संस्कृत श्लोक

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा । जगाम तमसा तीरं जाह्नव्याः अविदूरतः ॥

हिंदी अनुवाद

उन नारद के मुहूर्त मात्र में देवलोक को चले जाने पर तब वे मुनि गंगा से कुछ दूर पर तमसा नदी के तट पर गए।

अर्थ / व्याख्या

नारद के देवलोक गमन के तुरंत बाद वाल्मीकि गंगा के निकट तमसा नदी के तट पर गए। यह स्थान रामायण रचना की भूमि बनी।

टिप्पणी

यह श्लोक स्थान परिवर्तन का सूचक है। नारद के जाने के बाद वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर जाते हैं, जो गंगा के समीप है। यह वही स्थान है जहाँ उन्हें क्रौंच पक्षी का करुण दृश्य देखने को मिलता है, जिससे रामायण की रचना प्रेरित होती है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – तृतीय श्लोक ॥

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा ।
जगाम तमसा तीरं जाह्नव्याः अविदूरतः ॥
sa muhūrtaṃ gate tasmin devalokaṃ munistadā |
jagāma tamasā tīraṃ jāhnavyā avidūrataḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उन नारद के मुहूर्त मात्र में देवलोक को चले जाने पर तब वे मुनि गंगा से कुछ दूर पर तमसा नदी के तट पर गए।

🔹 English Translation : When Narada had departed to Devaloka within a moment, then that sage went to the bank of Tamasa, not far from the Ganges.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवह (वाल्मीकि)
मुहूर्तम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनमुहूर्त भर में, क्षण मात्र में
गतेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचन (गम् + क्त)चले जाने पर
तस्मिन्सर्वनाम, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनउस (नारद) के
देवलोकम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (देव + लोक)देवलोक को
मुनिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमुनि (वाल्मीकि)
तदाअव्ययतब
जगामपरस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (गम् धातु)गया
तमसास्त्रीलिंग, षष्ठी एकवचनतमसा नदी के
तीरम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनतट पर
जाह्नव्याःस्त्रीलिंग, षष्ठी एकवचन (जाह्नवी)गंगा के
अविदूरतःअव्यय (अ + विदूर + तस्)समीप, कुछ दूर

📖 व्याख्या एवं महत्व

नारद के चले जाने के तुरंत बाद (मुहूर्त मात्र में) वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर जाते हैं। "मुहूर्तम्" का अर्थ है कि नारद के जाने में देर नहीं लगी, और वाल्मीकि भी शीघ्र ही वहाँ से प्रस्थान करते हैं। तमसा नदी का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं पर आगे क्रौंच पक्षी का वध होता है, जो रामायण की रचना का मूल कारण बनता है। "जाह्नव्याः अविदूरतः" बताता है कि यह स्थान गंगा के समीप है, जो पवित्रता का प्रतीक है।

इस श्लोक से पता चलता है कि वाल्मीकि प्रकृति के समीप रहना पसंद करते थे, और नदी तट उनके ध्यान एवं चिंतन के लिए उपयुक्त स्थान था। यह स्थान आगे चलकर रामायण के रचना-स्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ।