बाल काण्ड अध्याय 2

रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन

बाल काण्ड का द्वितीय सर्ग रामायण महाकाव्य के रचना-बीज का अद्भुत वर्णन करता है। नारद जी के जाने के पश्चात् वाल्मीकि जी तमसा नदी के तट पर जाते हैं, जहाँ वे क्रौंच पक्षियों के एक मिथुन को देखते हैं। एक निषाद के बाण से नर पक्षी के वध से व्यथित होकर वाल्मीकि जी के मुख से शाप के रूप में एक श्लोक निकलता है, जो संस्कृत साहित्य का प्रथम श्लोक माना जाता है। इसी श्लोक पर विचार करते हुए जब वे आश्रम लौटते हैं, तब ब्रह्मा जी प्रकट होकर उन्हें रामायण की रचना करने का दिव्य आदेश देते हैं।

विवरण

यह सर्ग रामायण के रचनाकाल एवं उसकी दिव्यता को स्थापित करने वाला है। प्रारम्भ में वाल्मीकि जी नारद जी को विधिवत् पूजा-अर्चना कर विदा करते हैं। नारद जी के देवलोक जाने के पश्चात् वे स्नान के लिए तमसा नदी के तट पर जाते हैं। वहाँ वे अपने शिष्य भरद्वाज को नदी के स्वच्छ जल और निर्मल तट की सुन्दरता का वर्णन करते हैं। स्नान की तैयारी में वे वल्कल वस्त्र लेकर विचर रहे होते हैं कि उनके समीप क्रौंच पक्षियों का एक जोड़ा क्रीड़ा करता हुआ दिखाई देता है। उन्हें देखकर वाल्मीकि जी के हृदय में आनन्द का संचार होता है, किन्तु उसी क्षण एक निर्दयी निषाद अपने बाण से नर क्रौंच का वध कर देता है। खून से लथपथ नर पक्षी को तड़पता देख और उसकी विधवा पत्नी की करुण पुकार सुनकर वाल्मीकि जी का हृदय द्रवित हो जाता है। उनके मुख से अनायास ही एक शाप निकलता है – "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥" अर्थात् हे निषाद, तूने काममोहित क्रौंच पक्षी का वध किया है, इसलिए तुझे शाश्वत प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी। श्लोक के मुख से निकलते ही वाल्मीकि जी स्वयं चकित हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि आखिर यह क्या कह दिया? इसी चिन्तन में वे स्नान कर आश्रम लौटते हैं। तभी वहाँ स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं। वाल्मीकि जी उनकी विधिवत् पूजा करते हैं। ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर कहते हैं कि यह श्लोक उनकी प्रेरणा से ही निकला है। वे वाल्मीकि जी को आदेश देते हैं कि वे नारद से सुनी हुई रामकथा को इसी छन्द में रचें। ब्रह्मा जी वरदान देते हैं कि जब तक पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक यह रामायण इस लोक में अमर रहेगी और इसके रचयिता वाल्मीकि भी अमर लोकों में निवास करेंगे। इस प्रकार इस सर्ग में रामायण की रचना का दिव्य आधार स्थापित होता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ (रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ द्वितीयः सर्गः ॥
(नारद-गमन, क्रौंच-वध, प्रथम श्लोकोद्भव एवं ब्रह्मा का आदेश)

🙏 नारद जी का देवलोक गमन

॥ श्लोक १ ॥
नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारदः ।
पूजयामास धर्मात्मा सह शिष्यो महामुनिः ॥ १-२-१ ॥
पदच्छेदः – नारदस्य = नारद जी का; तु = तो; तत् = वह; वाक्यम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यविशारदः = वाणी में निपुण; धर्मात्मा = धर्मात्मा; महामुनिः = महामुनि (वाल्मीकि); सह शिष्यः = शिष्यों सहित; पूजयामास = पूजन किया।
भावार्थ : वाणी में निपुण, धर्मात्मा महामुनि वाल्मीकि ने नारद जी के उस वचन (पूर्व सर्ग में वर्णित रामकथा) को सुनकर अपने शिष्यों सहित उनका पूजन किया।
व्याख्या : पिछले सर्ग में नारद जी ने संक्षेप रामायण का वर्णन किया था। अब वह कथा सुनने के पश्चात् वाल्मीकि जी नारद जी का आदर-सत्कार करते हैं। यह दर्शाता है कि गुरुजनों और महापुरुषों का सम्मान करना धर्म है।
॥ श्लोक २ ॥
यथावत् पूजितः तेन देवर्षिः नारदः तथा ।
आपृच्छयैवाभ्यनुज्ञातः जगाम विहायसम् ॥ १-२-२ ॥
पदच्छेदः – यथावत् = यथोचित रीति से; पूजितः = पूजित होकर; तेन = उनके द्वारा; देवर्षिः = देवर्षि; नारदः = नारद; तथा = वैसे ही; आपृच्छय = आज्ञा माँगकर; एव = ही; अभ्यनुज्ञातः = अनुमति पाकर; जगाम = गये; विहायसम् = आकाश मार्ग से।
भावार्थ : उनके द्वारा यथोचित रीति से पूजित होकर देवर्षि नारद जी ने जाने की आज्ञा माँगी और अनुमति पाकर आकाश मार्ग से चले गये।
व्याख्या : नारद जी देवर्षि हैं, अतः उनका निवास देवलोक में है। वाल्मीकि से अनुमति लेकर वे अपने लोक को प्रस्थान करते हैं। यहाँ विहायसम् का अर्थ आकाश मार्ग है, जिससे देवताओं का विचरण होता है।

