संस्कृत श्लोक

ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः । निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥

हिंदी अनुवाद

उस समय करुणा से आर्त होकर उन द्विज ने 'यह अधर्म है' ऐसा सोचते हुए उस रोती हुई क्रौञ्ची के विषय में यह वचन कहा।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में वाल्मीकि न केवल करुणा से भर जाते हैं, बल्कि वे यह भी अनुभव करते हैं कि यह घटना अधर्म है। वे मादा क्रौंच के रुदन को सुनते हैं और फिर अपने मुख से वचन कहते हैं, जो आगे चलकर आदिश्लोक बनता है।

टिप्पणी

यहाँ 'करुणवेदित्वात्' का अर्थ है 'करुणा से आर्त होने के कारण'। 'वेदित्व' का तात्पर्य अनुभव करने की अवस्था से है। वाल्मीकि न केवल देखते हैं, बल्कि उस पीड़ा को गहराई से अनुभव भी करते हैं। साथ ही उनके मन में यह विचार उठता है कि 'अयम् अधर्मः' – यह अधर्म है। यह उनके धर्मज्ञ होने का प्रमाण है। फिर वे रुदती क्रौंची को देखते हुए वचन कहते हैं।

॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक १४ – अधर्म का बोध ॥

ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः ।
निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥
tataḥ karuṇaveditvādadharmo'yamiti dvijaḥ |
niśāmya rudatīṃ krauñcīmidaṃ vacanamabravīt ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस समय करुणा से आर्त होकर उन द्विज ने 'यह अधर्म है' ऐसा सोचते हुए उस रोती हुई क्रौञ्ची के विषय में यह वचन कहा।

🔹 English Translation : Then, overcome with compassion, that twice-born sage, reflecting that this is adharma (unrighteous), spoke these words regarding the weeping female krauncha.

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतहिन्दी अर्थ
ततःतब
करुणवेदित्वात्करुणा से आर्त होने के कारण
अधर्मःअधर्म
अयम्यह
इतिइस प्रकार
द्विजःद्विज (ऋषि)
निशाम्यसोचकर/विचार कर
रुदतीम्रोती हुई
क्रौञ्चीम्क्रौंची (मादा क्रौंच) को
इदम्यह
वचनम्वचन
अब्रवीत्बोले

📖 व्याख्या

इस श्लोक में दो महत्वपूर्ण बातें हैं – पहली, वाल्मीकि की करुणा (करुणवेदित्व) और दूसरी, उनका धर्मबोध (अधर्मः अयम्)। करुणा से आर्त होने के बावजूद वे भावुकता में नहीं बह जाते, बल्कि तर्कपूर्वक विचार करते हैं कि यह अधर्म है। इस प्रकार उनके वचन में करुणा और धर्म दोनों का समावेश है। यही वचन आगे चलकर शाप के रूप में प्रकट होता है – 'मा निषाद प्रतिष्ठाम्...'।

'निशाम्य' का अर्थ है सोचना या विचार करना। वे केवल देख ही नहीं रहे हैं, बल्कि गहराई से चिंतन भी कर रहे हैं। 'रुदतीं क्रौञ्चीम्' – रोती हुई मादा क्रौंच को देखकर उनका हृदय और अधिक द्रवित हो जाता है।

📌 व्याकरण: 'करुणवेदित्वात्' – पंचमी विभक्ति, हेतुवाचक। 'अधर्मः अयम्' – दोनों प्रथमा में, विधेय और उद्देश्य। 'निशाम्य' – ल्यप् प्रत्यय (क्त्वा के स्थान पर समास में), पूर्वकालिक क्रिया।

॥ जय श्री राम ॥