बाल काण्ड अध्याय 2 | 40 श्लोक

रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन

बाल काण्ड का द्वितीय सर्ग रामायण महाकाव्य के रचना-बीज का अद्भुत वर्णन करता है। नारद जी के जाने के पश्चात् वाल्मीकि जी तमसा नदी के तट पर जाते हैं, जहाँ वे क्रौंच पक्षियों के एक मिथुन को देखते हैं। एक निषाद के बाण से नर पक्षी के वध से व्यथित होकर वाल्मीकि जी के मुख से शाप के रूप में एक श्लोक निकलता है, जो संस्कृत साहित्य का प्रथम श्लोक माना जाता है। इसी श्लोक पर विचार करते हुए जब वे आश्रम लौटते हैं, तब ब्रह्मा जी प्रकट होकर उन्हें रामायण की रचना करने का दिव्य आदेश देते हैं।

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नारदस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वाक्य विशारदः । पूजयामास धर्मात्मा सह शिष्यो महामुनिः ॥

“तत्पश्चात् वाक्य-विशारद, धर्मात्मा महामुनि वाल्मीकि ने नारद का वह वचन सुनकर अपने शिष्यों सहित उनकी पूजा की।”

अर्थ: यह श्लोक बालकाण्ड के दूसरे सर्ग का प्रारम्भ है। इसमें वाल्मीकि जी द्वारा नारद जी के वचन सुनकर उनका सम्मान करने का वर्णन है। यह घटना रामायण रचना के लिए दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त करने की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

टिप्पणी: इस श्लोक में वाल्मीकि की नारद के प्रति श्रद्धा और गुरु-वचन को आत्मसात करने की प्रवृत्ति दिखती है। "वाक्य विशारदः" विशेषण उनकी वाणी पर अधिकार को दर्शाता है, जो आगे चलकर महाकाव्य की रचना में सहायक होता है।

यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिः नारदस्तदा । आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥

“उनके द्वारा यथावत् पूजित होकर तथा आज्ञा लेकर वे देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले गए।”

अर्थ: नारद जी वाल्मीकि की पूजा स्वीकार करके और उनसे आज्ञा लेकर आकाश मार्ग से चले गए। यह श्लोक आदर-सत्कार के बाद विदाई की प्रक्रिया दर्शाता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में "यथावत्" शब्द महत्वपूर्ण है, जो बताता है कि वाल्मीकि ने विधिपूर्वक शास्त्रोक्त ढंग से पूजा की। नारद जी का आकाशगमन उनकी दिव्यता को दर्शाता है।

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा । जगाम तमसा तीरं जाह्नव्याः अविदूरतः ॥

“उन नारद के मुहूर्त मात्र में देवलोक को चले जाने पर तब वे मुनि गंगा से कुछ दूर पर तमसा नदी के तट पर गए।”

अर्थ: नारद के देवलोक गमन के तुरंत बाद वाल्मीकि गंगा के निकट तमसा नदी के तट पर गए। यह स्थान रामायण रचना की भूमि बनी।

टिप्पणी: यह श्लोक स्थान परिवर्तन का सूचक है। नारद के जाने के बाद वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर जाते हैं, जो गंगा के समीप है। यह वही स्थान है जहाँ उन्हें क्रौंच पक्षी का करुण दृश्य देखने को मिलता है, जिससे रामायण की रचना प्रेरित होती है।

स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा । शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥

“उस समय तमसा के तट पर जाकर उसने कीचड़ रहित तीर्थ को देखकर पास में खड़े हुए शिष्य से कहा।”

अर्थ: तमसा तट पर पहुँचकर वाल्मीकि ने स्वच्छ तीर्थ देखा और अपने पास खड़े शिष्य भरद्वाज से बात की।

टिप्पणी: यह श्लोक वाल्मीकि और उनके शिष्य भरद्वाज के बीच वार्तालाप का आरंभ है। "अकर्दमम्" (कीचड़ रहित) विशेषण तीर्थ की पवित्रता और स्वच्छता को दर्शाता है, जो ध्यान एवं स्नान के लिए उपयुक्त है।

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय । रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्य मनो यथा ॥

“हे भरद्वाज! इस तीर्थ को देखो, यह कीचड़ से रहित, प्रसन्न जल वाला और सन्मनुष्य के मन के समान रमणीय है।”

अर्थ: वाल्मीकि भरद्वाज से तमसा तीर्थ की प्रशंसा करते हुए उसे सन्मनुष्य के मन के समान स्वच्छ और रमणीय बताते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक एक सुंदर उपमा प्रस्तुत करता है – जैसे सज्जन व्यक्ति का मन निर्मल, प्रसन्न और आकर्षक होता है, वैसे ही यह तीर्थ भी है। यह वाल्मीकि की काव्य प्रतिभा का प्रथम संकेत है, जो आगे चलकर महाकाव्य में पूर्ण विकसित होती है।

न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम । इदमेवावगाहिष्ये तमसा तीर्थमुत्तमम् ॥

“हे वत्स! कमण्डलु रख दो और मेरा वल्कल (वस्त्र) दो। मैं इसी उत्तम तमसा तीर्थ में अवगाहन करूँगा।”

अर्थ: वाल्मीकि शिष्य भरद्वाज से कमण्डलु रखने और वल्कल देने को कहते हैं, क्योंकि वे तमसा तीर्थ में स्नान करना चाहते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक गुरु-शिष्य के बीच के सेवा-भाव को दर्शाता है। शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए तत्पर है। "अवगाहिष्ये" क्रिया से पता चलता है कि वाल्मीकि तीर्थ में डुबकी लगाने का इरादा रखते हैं, जो शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक है।

एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना । प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरोः ॥

“महात्मा वाल्मीकि के इस प्रकार कहने पर गुरु की आज्ञा में तत्पर भरद्वाज ने उन मुनि को वल्कल दे दिया।”

अर्थ: भरद्वाज ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए तुरंत वल्कल दे दिया। यह श्लोक शिष्य की आज्ञाकारिता दर्शाता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में "नियतो गुरोः" पद विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह शिष्य के समर्पण और गुरु-आज्ञा के पालन के भाव को व्यक्त करता है। भरद्वाज बिना किसी विलंब के वाल्मीकि की आज्ञा का पालन करते हैं, जो गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श है।

स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः । विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥

“फिर नियतेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर उस विपुल वन को चारों ओर से देखते हुए विचरण किया।”

अर्थ: वाल्मीकि ने वल्कल धारण किया और संयमित इन्द्रियों के साथ उस विशाल वन में चारों ओर देखते हुए भ्रमण किया।

टिप्पणी: यह श्लोक वाल्मीकि की प्रकृति-प्रेम और ध्यानमग्न अवस्था को दर्शाता है। वे वन के प्रत्येक भाग को ध्यान से देखते हैं, जो उनकी काव्य-दृष्टि का परिचायक है। "नियतेन्द्रियः" पद उनके योगाभ्यास और संयम की ओर संकेत करता है।

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् । ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिस्वनम् ॥

“उस वन के समीप उन भगवान् मुनि ने कहीं परस्पर कभी न छोड़ने वाले क्रौञ्च पक्षियों के एक जोड़े को सुन्दर बोल बोलते हुए विचरते देखा।”

अर्थ: वाल्मीकि ने वन के समीप क्रौंच पक्षियों के एक प्रेमी जोड़े को देखा, जो सुन्दर स्वर में बोल रहे थे और सदा साथ रहने वाले थे।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के प्रसिद्ध क्रौंच वध प्रसंग का पूर्वरंग है। "अनपायिनम्" (कभी न छोड़ने वाला) और "चारुनिस्वनम्" (मधुर बोलने वाला) विशेषण इस जोड़े की अटूट प्रेम और सौंदर्य को दर्शाते हैं, जिससे उनका वध और भी करुण बन जाता है।

श्लोक 10

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तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः । जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥

“उसी समय वैरभाव को घर बनाए रहने वाले एक पापी बहेलिये ने उनके देखते-देखते उस जोड़े में से एक नर पक्षी को मार डाला।”

अर्थ: वाल्मीकि के देखते-देखते एक क्रूर शिकारी ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर को मार डाला। यही घटना रामायण के प्रणयन का कारण बनी।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण की उत्पत्ति का मूल कारण है। नर पक्षी के वध से उत्पन्न करुणा ही वाल्मीकि के मुख से प्रथम श्लोक (मा निषाद) के रूप में प्रकट हुई। "पापनिश्चयः" और "वैरनिलयः" शिकारी की क्रूरता और वैर-भावना को दर्शाते हैं।

श्लोक 11

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तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले । भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥

“रक्त से लथपथ अंगों वाले, भूमि पर तड़पते हुए उस मारे गए नर को देखकर उसकी भार्या (मादा) करुण स्वर में रोने लगी।”

अर्थ: यह श्लोक निषाद द्वारा क्रौंच नर के वध के बाद का हृदयविदारक दृश्य प्रस्तुत करता है। मादा अपने साथी को मरता देख विलाप करती है, जो वाल्मीकि के हृदय में करुणा का संचार करता है।

टिप्पणी: यह श्लोक बालकाण्ड के दूसरे सर्ग का ग्यारहवाँ श्लोक है, जो पूर्ववर्ती घटना को आगे बढ़ाता है। मादा का विलाप करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है और यहीं से वाल्मीकि के मन में शोक का उदय होता है जो आगे चलकर श्लोक में परिणत होगा।

श्लोक 12

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वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा । ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा सहितेन वै ॥

“लाल सिर वाले, मतवाले, पंखों से सुशोभित, सदा साथ रहने वाले उस द्विज (पक्षी) से वह मादा वियुक्त हो गई।”

अर्थ: यह श्लोक उस नर क्रौंच पक्षी के विशेषणों से भरा है, जिससे मादा अब वियुक्त हो गई है। वह न केवल पति था, बल्कि सहचर, सुन्दर और प्रेम में मत्त था। इस वियोग को और अधिक मार्मिक बनाने के लिए उसके गुणों का वर्णन किया गया है।

टिप्पणी: इस श्लोक में क्रौंच नर के रूप-गुणों का वर्णन है – ताम्रशीर्ष (लाल सिर), मत्त (प्रेम में मदमस्त), पत्री (पंखों से युक्त) और सहचारी (सदा साथ रहने वाला)। यह वर्णन मादा के दुःख को और अधिक तीव्र करता है। 'वियुक्ता' शब्द से पूर्ण वियोग की पीड़ा व्यक्त होती है।

श्लोक 13

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तथा विधिं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् । ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥

“बहेलिये द्वारा उस प्रकार मारे गए उस पक्षी को देखकर धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकि के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि के हृदय में करुणा के उदय का वर्णन है। निषाद द्वारा पक्षी के वध का दृश्य देखकर उनके मन में स्वाभाविक रूप से करुणा उत्पन्न हुई। यही करुणा आगे चलकर श्लोक (महाकाव्य) का रूप लेती है।

टिप्पणी: यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार एक संवेदनशील और धर्मात्मा ऋषि के हृदय में स्वतः ही करुणा जाग्रत हो जाती है। यहाँ 'तथा विधिम्' का अर्थ है 'उस प्रकार से' या 'विधि के अनुसार' – अर्थात जैसे वह पक्षी मारा गया था, उस हृदयविदारक दृश्य को देखकर। 'कारुण्यं समपद्यत' – करुणा उत्पन्न हुई। यह करुणा ही रामायण रचना का मूल कारण बनेगी।

श्लोक 14

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ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः । निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् ॥

“उस समय करुणा से आर्त होकर उन द्विज ने 'यह अधर्म है' ऐसा सोचते हुए उस रोती हुई क्रौञ्ची के विषय में यह वचन कहा।”

अर्थ: इस श्लोक में वाल्मीकि न केवल करुणा से भर जाते हैं, बल्कि वे यह भी अनुभव करते हैं कि यह घटना अधर्म है। वे मादा क्रौंच के रुदन को सुनते हैं और फिर अपने मुख से वचन कहते हैं, जो आगे चलकर आदिश्लोक बनता है।

टिप्पणी: यहाँ 'करुणवेदित्वात्' का अर्थ है 'करुणा से आर्त होने के कारण'। 'वेदित्व' का तात्पर्य अनुभव करने की अवस्था से है। वाल्मीकि न केवल देखते हैं, बल्कि उस पीड़ा को गहराई से अनुभव भी करते हैं। साथ ही उनके मन में यह विचार उठता है कि 'अयम् अधर्मः' – यह अधर्म है। यह उनके धर्मज्ञ होने का प्रमाण है। फिर वे रुदती क्रौंची को देखते हुए वचन कहते हैं।

श्लोक 15

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मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥

“हे निषाद ! तूने काम के वशीभूत होकर क्रौञ्चियों के जोड़े में से एक का वध किया है, इसलिए तू अनन्त कालों तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो।”

अर्थ: यह रामायण का प्रथम श्लोक (आदिश्लोक) है, जो महर्षि वाल्मीकि के मुख से निकला। यहाँ उन्होंने निषाद को शाप दिया कि वह कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करेगा। यही श्लोक आगे चलकर सम्पूर्ण रामायण की रचना का मूल बना।

टिप्पणी: यह श्लोक संस्कृत साहित्य का आदिश्लोक माना जाता है। इसे ही आधार मानकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। इसमें अनुष्टुप् छंद है। 'शोकः श्लोकत्वमागतः' – शोक ही श्लोक में परिणत हुआ।

श्लोक 16

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तस्यैवं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्ष्यतः । शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया ॥

“उनके इस प्रकार कहने पर और उस शोकाकुल पक्षी को देखकर उनके हृदय में चिन्ता उत्पन्न हुई - मैंने शोक से आर्त होकर क्या कह दिया?”