🏞️ तमसा तट पर क्रौंच-मिथुन का दर्शन

॥ श्लोक ३ ॥
स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा ।
जगाम तमसातीरं जाह्नव्याः अविदूरतः ॥ १-२-३ ॥
पदच्छेदः – सः = वह; मुहूर्तम् = मुहूर्त भर में; गते = चले जाने पर; तस्मिन् = उनके; देवलोकम् = देवलोक को; मुनिः = मुनि (वाल्मीकि); तदा = तब; जगाम = गये; तमसातीरम् = तमसा नदी के तट पर; जाह्नव्याः = गंगा से; अविदूरतः = दूर नहीं।
भावार्थ : उनके (नारद के) देवलोक जाने के एक मुहूर्त बाद ही वे मुनि वाल्मीकि गंगा से दूर न होने वाली तमसा नदी के तट पर गये।
॥ श्लोक ४ ॥
स तु तीरं समासाद्य तमसायाः मुनिस्तदा ।
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥ १-२-४ ॥
भावार्थ : तमसा नदी के तट पर पहुँचकर उस समय उस मुनि ने कीचड़-रहित तीर्थ को देखकर अपने पास खड़े शिष्य (भरद्वाज) से कहा।
॥ श्लोक ५ ॥
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय ।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा ॥ १-२-५ ॥
पदच्छेदः – अकर्दमम् = कीचड़ रहित; इदम् = यह; तीर्थम् = तीर्थ; भरद्वाज = हे भरद्वाज; निशामय = देखो; रमणीयम् = रमणीय; प्रसन्नाम्बु = प्रसन्न जल वाला; सन्मनुष्यमनः = सज्जन पुरुष के मन के समान; यथा = जैसे।
भावार्थ : "हे भरद्वाज! इस तीर्थ को देखो, यह कीचड़-रहित, रमणीय एवं प्रसन्न जल से युक्त है, ठीक वैसे ही जैसे सज्जन पुरुष का मन स्वच्छ और निर्मल होता है।"
व्याख्या : वाल्मीकि जी तमसा नदी के जल की स्वच्छता और तट की निर्मलता की तुलना सज्जन के मन से करते हैं। यह उपमा अलंकार का सुन्दर उदाहरण है। सज्जन का मन सदा निर्मल, निष्कपट और पवित्र होता है, वैसे ही यह जल भी स्वच्छ है।
॥ श्लोक ६ ॥
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम ।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ॥ १-२-६ ॥
भावार्थ : "हे तात! कलश (कमण्डलु) यहीं रख दो और मुझे मेरा वल्कल (वस्त्र) दो। मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूँगा।"
॥ श्लोक ७ ॥
एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना ।
प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥ १-२-७ ॥
भावार्थ : महात्मा वाल्मीकि के ऐसा कहने पर भरद्वाज, जो गुरु के प्रति सदा तत्पर रहते थे, ने उन मुनि को वल्कल दे दिया।
॥ श्लोक ८ ॥
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः ।
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥ १-२-८ ॥
भावार्थ : जितेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर चारों ओर फैले उस विशाल वन को देखते हुए विचरण किया।
॥ श्लोक ९ ॥
तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् ।
ददर्श भगवान् तत्र क्रौञ्चयोश्चारु निस्वनम् ॥ १-२-९ ॥
पदच्छेदः – तस्य = उनके; अभ्याशे = समीप में; तु = तो; मिथुनम् = जोड़ा; चरन्तम् = विचरता हुआ; अनपायिनम् = अवियुक्त (एक दूसरे से अलग न होने वाला); ददर्श = देखा; भगवान् = भगवान् (वाल्मीकि); तत्र = वहाँ; क्रौञ्चयोः = क्रौञ्च पक्षियों का; चारुनिस्वनम् = मधुर स्वर वाला।
भावार्थ : वहाँ उनके समीप ही क्रौञ्च पक्षियों का एक अवियुक्त जोड़ा (जो कभी अलग नहीं होता था) मधुर स्वरों में विचरता हुआ भगवान् वाल्मीकि ने देखा।

