संस्कृत श्लोक

तमागतं विधातारं दृष्ट्वा वाल्मीकिरब्रवीत् । सह शिष्योऽथ संहृष्टो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥

हिंदी अनुवाद

वाक्य-विशारद वाल्मीकि ने वहाँ आए हुए विधाता ब्रह्मा को देखकर शिष्यों सहित अत्यन्त हर्षित होकर वचन कहा।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक वाल्मीकि के हर्ष और आदर को दर्शाता है, जब वे ब्रह्मा जी के आगमन पर अपने शिष्यों सहित प्रफुल्लित होकर उनका स्वागत करते हैं।

टिप्पणी

इस श्लोक में वाल्मीकि की विनम्रता और ब्रह्मा के प्रति श्रद्धा प्रकट होती है। "वाक्यविशारद" विशेषण उनकी वाक्पटुता को रेखांकित करता है। शिष्यों के साथ प्रसन्न होना दर्शाता है कि वे केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आश्रम के कल्याण के लिए ब्रह्मा के आगमन को महत्वपूर्ण मानते हैं। यहाँ "विधाता" शब्द ब्रह्मा के सृजनकर्ता स्वरूप की ओर संकेत करता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २१ ॥

तमागतं विधातारं दृष्ट्वा वाल्मीकिरब्रवीत् ।
सह शिष्योऽथ संहृष्टो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
tamāgataṃ vidhātāraṃ dṛṣṭvā vālmīkirabravīt |
saha śiṣyo'tha saṃhṛṣṭo vākyaṃ vākyaviśāradaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वाक्य-विशारद वाल्मीकि ने वहाँ आए हुए विधाता ब्रह्मा को देखकर शिष्यों सहित अत्यन्त हर्षित होकर वचन कहा।

🔹 English Translation : Valmiki, the master of speech, seeing the arrived Creator (Brahma), along with his disciples, became very joyful and spoke these words.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
तम्सर्वनाम, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनउन (ब्रह्मा को)
आगतम्भूतकालिक कृदंत, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनआए हुए
विधातारम्संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनविधाता (ब्रह्मा) को
दृष्ट्वाल्यबन्त अव्ययदेखकर
वाल्मीकिःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवाल्मीकि
अब्रवीत्क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (ब्रू धातु)बोले
सहअव्ययसाथ, सहित
शिष्यःसंज्ञा, पुल्लिंग, तृतीया एकवचन (सह के योग में)शिष्यों के
अथअव्ययतब, इसके बाद
संहृष्टःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनअत्यन्त प्रसन्न
वाक्यम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनवचन
वाक्यविशारदःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवाक्य-विशारद, वाक्पटु

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

यह श्लोक ब्रह्मा जी के वाल्मीकि आश्रम में आगमन के दृश्य का वर्णन करता है। "विधाता" पद ब्रह्मा के सृष्टिकर्ता रूप को इंगित करता है। वाल्मीकि को "वाक्यविशारद" कहना उनकी विद्वत्ता और काव्य-प्रतिभा को स्वीकार करता है। शिष्यों सहित हर्षित होना यह दर्शाता है कि यह घटना केवल व्यक्तिगत नहीं, वरन सम्पूर्ण आश्रम के लिए आनंददायक थी। इस श्लोक से आगे ब्रह्मा-वाल्मीकि संवाद प्रारम्भ होता है, जो रामायण के रचनाकाल की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

व्याकरण की दृष्टि से, "सह शिष्यः" में तृतीया विभक्ति के स्थान पर प्रथमा का प्रयोग "सह" के योग में सम्भव है (वैकल्पिक)। "संहृष्टः" शब्द "हृष्" धातु से निष्पन्न, गहरे हर्ष का भाव व्यक्त करता है।

✨ आध्यात्मिक संदेश: गुरु और शिष्यों का एक साथ भगवद् साक्षात्कार के अवसर पर आनंदित होना यह सिखाता है कि दैवी अनुग्रह से सम्पूर्ण समुदाय उन्नत होता है। वाल्मीकि की विनम्रता और आदरभाव उनकी महानता को और बढ़ाता है।