संस्कृत श्लोक

तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः । जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥

हिंदी अनुवाद

उसी समय वैरभाव को घर बनाए रहने वाले एक पापी बहेलिये ने उनके देखते-देखते उस जोड़े में से एक नर पक्षी को मार डाला।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि के देखते-देखते एक क्रूर शिकारी ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर को मार डाला। यही घटना रामायण के प्रणयन का कारण बनी।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण की उत्पत्ति का मूल कारण है। नर पक्षी के वध से उत्पन्न करुणा ही वाल्मीकि के मुख से प्रथम श्लोक (मा निषाद) के रूप में प्रकट हुई। "पापनिश्चयः" और "वैरनिलयः" शिकारी की क्रूरता और वैर-भावना को दर्शाते हैं।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – दशम श्लोक ॥

तस्मात्तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चयः ।
जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यतः ॥
tasmāttu mithunādekaṃ pumāṃsaṃ pāpaniścayaḥ |
jaghāna vairanilayo niṣādastasya paśyataḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उसी समय वैरभाव को घर बनाए रहने वाले एक पापी बहेलिये ने उनके देखते-देखते उस जोड़े में से एक नर पक्षी को मार डाला।

🔹 English Translation : Then, a cruel hunter, filled with malice, killed the male bird from that pair, while the sage was watching.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
तस्मात्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, पञ्चमी एकवचनउस (जोड़े) में से
तुअव्ययही, तो
मिथुनात्नपुंसकलिंग, पञ्चमी एकवचनजोड़े में से
एकम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनएक को
पुमांसम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (पुंस्)नर को
पापनिश्चयःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (पाप + निश्चय)पापनिश्चय, पाप में दृढ़ निश्चय वाला
जघानपरस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (हन् धातु)मार डाला
वैरनिलयःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (वैर + निलय)वैरनिलय, वैरभाव को घर बनाने वाला
निषादःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचननिषाद, शिकारी
तस्यसर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनउसके (वाल्मीकि के)
पश्यतःपुल्लिंग, षष्ठी एकवचन, शतृ प्रत्यय (दृश् धातु)देखते हुए, देखने वाले के

📖 व्याख्या एवं महत्व

यह श्लोक रामायण के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना का वर्णन करता है – क्रौंच वध। पिछले श्लोक में जिस प्रेमी जोड़े का वर्णन था, उसी में से एक नर को शिकारी ने मार डाला। "पापनिश्चयः" और "वैरनिलयः" विशेषण शिकारी की निर्दयता और हिंसक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।

इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर वाल्मीकि के मुख से स्वतः ही शाप निकलता है – "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः..." जो संस्कृत साहित्य का प्रथम श्लोक (आदिश्लोक) माना जाता है। इस प्रकार यह श्लोक न केवल रामायण बल्कि सम्पूर्ण संस्कृत काव्य परंपरा की जननी है। यहाँ से शोक (करुणा) श्लोक (काव्य) में परिणत होता है – "शोकः श्लोकत्वमागतः"।

इस घटना ने वाल्मीकि को रामकथा लिखने की प्रेरणा दी, क्योंकि ब्रह्मा जी ने उन्हें इसी छंद में राम के चरित्र का वर्णन करने का आदेश दिया। अतः यह श्लोक सम्पूर्ण रामायण के रचना-बीज के रूप में प्रतिष्ठित है।