतः परमात्मा का ही प्रत्यक्ष प्राकट्य है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस समर्पित मंच पर हम वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को आधुनिक पाठकों के लिए सुलभ बना रहे हैं। यह मार्गदर्शिका इस श्लोक के गूढ़ रहaches, व्याकरणिक संरचना, पौराणिक कथाओं और मानसिक-आध्यात्मिक लाभों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है, ताकि आप अपने दैनिक जीवन में गीता के इन पावन वचनों को आत्मसात कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्คา
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥


(श्रीमद्भागवतगीता, अध्याय १०, श्लोक २४)

पाठ विधि एवं अनुष्ठानिक निर्देश:
  • प्रातः काल ब्रह्म बेला में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • भगवान श्री कृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) जप मानसिक शांति और नेतृत्व क्षमता की वृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • पाठ के अंत में भगवान को मिश्री और तुलसी दल का भोग लगाएं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अगाध दार्शनिक अर्थ छिपा है। आइए, इसका विस्तृत विश्लेषण तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
पुरोधसाम् पुरोहितों में, राजगुरुओं में समस्त धार्मिक, अनुष्ठानिक और वैचारिक मार्गदर्शन प्रदान करने वाले आचार्यों का वर्ग।
च और विभूतियों की श्रृंखला को आगे जोड़ने वाला संयोजक अव्यय।
मुख्यम् मुख्य, श्रेष्ठ, प्रधान जो अपने गुण, कर्म और स्वभाव में सर्वोच्च स्थान रखता हो।
माम् मुझको सर्वोच्च परब्रह्म, वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त श्रेष्ठताओं का उद्गम बता रहे हैं।
विद्धि जानो, पहचानो साधक को यह निर्देश है कि वह भौतिकता से ऊपर उठकर इस सत्य को अनुभव करे।
पार्थ हे पृथा (कुंती) के पुत्र अर्जुन अर्जुन को उनके मूल संबंध और पराक्रमी पृष्ठभूमि का स्मरण कराते हुए संबोधन।
बृहस्पतिम् देवगुरु बृहस्पति देवताओं के पुरोहित, जो असीम ज्ञान, बुद्धि, नीति और वाणी के अधिष्ठाता हैं।
सेनानीनाम् सेनापतियों में, सेना के कमांडरों में युद्ध कौशल, रणनीति और सैन्य संचालन में निपुण नेतृत्वकर्ता।
अहम् मैं (स्वयं) परमात्मा की सर्वव्यापकता और अहंकार का आध्यात्मिक निरूपण (ईश्वरीय सत्ता)।
स्कन्दः स्कन्द (कार्तिकेय, मुरुगन) देव सेना के महासेनापति, जो अजेय शक्ति, तेज और शौर्य के प्रतीक हैं।
सरसाम् जलाशयों में, सरोवरों और जलसमूहों में पृथ्वी पर जल के विभिन्न स्रोतों और संचय स्थानों में।
अस्मि हूँ वर्तमान काल में परमेश्वर की शाश्वत उपस्थिति का द्योतक।
सागरः समुद्र, महासागर अथांग गहराई, विशालता, स्थिरता और रत्नों की खानस्वरूप जलराशि।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक में जिन तीन महाविभूतियों—बृहस्पति, स्कन्द (कार्तिकेय) और सागर—का उल्लेख किया गया है, वे भारतीय सनातन साहित्य, वेदों, पुराणों और महाकाव्यों के केंद्र में हैं। इन पात्रों और तत्वों का चयन अत्यंत सोच-समझकर किया गया है, जो मानव जीवन के तीन सबसे बड़े आयामों—ज्ञान (बुद्धि), शक्ति (पराक्रम) और अनंतता (विशालता)—का प्रतिनिधित्व करते हैं।

1. देवगुरु बृहस्पति: ज्ञान और मंत्र शक्ति के प्रतीक

पौराणिक कथाओं के अनुसार, बृहस्पति ऋषि अंगिरा के पुत्र हैं और देवताओं के पुरोहित (राजगुरु) हैं। वे न्याय, बुद्धि, धर्म और वृहस्पति नीति के प्रणेता माने जाते हैं। जब-जब देवताओं पर कोई संकट आया, तब-तब बृहस्पति ने अपनी अमोघ बुद्धि और वेदों के ज्ञान से उनका मार्गदर्शन किया। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को पुरोहितों में बृहस्पति बताकर यह स्पष्ट करते हैं कि संसार में जितनी भी बौद्धिक चमक, कूटनीति, वेदों का ज्ञान और सही मार्गदर्शन उपलब्ध है, वह सब उन्हीं की चेतना का विस्तार है।

2. भगवान स्कन्द (कार्तिकेय): अजेय पराक्रम और सैन्य नेतृत्व

स्कन्द को कार्तिकेय, मुरुगन और सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि उनका प्राकट्य देवताओं की रक्षा और महादैत्य तारकासुर का वध करने के लिए हुआ था। वे देवसेना के महासेनापति हैं। उनका स्वरूप अद्युत तेज, अदम्य साहस और युद्ध कौशल का प्रतीक है। जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि "सेनानियों में मैं स्कन्द हूँ," तो इसका तात्पर्य यह है कि संसार में जितने भी महान सेनापति, कमांडर या लीडर अपने रण कौशल और अनुशासन के लिए जाने जाते हैं, उनका वह शौर्य वास्तव में वासुदेव श्रीकृष्ण का ही बल है।

3. सागर (महासागर): अगाधता और विशालता

जल जीवन का आधार है और पृथ्वी के दो-तिहाई हिस्से पर फैला महासागर अपनी विशालता, स्थिरता और अगाध गहराई के लिए प्रसिद्ध है। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार, सागर के गर्भ से चौदह मूल्यवान रत्न प्रकट हुए थे, जिनमें अमृत, विष, लक्ष्मी और चंद्रमा जैसे दिव्य तत्व शामिल थे। सागर क्षमाशीलता, सहनशीलता और अनंतता का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण ने जलाशयों में स्वयं को सागर बताकर यह दर्शाया है कि वह समस्त जलराशियों के मूल स्रोत हैं और साधक का हृदय भी भगवान की भक्ति में समुद्र के समान ही अगाध व स्थिर होना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस दसवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक का नियमित पठन और मनन करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. बौद्धिक तीक्ष्णता और ज्ञान की प्राप्ति

देवगुरु बृहस्पति के रूप में भगवान के स्मरण से बुद्धि निर्मल होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और निर्णयन क्षमता (Decision Making) में अचूक सुधार होता है।

2. नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक कौशल

स्कन्द (कार्तिकेय) की ऊर्जा से जुड़ने पर प्रबंधकों, नेताओं और सैन्य अधिकारियों में नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

3. मानसिक स्थिरता और शांति

महासागर की तरह विशाल और शांत चित्त की प्राप्ति होती है। जीवन के दुखों और उतार-चढ़ाव से विचलित हुए बिना धैर्य बनाए रखने की शक्ति मिलती है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

इस श्लोक के नियमित पाठ से घर और कार्यस्थल की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है तथा एक दिव्य, सकारात्मक आवरण (Aura) का निर्माण होता है।

5. कर्म शुद्धि और पापकर्मों का नाश

ईश्वरीय विभूतियों के स्मरण मात्र से चित्त की शुद्धि होती है, संचित कर्मों के बंध कटते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

6. आत्मविश्वास और निर्भीकता

जब साधक यह जान लेता है कि संसार की हर श्रेष्ठ शक्ति के पीछे भगवान स्वयं खड़े हैं, तो उसके भीतर का भय समाप्त हो जाता है और अटूट आत्मविश्वास जगता है।

7. वाणी में ओज और प्रभाव

बृहस्पति जी की कृपा से साधक की वाणी में गजब का प्रभाव, सत्यता और मधुरता आती है, जिससे समाज में उसका आदर बढ़ता है।

8. परमेश्वर की अतुष्ट कृपा

विभूतियोग का पाठ करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं और उसे अपनी अनन्य भक्ति का वरदान प्रदान करते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, श्रीमद्भागवतगीता (शंकराचार्य, रामानुज और ज्ञानेश्वरी टीकाओं के संदर्भ सहित), श्रीमद्भागवत महापुराण तथा स्कन्द पुराण के मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन करके संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण, और उसकी पौराणिक पृष्ठभूमि पूरी तरह प्रामाणिक और सनातन परंपरा के अनुकूल हो।

यदि आपके पास इस प्रसंग से जुड़े कोई प्रश्न या सुझाव हैं, तो आप हमारे संपादकीय विभाग से संपर्क कर सकते हैं। हमारा उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी तक सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल, सहज और त्रुटिहीन हिंदी में पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'पुरोधसां' का अर्थ पुरोहितों या राजगुरुओं से है। देवगुरु बृहस्पति समस्त देवताओं के ज्ञान, नीति और धर्म के आचार्य हैं। भगवान श्रीकृष्ण यह दर्शाना चाहते हैं कि समाज में जो भी श्रेष्ठ बौद्धिक मार्गदर्शन और पवित्र ज्ञान देने वाला है, उसकी बौद्धिक क्षमता में प्रत्यक्ष रूप से ईश्वरीय चेतना ही कार्य कर रही है।

स्कन्द (कार्तिकेय) देवताओं की सेना के महासेनापति हैं। वे अजेय पराक्रम, साहस और सैन्य अनुशासन के सर्वोच्च प्रतीक हैं। सेनापतियों में उनका स्थान सबसे ऊपर माना गया है, इसलिए भगवान ने अपने शौर्य और नेतृत्व के विभूति रूप में स्कन्द का नाम लिया है।

समुद्र अपनी विशालता, अगाध गहराई, और अनंत जलराशि के लिए जाना जाता है। पृथ्वी के समस्त जल स्रोतों का अंततः समुद्र में ही विलय होता है। यह इस बात का प्रतीक है कि संपूर्ण ब्रह्मांड और उसकी विविधताएँ अंततः परमात्मा रूपी अनंत महासागर में ही समाहित हैं।

हाँ, अत्यंत उपयोगी है। चूँकि यह श्लोक बुद्धि (बृहस्पति), नेतृत्व व साहस (स्कन्द), और विशालता (सागर) से जुड़ा है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए यह स्मरण शक्ति और ज्ञानवर्धक है, तथा प्रशासनिक अधिकारियों, सैन्य कर्मियों और प्रबंधकों के लिए यह निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व कौशल को सशक्त बनाता है।

विभूतियोग पढ़ने के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम है। स्नान करके शुद्ध आसन पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर गीता का पाठ करें। श्लोकों के अर्थ को समझकर मन में भगवान की सर्वव्यापकता का विचार करें। इससे मानसिक शांति और आत्मिकबल की प्राप्ति होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे पार्थ! पुरोहितों में मुझे मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो; सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ, और जलाशयों में मैं सागर हूँ।"

The Lord identifies with the foremost in each category — the wisest counselor, the mightiest general, and the vastest body of water.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/42 57% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!