संस्कृत श्लोक

अभिगम्य तु तं ब्रह्मा वाल्मीकिं जपतां वरम् । आसीनश्चासने तस्मिन् प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥

हिंदी अनुवाद

जप करने वालों में श्रेष्ठ उन वाल्मीकि के पास जाकर ब्रह्मा आसन पर बैठे और हँसते हुए यह बोले।

अर्थ / व्याख्या

ब्रह्मा वाल्मीकि के पास जाकर आसन ग्रहण करते हैं और मुस्कुराते हुए उनसे वार्तालाप आरम्भ करते हैं।

टिप्पणी

यहाँ "जपतां वरम्" कहकर वाल्मीकि की तपस्या और मंत्र साधना की महत्ता बताई गई है। ब्रह्मा का "प्रहसन्" (हँसते हुए) बोलना उनके सौम्य और अनुग्रहशील स्वभाव को दर्शाता है। साथ ही, आसन ग्रहण करना सम्मान का प्रतीक है। यह श्लोक ब्रह्मा के वचनों के प्रारम्भ का सूत्र है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २३ ॥

अभिगम्य तु तं ब्रह्मा वाल्मीकिं जपतां वरम् ।
आसीनश्चासने तस्मिन् प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
abhigamya tu taṃ brahmā vālmīkiṃ japatāṃ varam |
āsīnaścāsane tasmin prahasannidamabravīt ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जप करने वालों में श्रेष्ठ उन वाल्मीकि के पास जाकर ब्रह्मा आसन पर बैठे और हँसते हुए यह बोले।

🔹 English Translation : Approaching that Valmiki, the best among those who meditate (chant), Brahma sat on that seat and smiling spoke these words.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अभिगम्यल्यबन्त अव्ययपास जाकर, समीप गमन करके
तुअव्ययऔर, तो
तम्सर्वनाम, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनउनको (वाल्मीकि)
ब्रह्मासंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनब्रह्मा
वाल्मीकिम्संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनवाल्मीकि को
जपताम्कृदंत (जप धातु), पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचनजप करने वालों में
वरम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनश्रेष्ठ
आसीनःवर्तमान कृदंत (आस् धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनबैठे हुए
अव्ययऔर
आसनेसंज्ञा, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचनआसन पर
तस्मिन्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचनउस (आसन) पर
प्रहसन्वर्तमान कृदंत (हस् धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनहँसते हुए, मुस्कुराते हुए
इदम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनयह (वचन)
अब्रवीत्क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनबोले

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

इस श्लोक में ब्रह्मा के आगमन के बाद की क्रियाएँ वर्णित हैं: अभिगम्य (पास जाना), आसीनः (बैठना), प्रहसन् (मुस्कुराना), इदमब्रवीत् (यह बोलना)। यह क्रम शिष्टाचार और संवाद की तैयारी दर्शाता है। "जपतां वरम्" विशेषण वाल्मीकि की तपोनिष्ठा को उजागर करता है; वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि महान योगी भी हैं। ब्रह्मा का मुस्कुराना उनके वचनों में छिपे आनंद और रहस्य को इंगित करता है – वे रामायण के महान कार्य के लिए वाल्मीकि को प्रेरित करने वाले हैं।

व्याकरण में "आसीनः" वर्तमान कृदंत है, जो बैठने की स्थिति को दर्शाता है, और "प्रहसन्" भी वर्तमान कृदंत है, जो मुस्कान की निरंतरता को व्यक्त करता है।