रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥
हिंदी अनुवाद
(उन्होंने कहा) चार चरणों से युक्त, अक्षरों से सम (समान अक्षरों वाला), वीणा के लय के साथ समन्वित यह वाक्य मेरे मुख से शोक से आर्त होने के कारण निकला है, यह 'श्लोक' (शोक से उत्पन्न) हो, अन्यथा नहीं।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक स्वयं वाल्मीकि की उस स्वीकारोक्ति है कि उनके मुख से जो वाणी निकली है, वह एक विशिष्ट छन्दोबद्ध रचना है – श्लोक। यह श्लोक ही आगे चलकर रामायण का आधार बना।
टिप्पणी
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है, जिसमें वाल्मीकि ने स्वयं अपने उद्गार को 'श्लोक' की संज्ञा दी है। उन्होंने इसकी विशेषताएँ गिनाईं: पादबद्ध (चार चरणों वाला), अक्षरसम (समान अक्षर मात्रा वाला, अर्थात् आठ-आठ अक्षरों वाला), तन्त्रीलयसमन्वित (वीणा के लय के अनुरूप)। यही अनुष्टुप् छंद के लक्षण हैं। यहाँ 'शोकार्तस्य' कहकर उन्होंने इसके उद्गम स्रोत को भी बताया – शोक। इसलिए 'शोकः श्लोकत्वमागतः'।
॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक १८ – शोकः श्लोकत्वमागतः ॥
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ॥
śokārtasya pravṛtto me śloko bhavatu nānyathā ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : (उन्होंने कहा) चार चरणों से युक्त, अक्षरों से सम (समान अक्षरों वाला), वीणा के लय के साथ समन्वित यह वाक्य मेरे मुख से शोक से आर्त होने के कारण निकला है, यह 'श्लोक' (शोक से उत्पन्न) हो, अन्यथा नहीं।
🔹 English Translation : (He said:) This utterance, which has four feet, is equal in syllables, and is harmonious with the rhythm of the lute (veena), has come forth from me who is afflicted with sorrow. Let it be a shloka (verse), not otherwise.
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| पादबद्धः | चरणों से युक्त |
| अक्षरसमः | अक्षरों से सम (समान अक्षरों वाला) |
| तन्त्रीलयसमन्वितः | वीणा के लय के साथ समन्वित |
| शोकार्तस्य | शोक से आर्त |
| प्रवृत्तः | प्रकट हुआ |
| मे | मुझसे |
| श्लोकः | श्लोक |
| भवतु | हो |
| न | नहीं |
| अन्यथा | अन्यथा |
📖 व्याख्या एवं महत्व
यह श्लोक संस्कृत साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर है। वाल्मीकि ने पहली बार महसूस किया कि उनके मुख से जो वाणी निकली है, वह आकस्मिक नहीं, बल्कि एक नियत छन्दोबद्ध रचना है। उन्होंने इसके तीन गुण बताए:
- पादबद्धः – चार चरणों में विभक्त (यह अनुष्टुप् छंद का लक्षण है)।
- अक्षरसमः – प्रत्येक चरण में समान अक्षर (आठ-आठ)।
- तन्त्रीलयसमन्वितः – वीणा के लय के अनुरूप, अर्थात् गेय और संगीतात्मक।
उन्होंने इसे 'श्लोक' नाम दिया, क्योंकि यह 'शोक' से उत्पन्न हुआ था। यहीं से 'शोकः श्लोकत्वमागतः' की उक्ति प्रसिद्ध हुई। यह श्लोक ही आगे चलकर रामायण के २४,००० श्लोकों का बीज बना।
॥ जय श्री राम ॥