रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
स तु ब्रह्मा महातेजाः समीपेऽस्य मुनेः स्थितः । कार्यं कार्यविदां श्रेष्ठः सर्वलोकपितामहः ॥
हिंदी अनुवाद
वे सर्वलोकपितामह, कार्यों को जानने वालों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनि के समीप स्थित हो गए।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक ब्रह्मा के महिमामय स्वरूप और वाल्मीकि के समीप उनके स्थित होने का वर्णन करता है।
टिप्पणी
ब्रह्मा को "सर्वलोकपितामह" कहा गया है, जो उनके सर्वोच्च स्थान को दर्शाता है। फिर भी वे मुनि के समीप स्थित होते हैं – यह उनकी कृपा और मुनि के प्रति सम्मान को प्रकट करता है। "कार्यविदां श्रेष्ठः" विशेषण ब्रह्मा के ज्ञान और कर्तव्यपरायणता की ओर इंगित करता है। "महातेजाः" उनके दिव्य प्रकाश का वर्णन है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २२ ॥
कार्यं कार्यविदां श्रेष्ठः सर्वलोकपितामहः ॥
kāryaṃ kāryavidāṃ śreṣṭhaḥ sarvalokapitāmahaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : वे सर्वलोकपितामह, कार्यों को जानने वालों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनि के समीप स्थित हो गए।
🔹 English Translation : That Brahma, the great effulgent one, the grandfather of all worlds, the best among those who know duties, stood near that sage.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह |
| तु | अव्यय | और, तो |
| ब्रह्मा | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | ब्रह्मा |
| महातेजाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महान तेजस्वी |
| समीपे | अव्यय (सप्तमी) | समीप, निकट |
| अस्य | सर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | इसके |
| मुनेः | संज्ञा, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | मुनि के |
| स्थितः | भूतकालिक कृदंत, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | स्थित हुए, खड़े हुए |
| कार्यम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | कर्तव्य, कार्य (यहाँ विशेषण के रूप में?) – दरअसल यह पद अलग से नहीं, "कार्यविदाम्" का भाग है |
| कार्यविदाम् | संज्ञा (कर्मधारय), पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | कर्तव्य जानने वालों में |
| श्रेष्ठः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | श्रेष्ठ |
| सर्वलोकपितामहः | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सभी लोकों के पितामह (ब्रह्मा) |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
इस श्लोक में ब्रह्मा के चार विशेषण हैं: महातेजाः, कार्यविदां श्रेष्ठः, सर्वलोकपितामहः, और स्थितः। ये उनके स्वरूप, ज्ञान, स्थिति और विनम्रता को एक साथ दर्शाते हैं। सृष्टि के कर्ता होते हुए भी वे एक मुनि के समीप खड़े होते हैं – यह ज्ञान और तप के प्रति उनका सम्मान प्रकट करता है। "कार्यविदां श्रेष्ठः" यह भी संकेत करता है कि ब्रह्मा स्वयं जानते हैं कि रामकथा का प्रकाशन एक महत्त्वपूर्ण कार्य है और इसीलिए वे वाल्मीकि को प्रेरित करने आए हैं।
संस्कृत में "पितामह" का अर्थ होता है "पिता के पिता" अर्थात दादा; "सर्वलोकपितामह" ब्रह्मा के सर्वोच्च स्थान को दर्शाता है।