संस्कृत श्लोक

काकुत्स्थं चारित्रगुणैः प्राप्तश्रीकं पृथिवीपतिम् । वेदित्सुरहमिच्छामि त्वद्य कमपि पूरुषम् ॥

हिंदी अनुवाद

मैं आज किसी ऐसे पुरुष को जानना चाहता हूँ, जो चरित्र और गुणों से युक्त, ऐश्वर्यशाली और पृथ्वी का स्वामी हो।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि अब एक ऐसे आदर्श पुरुष की खोज करना चाहते हैं, जो सभी गुणों से युक्त हो और पृथ्वी का राजा हो। यह संकेत राम की ओर है।

टिप्पणी

यह श्लोक वाल्मीकि की उस मानसिकता को दर्शाता है, जो अब एक आदर्श चरित्र की रचना के लिए उत्सुक है। वे काकुत्स्थ (रघुवंशी) राजा की बात कर रहे हैं, जो चरित्र और गुणों से युक्त हो, ऐश्वर्यशाली हो और पृथ्वी का स्वामी हो। यह राम के चरित्र का ही परिचय है।

॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक १९ – आदर्श पुरुष की खोज ॥

काकुत्स्थं चारित्रगुणैः प्राप्तश्रीकं पृथिवीपतिम् ।
वेदित्सुरहमिच्छामि त्वद्य कमपि पूरुषम् ॥
kākutsthaṃ cāritraguṇaiḥ prāptaśrīkaṃ pṛthivīpatim |
veditsurahamicchāmi tvadya kamapi pūruṣam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : मैं आज किसी ऐसे पुरुष को जानना चाहता हूँ, जो चरित्र और गुणों से युक्त, ऐश्वर्यशाली और पृथ्वी का स्वामी हो।

🔹 English Translation : I wish to know today some person who is the lord of the earth, endowed with character and virtues, and possessed of glory.

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतहिन्दी अर्थ
काकुत्स्थम्ककुत्स्थ वंशी (रघुवंशी)
चारित्रगुणैःचरित्र और गुणों से
प्राप्तश्रीकम्प्राप्त ऐश्वर्य वाले
पृथिवीपतिम्पृथ्वी के स्वामी
वेदित्सुःजानने की इच्छा रखने वाला
अहम्मैं
इच्छामिचाहता हूँ
त्वद्यआज
कम् अपिकिसी
पूरुषम्पुरुष को

📖 व्याख्या

श्लोक १८ में वाल्मीकि ने 'श्लोक' की उत्पत्ति स्वीकार की। अब वे उस श्लोक के माध्यम से किसी आदर्श पुरुष के चरित्र का वर्णन करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि मैं आज ऐसे पुरुष को जानना (वेदित्सुः) चाहता हूँ, जो काकुत्स्थ वंश में उत्पन्न हो, चरित्र और गुणों से युक्त हो, ऐश्वर्य को प्राप्त हो और पृथ्वी का स्वामी हो। यह स्पष्ट संकेत श्रीराम की ओर है। यहाँ 'काकुत्स्थ' विशेषण बताता है कि उनके मन में रघुवंश का ही कोई राजा है।

'वेदित्सुः' सन्नन्त धातु (विद् + सन्) से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है जानने की इच्छा रखने वाला।

📌 व्याकरण: 'प्राप्तश्रीकम्' – बहुव्रीहि समास: प्राप्ता श्रीः येन सः। 'वेदित्सुः' – उगादि प्रत्यय, कर्तृवाचक।

॥ जय श्री राम ॥