🏹 निषाद का क्रूर कर्म – क्रौञ्च-वध

॥ श्लोक १० ॥
तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः ।
जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥ १-२-१० ॥
पदच्छेदः – तस्मात् = उस; तु = तो; मिथुनात् = जोड़े में से; एकम् = एक; पुमांसम् = नर पक्षी को; पापनिश्चयः = पापी विचार वाला; वैरनिलयः = वैर का घर (क्रूर); निषादः = निषाद (व्याध); तस्य = उनके; पश्यतः = देखते ही; जघान = मार डाला।
भावार्थ : उसी समय पापी विचारों वाले, वैरभाव से भरे एक निषाद (व्याध) ने उन मुनि के देखते-देखते उस जोड़े में से नर क्रौञ्च का वध कर दिया।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले ।
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥
वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ।
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै ॥ १-२-११-१२ ॥
पदच्छेदः – तम् = उसको; शोणितपरीताङ्गम् = रक्त से लथपथ अंगों वाला; चेष्टमानम् = तड़पता हुआ; महीतले = भूमि पर; भार्या = पत्नी (मादा क्रौञ्ची); तु = तो; निहतम् = मारा हुआ; दृष्ट्वा = देखकर; रुराव = विलाप किया; करुणाम् = करुणापूर्ण; गिरम् = वाणी से; वियुक्ता = वियुक्त होकर; पतिना = पति से; तेन = उस; द्विजेन = द्विज (पक्षी) से; सहचारिणा = साथ विचरण करने वाले; ताम्रशीर्षेण = ताम्र वर्ण के सिर वाले; मत्तेन = मतवाले; पत्रिणा = पंखों वाले; सहितेन = संयुक्त; वै = ही।
भावार्थ : रक्त से लथपथ, भूमि पर तड़पते हुए उस नर पक्षी को देखकर उसकी भार्या (मादा क्रौञ्ची) करुण स्वर में विलाप करने लगी। वह सदा अपने पति के साथ विचरण करने वाली थी, जो ताम्र वर्ण के सिर वाला, मतवाला और सुन्दर पंखों से युक्त था। अब वह उससे वियुक्त हो गई थी।
व्याख्या : इन श्लोकों में करुण रस का अद्भुत चित्रण है। नर पक्षी का वध, उसकी रक्तरंजित दशा, उसकी पत्नी का विलाप – यह सब देख वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठता है। ताम्रशीर्ष, मत्त, पत्री विशेषण उस पक्षी के सौन्दर्य को दर्शाते हैं, जिसका विनाश और भी अधिक पीड़ादायक हो जाता है।
॥ श्लोक १३ ॥
तथा विधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥ १-२-१३ ॥
भावार्थ : निषाद द्वारा उस प्रकार से मारे गये उस द्विज (पक्षी) को देखकर उन धर्मात्मा ऋषि (वाल्मीकि) के हृदय में करुणा उत्पन्न हो गई।

✨ संस्कृत साहित्य का प्रथम श्लोक – 'मा निषाद...'

॥ श्लोक १४ ॥
ततः करुणवेदी तु अधर्म्यं धर्मसंहितम् ।
क्रौञ्चघ्न्या सम्प्रधार्यैतद् बभाषे वाक्यमर्थवत् ॥ १-२-१४ ॥
भावार्थ : तब करुणा से भरे हुए उन ऋषि ने क्रौञ्च-वध के इस अधर्मपूर्ण कार्य को धर्म की दृष्टि से विचार कर यह अर्थपूर्ण वाक्य कहा।
॥ श्लोक १५ ॥
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ १-२-१५ ॥
पदच्छेदः – मा = मत (नहीं); निषाद = हे निषाद; प्रतिष्ठाम् = प्रतिष्ठा; त्वम् = तू; अगमः = प्राप्त हो; शाश्वतीः = शाश्वत; समाः = वर्षों तक; यत् = क्योंकि; क्रौञ्चमिथुनात् = क्रौञ्च के जोड़े में से; एकम् = एक को; अवधीः = मार डाला; काममोहितम् = काम से मोहित।
भावार्थ : "हे निषाद! तूने काममोहित क्रौञ्च पक्षियों के जोड़े में से एक का वध कर दिया है, इसलिए तू शाश्वत काल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो।"
व्याख्या : यह संस्कृत साहित्य का प्रथम श्लोक (आदिकाव्य का आदिश्लोक) है। वाल्मीकि जी के मुख से यह शाप के रूप में निकला, किन्तु इसमें छन्द, अलंकार और भाव की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। चार चरण, प्रत्येक में आठ-आठ अक्षर, अनुष्टुप् छन्द का यह प्रथम प्रयोग है। मा निषाद से आरम्भ यह श्लोक आगे चलकर सम्पूर्ण रामायण का आधार बना।

