संस्कृत श्लोक

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् । ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिस्वनम् ॥

हिंदी अनुवाद

उस वन के समीप उन भगवान् मुनि ने कहीं परस्पर कभी न छोड़ने वाले क्रौञ्च पक्षियों के एक जोड़े को सुन्दर बोल बोलते हुए विचरते देखा।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि ने वन के समीप क्रौंच पक्षियों के एक प्रेमी जोड़े को देखा, जो सुन्दर स्वर में बोल रहे थे और सदा साथ रहने वाले थे।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण के प्रसिद्ध क्रौंच वध प्रसंग का पूर्वरंग है। "अनपायिनम्" (कभी न छोड़ने वाला) और "चारुनिस्वनम्" (मधुर बोलने वाला) विशेषण इस जोड़े की अटूट प्रेम और सौंदर्य को दर्शाते हैं, जिससे उनका वध और भी करुण बन जाता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – नवम श्लोक ॥

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम् ।
ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिस्वनम् ॥
tasyābhyāśe tu mithunaṃ carantamanapāyinam |
dadarśa bhagavāṃstatra krauñcayoścārunisvanam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस वन के समीप उन भगवान् मुनि ने कहीं परस्पर कभी न छोड़ने वाले क्रौञ्च पक्षियों के एक जोड़े को सुन्दर बोल बोलते हुए विचरते देखा।

🔹 English Translation : Near that (forest), the blessed sage saw a pair of Krauncha birds, inseparable from each other, moving about and making charming sounds.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
तस्यसर्वनाम, नपुंसकलिंग, षष्ठी एकवचनउस (वन) के
अभ्याशेनपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन (अभ्याश)समीप में, निकट
तुअव्ययतो
मिथुनम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनजोड़ा (नर-मादा)
चरन्तम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन, शतृ प्रत्यय (चर् धातु)विचरते हुए
अनपायिनम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (नञ् + अपायिन्)कभी न छोड़ने वाला, अवियुक्त
ददर्शपरस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (दृश् धातु)देखा
भगवान्पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनभगवान् (वाल्मीकि के लिए आदरसूचक)
तत्रअव्ययवहाँ
क्रौञ्चयोःपुल्लिंग, षष्ठी द्विवचन (क्रौञ्च)क्रौञ्च पक्षियों के
चारुनिस्वनम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (चारु + निस्वन)सुन्दर बोल बोलते हुए, मधुर ध्वनि वाला

📖 व्याख्या एवं महत्व

इस श्लोक में वाल्मीकि ने क्रौंच पक्षियों के जोड़े को देखा। "अनपायिनम्" विशेषण बताता है कि वे एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे – यह उनके अटूट प्रेम का प्रतीक है। "चारुनिस्वनम्" उनकी मधुर वाणी को दर्शाता है, जो वातावरण को आनंदमय बना रही थी।

यह श्लोक रामायण के सबसे करुण प्रसंग की भूमिका तैयार करता है। इस जोड़े की सुंदरता और प्रेम को देखकर ही वाल्मीकि के मन में करुणा का संचार होगा, जब उनमें से एक का वध हो जाता है। इस प्रकार, यह श्लोक विपरीत परिस्थितियों (सुख और दुख) के बीच के अंतर को उजागर करता है और करुण रस की उत्पत्ति का कारण बनता है।