संस्कृत श्लोक

एवमुक्त्वा तु ध्यानस्थो ददर्श स महामुनिः । प्राञ्जलिं प्रणतं भूत्वा ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥

हिंदी अनुवाद

ऐसा कहकर ध्यान में लीन हुए उस महामुनि ने प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े हुए लोकों के भावक ब्रह्मा को देखा।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि ध्यान में लीन होते हैं और वहाँ ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं, जो उन्हें रामायण रचना की प्रेरणा देंगे।

टिप्पणी

यह श्लोक वाल्मीकि के ध्यान और ब्रह्मा के दर्शन का वर्णन करता है। वे ध्यानस्थ होकर ब्रह्मा को देखते हैं, जो उनके सामने हाथ जोड़े प्रणाम मुद्रा में खड़े हैं (यहाँ प्राञ्जलिं प्रणतं ब्रह्माणम् का अर्थ है कि ब्रह्मा ने वाल्मीकि के प्रति सम्मान प्रकट किया)। ब्रह्मा के आगमन से रामायण रचना का मार्ग प्रशस्त होता है।

॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक २० – ब्रह्मा का आविर्भाव ॥

एवमुक्त्वा तु ध्यानस्थो ददर्श स महामुनिः ।
प्राञ्जलिं प्रणतं भूत्वा ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥
evamuktvā tu dhyānastho dadarśa sa mahāmuniḥ |
prāñjaliṃ praṇataṃ bhūtvā brahmāṇaṃ lokabhāvanam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : ऐसा कहकर ध्यान में लीन हुए उस महामुनि ने प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े हुए लोकों के भावक ब्रह्मा को देखा।

🔹 English Translation : Having spoken thus, that great sage, absorbed in meditation, saw Brahma, the creator of the worlds, standing before him with folded hands and bowed down.

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतहिन्दी अर्थ
एवम्इस प्रकार
उक्त्वाकहकर
तुतो
ध्यानस्थःध्यान में स्थित
ददर्शदेखा
सःउस
महामुनिःमहामुनि ने
प्राञ्जलिम्हाथ जोड़े हुए
प्रणतम्प्रणाम किए हुए
भूत्वाहोकर
ब्रह्माणम्ब्रह्मा को
लोकभावनम्लोकों के भावक (रचयिता)

📖 व्याख्या

पिछले श्लोक में वाल्मीकि ने आदर्श पुरुष को जानने की इच्छा व्यक्त की। अब वे ध्यानस्थ होते हैं और उन्हें साक्षात् ब्रह्मा के दर्शन होते हैं। ब्रह्मा उनके सामने हाथ जोड़े प्रणत मुद्रा में खड़े हैं – यह वाल्मीकि की महिमा को दर्शाता है कि स्वयं ब्रह्मा उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। 'लोकभावनम्' – लोकों के रचयिता, पालनकर्ता। ब्रह्मा का आगमन वाल्मीकि को रामायण रचने की प्रेरणा देगा (अगले श्लोकों में)।

इस श्लोक के साथ ही वाल्मीकि को दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त होता है और रामायण के प्रणयन की भूमिका पूर्ण होती है।

📌 व्याकरण: 'उक्त्वा' – क्त्वा प्रत्यय, पूर्वकालिक क्रिया। 'ध्यानस्थः' – बहुव्रीहि समास: ध्याने तिष्ठति इति ध्यानस्थः। 'प्राञ्जलिम्' – प्र + अञ्जलि, जिसके हाथ जुड़े हों। 'प्रणतम्' – प्र + नम् + क्त, झुका हुआ।

॥ जय श्री राम ॥