🤔 वाल्मीकि का चिन्तन – 'किमिदं व्याहृतं मया'

॥ श्लोक १६ ॥
तस्य ब्रुवत एवैतां वाचं मुनिवरस्तदा ।
विसिस्मये ततः पश्चात् सर्वं सम्प्रधारयन् ॥ १-२-१६ ॥
भावार्थ : उन मुनिवर के इस प्रकार वाणी कहते ही उन्हें आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् वे उस सब पर विचार करने लगे।
॥ श्लोक १७ ॥
किंवदन्तीमिमां चापि ध्यायता तेन धीमता ।
शिष्यस्तमाह राजेन्द्र भरद्वाजो महामतिः ॥ १-२-१७ ॥
भावार्थ : हे राजेन्द्र! उस धीमान् मुनि द्वारा इस वाणी पर ध्यान करते हुए महामति भरद्वाज ने उनसे कहा।
॥ श्लोक १८ ॥
समचतुष्पाद् बहुविधं भवेदिदमिति ब्रुवन् ।
श्लोक एव तु यः श्लोक्यः सोऽयं श्लोक उदाहृतः ॥ १-२-१८ ॥
भावार्थ : "यह समान चार चरणों वाला, बहुविध अर्थों से युक्त है। जो श्लोक (श्लोकनीय/प्रशंसनीय) है, वही यह श्लोक है, ऐसा कहा जाता है।"
॥ श्लोक १९ ॥
तच्छ्रुत्वा भरद्वाजस्य वचः सम्यगुदाहृतम् ।
मुनिः परमसंतुष्टस्तं शिष्यमिदमब्रवीत् ॥ १-२-१९ ॥
भावार्थ : भरद्वाज के द्वारा उचित रूप से कहे गये उस वचन को सुनकर मुनि अत्यन्त संतुष्ट हुए और उस शिष्य से इस प्रकार बोले।

💧 स्नान एवं आश्रम वापसी

॥ श्लोक २० ॥
स तस्मिंस्तीर्थवर्ये तु कृतस्नानो महामुनिः ।
तमेवार्थं विचिन्वानो जगाम सह शिष्यतः ॥ १-२-२० ॥
भावार्थ : उस उत्तम तीर्थ में स्नान करके महामुनि उसी अर्थ (श्लोक) का चिन्तन करते हुए शिष्य के साथ (आश्रम की ओर) चले गये।
॥ श्लोक २१ ॥
भरद्वाजस्तु तं शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरुम् ।
कलशं तज्जलं पूर्णं सज्ज्ञानोऽनुजगाम ह ॥ १-२-२१ ॥
भावार्थ : विनीत और शास्त्रज्ञ शिष्य भरद्वाज जल से भरा हुआ कलश लेकर अपने गुरु के पीछे-पीछे चला।
॥ श्लोक २२ ॥
स प्रविश्याश्रमं धीमान् सशिष्यो मुनिपुङ्गवः ।
समन्युङ्क्त ततश्चान्यान् सुसमृद्धान् मुनीनपि ॥ १-२-२२ ॥
भावार्थ : वे धीमान् मुनिश्रेष्ठ शिष्यों सहित आश्रम में प्रवेश करके अन्य सुसमृद्ध मुनियों से भी उस श्लोक के विषय में चर्चा करने लगे।

🌟 ब्रह्मा जी का आगमन और पूजा

॥ श्लोक २३ ॥
ततस्तु चतुराननः ।
ब्रह्मा लोकगुरुर्देवः स्वयमेव समागतः ॥ १-२-२३ ॥
भावार्थ : तत्पश्चात् लोकगुरु, चतुरानन, देव ब्रह्मा स्वयं ही वहाँ आ गये।
॥ श्लोक २४ ॥
तं दृष्ट्वा सहसोत्तस्थौ वाल्मीको मुनिपुङ्गवः ।
व्रीडितः साश्रुनयनः कृताञ्जलिरवस्थितः ॥ १-२-२४ ॥
भावार्थ : उन्हें देखकर मुनिपुङ्गव वाल्मीकि सहसा उठ खड़े हुए। वे व्रीडित (विनम्र) हो, अश्रुपूर्ण नेत्रों से, हाथ जोड़े खड़े हो गये।
॥ श्लोक २५ ॥
पूजयामास तं देवं प्रश्रयावनतस्तदा ।
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः सर्वौपस्कारसंपदा ॥ १-२-२५ ॥
भावार्थ : उन्होंने प्रश्रय (विनय) से झुककर उस देव की पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि समस्त उपकरणों से पूजा की।
॥ श्लोक २६ ॥
पूजितस्तेन भगवानासने सोपवेशयत् ।
संविश्य चासने दिव्ये वाल्मीकिरिदमब्रवीत् ॥ १-२-२६ ॥
भावार्थ : उनके द्वारा पूजित हो भगवान् ब्रह्मा ने उन्हें आसन पर बैठने को कहा। दिव्य आसन पर बैठकर वाल्मीकि ने यह कहा।

