रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले । भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥
हिंदी अनुवाद
रक्त से लथपथ अंगों वाले, भूमि पर तड़पते हुए उस मारे गए नर को देखकर उसकी भार्या (मादा) करुण स्वर में रोने लगी।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक निषाद द्वारा क्रौंच नर के वध के बाद का हृदयविदारक दृश्य प्रस्तुत करता है। मादा अपने साथी को मरता देख विलाप करती है, जो वाल्मीकि के हृदय में करुणा का संचार करता है।
टिप्पणी
यह श्लोक बालकाण्ड के दूसरे सर्ग का ग्यारहवाँ श्लोक है, जो पूर्ववर्ती घटना को आगे बढ़ाता है। मादा का विलाप करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है और यहीं से वाल्मीकि के मन में शोक का उदय होता है जो आगे चलकर श्लोक में परिणत होगा।
॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक ११ – मादा क्रौंच का विलाप ॥
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम् ॥
bhāryā tu nihataṃ dṛṣṭvā rurāva karuṇāṃ giram ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : रक्त से लथपथ अंगों वाले, भूमि पर तड़पते हुए उस मारे गए नर को देखकर उसकी भार्या (मादा) करुण स्वर में रोने लगी।
🔹 English Translation : Seeing her mate lying on the ground, his body covered with blood and writhing in pain, the female bird (wife) cried out in a pitiful voice.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word)
| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| तम् | उस (नर पक्षी) को |
| शोणितपरीताङ्गम् | रक्त से लिप्त अंगों वाले |
| चेष्टमानम् | छटपटाते हुए |
| महीतले | भूमि पर |
| भार्या | पत्नी (मादा पक्षी) |
| तु | तो |
| निहतम् | मारे गए को |
| दृष्ट्वा | देखकर |
| रुराव | रोने लगी |
| करुणाम् | करुणापूर्ण |
| गिरम् | वाणी |
📖 सन्दर्भ एवं व्याख्या
यह श्लोक बालकाण्ड के दूसरे सर्ग में आता है, जहाँ महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर भ्रमण कर रहे हैं। एक निषाद (शिकारी) द्वारा क्रौंच पक्षी के नर का वध कर दिए जाने के बाद मादा का विलाप वर्णित है। 'रुराव करुणां गिरम्' – वह करुण स्वर में रोती है। यह दृश्य वाल्मीकि के हृदय को गहराई से छू जाता है और उनके मन में शोक (करुणा) का उदय होता है, जो आगे चलकर श्लोक (मा निषाद) के रूप में प्रकट होगा।
व्याकरण की दृष्टि से 'रुराव' लिट् लकार (परिपूर्ण भूत) का रूप है, जो भूतकाल में हुई क्रिया को दर्शाता है। 'शोणितपरीताङ्गम्' में बहुव्रीहि समास है – शोणितेन परीतम् अङ्गम् यस्य सः। इस श्लोक में करुण रस का प्रारम्भिक बीज दिखाई देता है।
॥ जय श्री राम ॥