अर्थ: श्लोक कहने के तुरंत बाद वाल्मीकि को आश्चर्य होता है कि उनके मुख से यह वाक्य कैसे निकल गया। वे स्वयं उस श्लोक की रचना पर विस्मित हैं और चिंतन करते हैं।

टिप्पणी: यहाँ वाल्मीकि को अपने उच्चारण पर आश्चर्य होता है। वे सोचते हैं कि उन्होंने शोकवश क्या कह दिया। यह उनके कवि-हृदय की पहली अभिव्यक्ति है, जो स्वतःस्फूर्त है, और वे उसकी महत्ता को नहीं समझ पा रहे हैं।

श्लोक 17

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चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् । शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥

“उस समय वे महाप्राज्ञ, मतिमान् मुनिपुङ्गव चिन्तन करके निश्चय करते हुए शिष्य से इस वचन को बोले।”

अर्थ: वाल्मीकि चिन्तन करते हैं और फिर एक निश्चय पर पहुँचकर अपने शिष्य से कुछ कहते हैं। यह श्लोक उस संवाद की भूमिका बनाता है।

टिप्पणी: पिछले श्लोक में चिन्ता के बाद अब वाल्मीकि मतिमान् (बुद्धिमान) होकर मति (निश्चय) करते हैं। वे शिष्य से कुछ कहने वाले हैं, जो अगले श्लोक में स्पष्ट होगा।

श्लोक 18

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पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥

“(उन्होंने कहा) चार चरणों से युक्त, अक्षरों से सम (समान अक्षरों वाला), वीणा के लय के साथ समन्वित यह वाक्य मेरे मुख से शोक से आर्त होने के कारण निकला है, यह 'श्लोक' (शोक से उत्पन्न) हो, अन्यथा नहीं।”

अर्थ: यह श्लोक स्वयं वाल्मीकि की उस स्वीकारोक्ति है कि उनके मुख से जो वाणी निकली है, वह एक विशिष्ट छन्दोबद्ध रचना है – श्लोक। यह श्लोक ही आगे चलकर रामायण का आधार बना।

टिप्पणी: यह अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है, जिसमें वाल्मीकि ने स्वयं अपने उद्गार को 'श्लोक' की संज्ञा दी है। उन्होंने इसकी विशेषताएँ गिनाईं: पादबद्ध (चार चरणों वाला), अक्षरसम (समान अक्षर मात्रा वाला, अर्थात् आठ-आठ अक्षरों वाला), तन्त्रीलयसमन्वित (वीणा के लय के अनुरूप)। यही अनुष्टुप् छंद के लक्षण हैं। यहाँ 'शोकार्तस्य' कहकर उन्होंने इसके उद्गम स्रोत को भी बताया – शोक। इसलिए 'शोकः श्लोकत्वमागतः'।

श्लोक 19

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काकुत्स्थं चारित्रगुणैः प्राप्तश्रीकं पृथिवीपतिम् । वेदित्सुरहमिच्छामि त्वद्य कमपि पूरुषम् ॥

“मैं आज किसी ऐसे पुरुष को जानना चाहता हूँ, जो चरित्र और गुणों से युक्त, ऐश्वर्यशाली और पृथ्वी का स्वामी हो।”

अर्थ: वाल्मीकि अब एक ऐसे आदर्श पुरुष की खोज करना चाहते हैं, जो सभी गुणों से युक्त हो और पृथ्वी का राजा हो। यह संकेत राम की ओर है।

टिप्पणी: यह श्लोक वाल्मीकि की उस मानसिकता को दर्शाता है, जो अब एक आदर्श चरित्र की रचना के लिए उत्सुक है। वे काकुत्स्थ (रघुवंशी) राजा की बात कर रहे हैं, जो चरित्र और गुणों से युक्त हो, ऐश्वर्यशाली हो और पृथ्वी का स्वामी हो। यह राम के चरित्र का ही परिचय है।

श्लोक 20

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एवमुक्त्वा तु ध्यानस्थो ददर्श स महामुनिः । प्राञ्जलिं प्रणतं भूत्वा ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥

“ऐसा कहकर ध्यान में लीन हुए उस महामुनि ने प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े हुए लोकों के भावक ब्रह्मा को देखा।”

अर्थ: वाल्मीकि ध्यान में लीन होते हैं और वहाँ ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं, जो उन्हें रामायण रचना की प्रेरणा देंगे।

टिप्पणी: यह श्लोक वाल्मीकि के ध्यान और ब्रह्मा के दर्शन का वर्णन करता है। वे ध्यानस्थ होकर ब्रह्मा को देखते हैं, जो उनके सामने हाथ जोड़े प्रणाम मुद्रा में खड़े हैं (यहाँ प्राञ्जलिं प्रणतं ब्रह्माणम् का अर्थ है कि ब्रह्मा ने वाल्मीकि के प्रति सम्मान प्रकट किया)। ब्रह्मा के आगमन से रामायण रचना का मार्ग प्रशस्त होता है।