🎙️ ब्रह्मा का आदेश – 'रामायणं कुरुष्व'

॥ श्लोक २७-२८ ॥
एष मे श्लोक उद्गीतः किमिदं ध्यायतः सदा ।
ब्रह्मन् ब्रूहि यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १-२-२७-२८ ॥
भावार्थ : "हे ब्रह्मन्! सदा ध्यान करते हुए मेरे द्वारा यह श्लोक कहा गया है। यह क्या है? मैं तत्त्व से सुनना चाहता हूँ, कृपया यथातथ्य बताइये।"
॥ श्लोक २९-३० ॥
ततः प्रोवाच भगवान् वाल्मीकिं प्रहसन्निव ।
ब्रह्मा लोकगुरुः श्रीमानिदं काव्यमुपागतम् ॥
मत्प्रसादात्त्वया दृष्टं सर्गोयं श्लोक एव च ॥ १-२-२९-३० ॥
भावार्थ : तब भगवान्, लोकगुरु, श्रीमान् ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए वाल्मीकि से कहा कि यह काव्य तुम्हारे पास उपस्थित हो गया है। मेरी कृपा से ही यह श्लोक तुम्हारे द्वारा रचा गया है।
॥ श्लोक ३१-३३ ॥
रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरुष्व त्वं महामुने ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥
यच्छ्रुतं नारदाद्यत्त्वया सर्वं तदुपबृंहय ।
रामस्य चरितं पुण्यं श्लोकबद्धं सुखावहम् ॥ १-२-३१-३३ ॥
भावार्थ : "हे महामुने! तुम धर्मात्मा, भगवत्स्वरूप, धीमान् राम का सम्पूर्ण चरित लिखो। नारद से जो कुछ तुमने सुना है, उस सबका विस्तार करो। राम के पवित्र चरित्र को श्लोकबद्ध करो, जो सुखदायी हो।"
॥ श्लोक ३४-३६ ॥
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ।
तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥
यावद्रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ।
तावत्त्वं लोकमासाद्य मम लोके महीयते ॥ १-२-३४-३६ ॥
पदच्छेदः – यावत् = जब तक; स्थास्यन्ति = रहेंगे; गिरयः = पर्वत; सरितः = नदियाँ; च = और; महीतले = पृथ्वी पर; तावत् = तब तक; रामायणकथा = रामायण की कथा; लोकेषु = लोकों में; प्रचरिष्यति = प्रचलित रहेगी; यावत् = जब तक; रामस्य = राम की; कथा = कथा; त्वत्कृता = तुम्हारे द्वारा रचित; प्रचरिष्यति = प्रचलित रहेगी; तावत् = तब तक; त्वम् = तुम; लोकम् = लोक को; आसाद्य = प्राप्त करके; मम लोके = मेरे लोक (ब्रह्मलोक) में; महीयते = पूजित होगे।
भावार्थ : "जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण की कथा लोकों में प्रचलित रहेगी। और जब तक तुम्हारे द्वारा रचित राम की कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम इस लोक को प्राप्त करके मेरे लोक (ब्रह्मलोक) में पूजित होते रहोगे।"
व्याख्या : यह ब्रह्मा जी का अमोघ वरदान है। रामायण की अमरता का यह श्लोक सबसे प्रसिद्ध है। पर्वत और नदियाँ जब तक हैं, तब तक यह कथा बनी रहेगी – और आज सहस्रों वर्षों बाद भी यह उतनी ही जीवंत है, जितनी अपने रचनाकाल में थी।

✨ ब्रह्मा का अन्तर्ध्यान और रामायण-रचना का संकल्प

॥ श्लोक ३७ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ।
वाल्मीकिः सह शिष्यस्तु विस्मयं समुपागतः ॥ १-२-३७ ॥
भावार्थ : ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा वहीं अन्तर्धान हो गये। वाल्मीकि और उनके शिष्य अत्यन्त विस्मित हुए।
॥ श्लोक ३८-४० ॥
ततः शिष्यास्तु तच्छ्लोकं जगुः प्रीत्या पुनः पुनः ।
परं विस्मयमापन्नाः सर्वे ते मुनिपुङ्गवाः ॥
एवं बुद्ध्वा महाप्राज्ञो वाल्मीको धर्मवित्तमः ।
रामस्य चरितं कृत्स्नं चकार स मुनिस्तदा ॥ १-२-३८-४० ॥
भावार्थ : तब शिष्यों ने उस श्लोक को प्रेमपूर्वक बार-बार गाया। वे सभी मुनिवर अत्यन्त विस्मित हुए। इस प्रकार विचार कर महाप्राज्ञ, धर्म के सबसे बड़े ज्ञाता वाल्मीकि मुनि ने राम के सम्पूर्ण चरित्र की रचना की।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

