रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः । विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥
हिंदी अनुवाद
फिर नियतेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर उस विपुल वन को चारों ओर से देखते हुए विचरण किया।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि ने वल्कल धारण किया और संयमित इन्द्रियों के साथ उस विशाल वन में चारों ओर देखते हुए भ्रमण किया।
टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि की प्रकृति-प्रेम और ध्यानमग्न अवस्था को दर्शाता है। वे वन के प्रत्येक भाग को ध्यान से देखते हैं, जो उनकी काव्य-दृष्टि का परिचायक है। "नियतेन्द्रियः" पद उनके योगाभ्यास और संयम की ओर संकेत करता है।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – अष्टम श्लोक ॥
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम् ॥
vicacāra ha paśyaṃstat sarvato vipulaṃ vanam ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : फिर नियतेन्द्रिय उन मुनि ने शिष्य के हाथ से वल्कल लेकर उस विपुल वन को चारों ओर से देखते हुए विचरण किया।
🔹 English Translation : That sage, with controlled senses, having taken the bark garment from the disciple's hand, walked about, looking at that vast forest on all sides.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह (वाल्मीकि) |
| शिष्यहस्तात् | पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचन (शिष्य + हस्त) | शिष्य के हाथ से |
| आदाय | ल्यप् प्रत्यय (आ + दा धातु) | लेकर |
| वल्कलम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | वल्कल |
| नियतेन्द्रियः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (नियत + इन्द्रिय) | नियतेन्द्रिय, जितेन्द्रिय |
| विचचार | परस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (वि + चर् धातु) | विचरण किया, घूमा |
| ह | अव्यय | निश्चयार्थक, जोर देने के लिए |
| पश्यन् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन, शतृ प्रत्यय (दृश् धातु) | देखते हुए |
| तत् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | उस (वन) को |
| सर्वतः | अव्यय | चारों ओर से |
| विपुलम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | विशाल, विस्तृत |
| वनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | वन को |
📖 व्याख्या एवं महत्व
वल्कल धारण करने के बाद वाल्मीकि ने वन में भ्रमण किया। वे "नियतेन्द्रिय" थे, अर्थात उनकी इन्द्रियाँ वश में थीं। यह उनकी योग साधना का परिचायक है। वे केवल चल ही नहीं रहे थे, बल्कि चारों ओर के विशाल वन को ध्यान से देख रहे थे। "पश्यन्" शब्द उनके अवलोकन की सूक्ष्मता को दर्शाता है।
इस वन-भ्रमण के दौरान ही उन्हें क्रौंच पक्षी के जोड़े का दर्शन होगा, जो रामायण रचना का कारण बनेगा। इस प्रकार यह श्लोक उस महत्वपूर्ण घटना की पृष्ठभूमि तैयार करता है। वाल्मीकि का प्रकृति के प्रति यह गहरा लगाव उनके काव्य में भी प्रतिबिंबित होता है।