रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
अभिगम्य तु तं ब्रह्मा वाल्मीकिं जपतां वरम् । आसीनश्चासने तस्मिन् प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
हिंदी अनुवाद
जप करने वालों में श्रेष्ठ उन वाल्मीकि के पास जाकर ब्रह्मा आसन पर बैठे और हँसते हुए यह बोले।
अर्थ / व्याख्या
ब्रह्मा वाल्मीकि के पास जाकर आसन ग्रहण करते हैं और मुस्कुराते हुए उनसे वार्तालाप आरम्भ करते हैं।
टिप्पणी
यहाँ "जपतां वरम्" कहकर वाल्मीकि की तपस्या और मंत्र साधना की महत्ता बताई गई है। ब्रह्मा का "प्रहसन्" (हँसते हुए) बोलना उनके सौम्य और अनुग्रहशील स्वभाव को दर्शाता है। साथ ही, आसन ग्रहण करना सम्मान का प्रतीक है। यह श्लोक ब्रह्मा के वचनों के प्रारम्भ का सूत्र है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २३ ॥
आसीनश्चासने तस्मिन् प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
āsīnaścāsane tasmin prahasannidamabravīt ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : जप करने वालों में श्रेष्ठ उन वाल्मीकि के पास जाकर ब्रह्मा आसन पर बैठे और हँसते हुए यह बोले।
🔹 English Translation : Approaching that Valmiki, the best among those who meditate (chant), Brahma sat on that seat and smiling spoke these words.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| अभिगम्य | ल्यबन्त अव्यय | पास जाकर, समीप गमन करके |
| तु | अव्यय | और, तो |
| तम् | सर्वनाम, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | उनको (वाल्मीकि) |
| ब्रह्मा | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | ब्रह्मा |
| वाल्मीकिम् | संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | वाल्मीकि को |
| जपताम् | कृदंत (जप धातु), पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | जप करने वालों में |
| वरम् | विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | श्रेष्ठ |
| आसीनः | वर्तमान कृदंत (आस् धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बैठे हुए |
| च | अव्यय | और |
| आसने | संज्ञा, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन | आसन पर |
| तस्मिन् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन | उस (आसन) पर |
| प्रहसन् | वर्तमान कृदंत (हस् धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | हँसते हुए, मुस्कुराते हुए |
| इदम् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | यह (वचन) |
| अब्रवीत् | क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन | बोले |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
इस श्लोक में ब्रह्मा के आगमन के बाद की क्रियाएँ वर्णित हैं: अभिगम्य (पास जाना), आसीनः (बैठना), प्रहसन् (मुस्कुराना), इदमब्रवीत् (यह बोलना)। यह क्रम शिष्टाचार और संवाद की तैयारी दर्शाता है। "जपतां वरम्" विशेषण वाल्मीकि की तपोनिष्ठा को उजागर करता है; वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि महान योगी भी हैं। ब्रह्मा का मुस्कुराना उनके वचनों में छिपे आनंद और रहस्य को इंगित करता है – वे रामायण के महान कार्य के लिए वाल्मीकि को प्रेरित करने वाले हैं।
व्याकरण में "आसीनः" वर्तमान कृदंत है, जो बैठने की स्थिति को दर्शाता है, और "प्रहसन्" भी वर्तमान कृदंत है, जो मुस्कान की निरंतरता को व्यक्त करता है।