✨ आदिकाव्य और आदिकवि की स्थापना : यह सर्ग संस्कृत साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर है। मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्... संस्कृत का प्रथम श्लोक माना जाता है और वाल्मीकि को आदिकवि की उपाधि इसी से प्राप्त हुई।

🎯 करुण रस का प्रथम प्रयोग : वाल्मीकि जी ने स्वयं कहा है – "काव्यं रसात्मकं काव्यम्" – काव्य रस से युक्त होता है। इस सर्ग में करुण रस का जो सजीव चित्रण है, वह सम्पूर्ण रामायण में व्याप्त है। क्रौंच-वध की यह घटना रामायण के भावी कारुणिक प्रसंगों (दशरथ-मरण, सीता-हरण, राम-विलाप) का पूर्वाभास कराती है।

📜 दिव्य प्रेरणा : ब्रह्मा जी का प्रकट होकर वाल्मीकि को रामायण लिखने का आदेश देना यह सिद्ध करता है कि यह ग्रन्थ केवल मानव-कृति न होकर देव-प्रेरणा से रचित है। ब्रह्मा का वरदान "यावत् स्थास्यन्ति गिरयः..." रामायण की अमरता की गारंटी है।

🔯 अनुष्टुप् छन्द का प्रादुर्भाव : चार चरण, प्रत्येक में आठ अक्षर – यह अनुष्टुप् छन्द इसी श्लोक से प्रारम्भ हुआ और सम्पूर्ण रामायण इसी छन्द में रचित है। यह छन्द सरल, प्रवाहमयी और गेय है, जिससे रामायण सदा जन-जन के कण्ठ में बसी रही।

🙏 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि करुणा हृदय का सर्वोत्तम भाव है। निषाद के क्रूर कर्म ने वाल्मीकि के हृदय में करुणा जगाई, जिससे संसार को रामायण जैसा अमर ग्रन्थ मिला। साथ ही, गुरु की आज्ञा और दिव्य प्रेरणा का पालन करना ही सच्चे शिष्य का धर्म है – भरद्वाज ने जैसे गुरु की सेवा की और वाल्मीकि ने ब्रह्मा के आदेश का पालन किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 15

822

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥…

“हे निषाद ! तूने काम के वशीभूत होकर क्रौञ्चियों के जोड़े में से एक का वध किया है,…”

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श्लोक 10

108

तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः । जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥…

“उसी समय वैरभाव को घर बनाए रहने वाले एक पापी बहेलिये ने उनके देखते-देखते उस जोड़े…”

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श्लोक 8

106

स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः । विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥…

“फिर नियतेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर उस विपुल वन को चारों ओर स…”

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श्लोक 16

80

तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्ष्यतः । शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥…

“उनके इस प्रकार कहने पर और उस शोकाकुल पक्षी को देखकर उनके हृदय में चिन्ता उत्पन्न…”

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श्लोक 22

80

स तु ब्रह्मा महातेजाः समीपेऽस्य मुनेः स्थितः । कार्यं कार्यविदां श्रेष्ठः सर्वलोकपितामहः ॥…

“वे सर्वलोकपितामह, कार्यों को जानने वालों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनि…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 1

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नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्य विशारदः । पूजयामास धर्मात्मा सह शिष्यो महामुनिः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् वाक्य-विशारद, धर्मात्मा महामुनि वाल्मीकि ने नारद का वह वचन सुनकर अपने शिष्यों सहित उनकी पूजा की।
यह श्लोक बालकाण्ड के दूसरे सर्ग का प्रारम्भ है। इसमें वाल्मीकि जी द्वारा नारद जी के वचन सुनकर उनका सम्मान करने का वर्णन है। यह घटना रामायण रचना के लिए दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त करने की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

श्लोक 2

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यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिः नारदस्तदा । आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥
हिंदी अर्थ: उनके द्वारा यथावत् पूजित होकर तथा आज्ञा लेकर वे देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले गए।
नारद जी वाल्मीकि की पूजा स्वीकार करके और उनसे आज्ञा लेकर आकाश मार्ग से चले गए। यह श्लोक आदर-सत्कार के बाद विदाई की प्रक्रिया दर्शाता है।

