रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम् । शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥
हिंदी अनुवाद
उस समय वे महाप्राज्ञ, मतिमान् मुनिपुङ्गव चिन्तन करके निश्चय करते हुए शिष्य से इस वचन को बोले।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि चिन्तन करते हैं और फिर एक निश्चय पर पहुँचकर अपने शिष्य से कुछ कहते हैं। यह श्लोक उस संवाद की भूमिका बनाता है।
टिप्पणी
पिछले श्लोक में चिन्ता के बाद अब वाल्मीकि मतिमान् (बुद्धिमान) होकर मति (निश्चय) करते हैं। वे शिष्य से कुछ कहने वाले हैं, जो अगले श्लोक में स्पष्ट होगा।
॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक १७ – निश्चय एवं शिष्य-सम्बोधन ॥
शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥
śiṣyaṃ caivābravīdvākyamidaṃ sa munipuṅgavaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस समय वे महाप्राज्ञ, मतिमान् मुनिपुङ्गव चिन्तन करके निश्चय करते हुए शिष्य से इस वचन को बोले।
🔹 English Translation : That highly intelligent and wise foremost among sages, while pondering, made up his mind and spoke this word to his disciple.
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| चिन्तयन् | चिन्तन करते हुए |
| सः | वह |
| महाप्राज्ञः | महाप्राज्ञ (बहुत बुद्धिमान) |
| चकार | किया |
| मतिमान् | बुद्धिमान |
| मतिम् | निश्चय |
| शिष्यम् | शिष्य से |
| च | और |
| एव | ही |
| अब्रवीत् | बोले |
| वाक्यम् | वचन |
| इदम् | यह |
| सः | वह |
| मुनिपुङ्गवः | मुनियों में श्रेष्ठ |
📖 व्याख्या
इस श्लोक में वाल्मीकि की मानसिक दशा का वर्णन है। वे चिन्तन (cintayan) कर रहे हैं। 'महाप्राज्ञ' और 'मतिमान्' विशेषण उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाते हैं। वे 'मति' (निश्चय) करते हैं और फिर अपने शिष्य से कुछ कहते हैं। यहाँ 'शिष्य' कौन है, इसका उल्लेख नहीं, पर संभवतः भरद्वाज या अन्य कोई शिष्य। अगले श्लोक में वह वचन स्पष्ट होगा।
इस श्लोक में क्रिया 'चकार' (लिट् लकार) और 'अब्रवीत्' (लङ् लकार) का प्रयोग हुआ है, जो भूतकाल को दर्शाता है।
॥ जय श्री राम ॥