श्लोक 3

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स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा । जगाम तमसा तीरं जाह्नव्याः अविदूरतः ॥
हिंदी अर्थ: उन नारद के मुहूर्त मात्र में देवलोक को चले जाने पर तब वे मुनि गंगा से कुछ दूर पर तमसा नदी के तट पर गए।
नारद के देवलोक गमन के तुरंत बाद वाल्मीकि गंगा के निकट तमसा नदी के तट पर गए। यह स्थान रामायण रचना की भूमि बनी।

श्लोक 4

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स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा । शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥
हिंदी अर्थ: उस समय तमसा के तट पर जाकर उसने कीचड़ रहित तीर्थ को देखकर पास में खड़े हुए शिष्य से कहा।
तमसा तट पर पहुँचकर वाल्मीकि ने स्वच्छ तीर्थ देखा और अपने पास खड़े शिष्य भरद्वाज से बात की।

श्लोक 5

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अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय । रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्य मनो यथा ॥
हिंदी अर्थ: हे भरद्वाज! इस तीर्थ को देखो, यह कीचड़ से रहित, प्रसन्न जल वाला और सन्मनुष्य के मन के समान रमणीय है।
वाल्मीकि भरद्वाज से तमसा तीर्थ की प्रशंसा करते हुए उसे सन्मनुष्य के मन के समान स्वच्छ और रमणीय बताते हैं।

श्लोक 6

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न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम । इदमेवावगाहिष्ये तमसा तीर्थमुत्तमम् ॥
हिंदी अर्थ: हे वत्स! कमण्डलु रख दो और मेरा वल्कल (वस्त्र) दो। मैं इसी उत्तम तमसा तीर्थ में अवगाहन करूँगा।
वाल्मीकि शिष्य भरद्वाज से कमण्डलु रखने और वल्कल देने को कहते हैं, क्योंकि वे तमसा तीर्थ में स्नान करना चाहते हैं।

श्लोक 7

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एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना । प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥
हिंदी अर्थ: महात्मा वाल्मीकि के इस प्रकार कहने पर गुरु की आज्ञा में तत्पर भरद्वाज ने उन मुनि को वल्कल दे दिया।
भरद्वाज ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए तुरंत वल्कल दे दिया। यह श्लोक शिष्य की आज्ञाकारिता दर्शाता है।

श्लोक 8

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स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः । विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥
हिंदी अर्थ: फिर नियतेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर उस विपुल वन को चारों ओर से देखते हुए विचरण किया।
वाल्मीकि ने वल्कल धारण किया और संयमित इन्द्रियों के साथ उस विशाल वन में चारों ओर देखते हुए भ्रमण किया।

श्लोक 9

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तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् । ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिस्वनम् ॥
हिंदी अर्थ: उस वन के समीप उन भगवान् मुनि ने कहीं परस्पर कभी न छोड़ने वाले क्रौञ्च पक्षियों के एक जोड़े को सुन्दर बोल बोलते हुए विचरते देखा।
वाल्मीकि ने वन के समीप क्रौंच पक्षियों के एक प्रेमी जोड़े को देखा, जो सुन्दर स्वर में बोल रहे थे और सदा साथ रहने वाले थे।

श्लोक 10

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तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः । जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥
हिंदी अर्थ: उसी समय वैरभाव को घर बनाए रहने वाले एक पापी बहेलिये ने उनके देखते-देखते उस जोड़े में से एक नर पक्षी को मार डाला।
वाल्मीकि के देखते-देखते एक क्रूर शिकारी ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर को मार डाला। यही घटना रामायण के प्रणयन का कारण बनी।

श्लोक 11

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तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले । भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥
हिंदी अर्थ: रक्त से लथपथ अंगों वाले, भूमि पर तड़पते हुए उस मारे गए नर को देखकर उसकी भार्या (मादा) करुण स्वर में रोने लगी।
यह श्लोक निषाद द्वारा क्रौंच नर के वध के बाद का हृदयविदारक दृश्य प्रस्तुत करता है। मादा अपने साथी को मरता देख विलाप करती है, जो वाल्मीकि के हृदय में करुणा का संचार करता है।

श्लोक 12

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वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा । ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै ॥
हिंदी अर्थ: लाल सिर वाले, मतवाले, पंखों से सुशोभित, सदा साथ रहने वाले उस द्विज (पक्षी) से वह मादा वियुक्त हो गई।
यह श्लोक उस नर क्रौंच पक्षी के विशेषणों से भरा है, जिससे मादा अब वियुक्त हो गई है। वह न केवल पति था, बल्कि सहचर, सुन्दर और प्रेम में मत्त था। इस वियोग को और अधिक मार्मिक बनाने के लिए उसके गुणों का वर्णन किया गया है।

श्लोक 13

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तथा विधिं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् । ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥
हिंदी अर्थ: बहेलिये द्वारा उस प्रकार मारे गए उस पक्षी को देखकर धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकि के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई।
इस श्लोक में वाल्मीकि के हृदय में करुणा के उदय का वर्णन है। निषाद द्वारा पक्षी के वध का दृश्य देखकर उनके मन में स्वाभाविक रूप से करुणा उत्पन्न हुई। यही करुणा आगे चलकर श्लोक (महाकाव्य) का रूप लेती है।

श्लोक 14

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ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः । निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥
हिंदी अर्थ: उस समय करुणा से आर्त होकर उन द्विज ने 'यह अधर्म है' ऐसा सोचते हुए उस रोती हुई क्रौञ्ची के विषय में यह वचन कहा।
इस श्लोक में वाल्मीकि न केवल करुणा से भर जाते हैं, बल्कि वे यह भी अनुभव करते हैं कि यह घटना अधर्म है। वे मादा क्रौंच के रुदन को सुनते हैं और फिर अपने मुख से वचन कहते हैं, जो आगे चलकर आदिश्लोक बनता है।

श्लोक 15

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मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥
हिंदी अर्थ: हे निषाद ! तूने काम के वशीभूत होकर क्रौञ्चियों के जोड़े में से एक का वध किया है, इसलिए तू अनन्त कालों तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो।
यह रामायण का प्रथम श्लोक (आदिश्लोक) है, जो महर्षि वाल्मीकि के मुख से निकला। यहाँ उन्होंने निषाद को शाप दिया कि वह कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करेगा। यही श्लोक आगे चलकर सम्पूर्ण रामायण की रचना का मूल बना।

श्लोक 16

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तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्ष्यतः । शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥
हिंदी अर्थ: उनके इस प्रकार कहने पर और उस शोकाकुल पक्षी को देखकर उनके हृदय में चिन्ता उत्पन्न हुई - मैंने शोक से आर्त होकर क्या कह दिया?
श्लोक कहने के तुरंत बाद वाल्मीकि को आश्चर्य होता है कि उनके मुख से यह वाक्य कैसे निकल गया। वे स्वयं उस श्लोक की रचना पर विस्मित हैं और चिंतन करते हैं।

श्लोक 17

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चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् । शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥
हिंदी अर्थ: उस समय वे महाप्राज्ञ, मतिमान् मुनिपुङ्गव चिन्तन करके निश्चय करते हुए शिष्य से इस वचन को बोले।
वाल्मीकि चिन्तन करते हैं और फिर एक निश्चय पर पहुँचकर अपने शिष्य से कुछ कहते हैं। यह श्लोक उस संवाद की भूमिका बनाता है।

श्लोक 18

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पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥
हिंदी अर्थ: (उन्होंने कहा) चार चरणों से युक्त, अक्षरों से सम (समान अक्षरों वाला), वीणा के लय के साथ समन्वित यह वाक्य मेरे मुख से शोक से आर्त होने के कारण निकला है, यह 'श्लोक' (शोक से उत्पन्न) हो, अन्यथा नहीं।
यह श्लोक स्वयं वाल्मीकि की उस स्वीकारोक्ति है कि उनके मुख से जो वाणी निकली है, वह एक विशिष्ट छन्दोबद्ध रचना है – श्लोक। यह श्लोक ही आगे चलकर रामायण का आधार बना।

श्लोक 19

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काकुत्स्थं चारित्रगुणैः प्राप्तश्रीकं पृथिवीपतिम् । वेदित्सुरहमिच्छामि त्वद्य कमपि पूरुषम् ॥
हिंदी अर्थ: मैं आज किसी ऐसे पुरुष को जानना चाहता हूँ, जो चरित्र और गुणों से युक्त, ऐश्वर्यशाली और पृथ्वी का स्वामी हो।
वाल्मीकि अब एक ऐसे आदर्श पुरुष की खोज करना चाहते हैं, जो सभी गुणों से युक्त हो और पृथ्वी का राजा हो। यह संकेत राम की ओर है।

श्लोक 20

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एवमुक्त्वा तु ध्यानस्थो ददर्श स महामुनिः । प्राञ्जलिं प्रणतं भूत्वा ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥
हिंदी अर्थ: ऐसा कहकर ध्यान में लीन हुए उस महामुनि ने प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े हुए लोकों के भावक ब्रह्मा को देखा।
वाल्मीकि ध्यान में लीन होते हैं और वहाँ ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं, जो उन्हें रामायण रचना की प्रेरणा देंगे।